देश में प्रधानमंत्री के पास सरकार चलाने की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत होती है। लेकिन आम आदमी की जिंदगी में सत्ता का सबसे सीधा चेहरा कई बार प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि थानेदार होता है। एफआईआर होगी या नहीं, किसे थाने बुलाया जाएगा, किससे पूछताछ होगी और किसे कब छोड़ा जाएगा—इन फैसलों का असर सीधे एक आम नागरिक की जिंदगी पर पड़ता है। इसलिए जब किसी थाने में कानून के बजाय कथित लेन-देन की बात सामने आती है, तो सवाल सिर्फ कुछ पुलिसकर्मियों पर नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर उठता है जो किसी नागरिक की आजादी को प्रभावित करती है।
बिहार के जादोपुर थाना क्षेत्र से सामने आया एक मामला इसी सवाल को सामने रखता है। आरोप है कि 8 जुलाई को गांजे की बरामदगी के लिए हुई पुलिस कार्रवाई के दौरान कुछ ऐसे लोगों को भी पकड़कर थाने लाया गया, जिनके बारे में पूछताछ के बाद उनके निर्दोष होने की बात सामने आ गई थी। इसके बावजूद उन्हें करीब 36 घंटे तक थाने में रखा गया।
आरोप यहीं खत्म नहीं होते। शिकायत और जांच के मुताबिक, इन लोगों के परिजनों से पैसे की मांग की गई। कथित तौर पर एक निजी व्यक्ति के माध्यम से पैसे पहुंचाए गए और इसके बाद इन लोगों को पीआर बॉन्ड पर छोड़ दिया गया। जांच में स्टेशन डायरी में हिरासत की एंट्री नहीं होने, सीसीटीवी फुटेज और फोन पर बातचीत जैसे साक्ष्यों का भी उल्लेख किया गया है।
मामले की जांच के बाद जादोपुर थानाध्यक्ष, एक चौकीदार, थाने के ड्राइवर और कथित निजी दलाल राजू यादव को गिरफ्तार किया गया है। आरोपियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज की गई और उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजे जाने की बात सामने आई है।
36 घंटे तक थाने में रखना कितना कानूनी?
यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल कानून का है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22 गिरफ्तार व्यक्ति को मनमानी गिरफ्तारी और हिरासत से सुरक्षा देता है। गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार की जानकारी देना और उसे 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना संवैधानिक सुरक्षा का हिस्सा है।
अब आपराधिक प्रक्रिया के लिए लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी बीएनएसएस में भी गिरफ्तारी से जुड़े स्पष्ट प्रावधान हैं। बीएनएसएस की धारा 47 के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार और जमानत के अधिकार की जानकारी दी जानी है। धारा 48 के तहत उसके रिश्तेदार या मित्र को गिरफ्तारी की सूचना देने का प्रावधान है। धारा 57 गिरफ्तार व्यक्ति को बिना अनावश्यक देरी मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की बात करती है, जबकि धारा 58 के तहत 24 घंटे से अधिक हिरासत पर स्पष्ट कानूनी नियंत्रण है।
इसका मतलब यह नहीं है कि पुलिस किसी व्यक्ति को किसी भी स्थिति में 24 घंटे से ज्यादा नहीं रख सकती। कानून के तहत मजिस्ट्रेट की अनुमति से आगे की हिरासत संभव है। लेकिन किसी व्यक्ति को बिना वैध प्रक्रिया, रिकॉर्ड और न्यायिक निगरानी के लंबे समय तक थाने में रखना गंभीर सवाल खड़े करता है।
पैसे लेकर छोड़ने का मामला कितना गंभीर?
अगर किसी जांच में यह साबित होता है कि किसी पुलिस अधिकारी ने सरकारी काम को गलत तरीके से करने या न करने के बदले किसी व्यक्ति से पैसा मांगा या स्वीकार किया, तो मामला सिर्फ विभागीय कार्रवाई तक सीमित नहीं रहता।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 सरकारी कर्मचारी द्वारा अनुचित लाभ लेने या लेने का प्रयास करने को अपराध मानती है। इसमें तीन से सात साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है। कानून यह भी स्पष्ट करता है कि अनुचित लाभ लेने की कोशिश भी अपराध हो सकती है।
यानी अगर किसी व्यक्ति को कानूनन छोड़ना था और उसे छोड़ने के बदले पैसा लिया गया, तो सवाल केवल रिश्वत लेने का नहीं, बल्कि सरकारी पद और अधिकार के दुरुपयोग का भी बन सकता है।
पुलिस में भ्रष्टाचार कितना बड़ा मुद्दा है?
जादोपुर का मामला अकेला उदाहरण है या व्यवस्था में बड़ी समस्या का हिस्सा है, इसे समझने के लिए आंकड़ों पर नजर डालना जरूरी है।
लोकल सर्किल्स और ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया के 2019 इंडिया करप्शन सर्वे में 20 राज्यों के लोगों से भ्रष्टाचार को लेकर राय ली गई थी। सर्वे में 51% प्रतिभागियों ने कहा कि उन्होंने पिछले एक साल में रिश्वत दी थी। पुलिस को भ्रष्टाचार से प्रभावित प्रमुख विभागों में शामिल किया गया था। सर्वे में 19% लोगों ने बताया कि उनके रिश्वत भुगतान का संबंध पुलिस से था। 2025 CPI में भारत का स्कोर 39/100 रहा और रैंक 182 देशों में भारत का रैंक 91 है। पुलिस, भूमि-राजस्व और नगर सेवाएं अक्सर उच्च कथित भ्रष्टाचार वाले क्षेत्रों में गिनी जाती हैं
असली सवाल थानेदार बनाम प्रधानमंत्री का नहीं
तो क्या थानेदार प्रधानमंत्री से ज्यादा पावरफुल है? संवैधानिक रूप से बिल्कुल नहीं। लेकिन एक आम नागरिक के अनुभव में स्थानीय पुलिस अधिकारी की शक्ति कई बार बहुत बड़ी महसूस हो सकती है। यही कारण है कि पुलिस की शक्ति के साथ उतनी ही मजबूत जवाबदेही जरूरी है।
जादोपुर जैसे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर किसी व्यक्ति को बिना उचित रिकॉर्ड के 36 घंटे थाने में रखा गया, उससे पैसे लिए गए और फिर उसे छोड़ा गया, तो उस दौरान उसकी आजादी की जिम्मेदारी किसकी थी? लोकतंत्र में पुलिस की ताकत कानून से आती है। और उसी कानून की सीमा भी पुलिस पर लागू होती है।
इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि थानेदार प्रधानमंत्री से ज्यादा पावरफुल है या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या किसी थाने की चारदीवारी के भीतर कानून से ऊपर किसी की ताकत चल सकती है?































