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UPI के 10 साल: कभी झिझक के साथ शुरू हुआ सफर, आज आम आदमी की जिंदगी का जरूरी हिस्सा बना डिजिटल पेमेंट

UPI को शुरू हुए एक दशक पूरा हो चुका है। 11 अप्रैल 2016 को भारतीय रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर डॉ. रघुराम राजन ने मुंबई में UPI का पायलट लॉन्च किया था। उस समय 21 बैंक इस व्यवस्था से जुड़े थे।

Kashish Mishra द्वारा Kashish Mishra
8 August 2026
in चर्चित
UPI के 10 साल:
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भारत में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी UPI को शुरू हुए एक दशक पूरा हो चुका है। 11 अप्रैल 2016 को भारतीय रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर डॉ. रघुराम राजन ने मुंबई में UPI का पायलट लॉन्च किया था। उस समय 21 बैंक इस व्यवस्था से जुड़े थे। शुरुआत में UPI को लेकर लोगों के बीच जागरूकता कम थी और डिजिटल पेमेंट को लेकर भरोसा भी पूरी तरह नहीं बन पाया था। लेकिन अगले कुछ वर्षों में UPI ने जिस तेजी से लोगों की आदत बदली, उसने भारत के भुगतान तंत्र की तस्वीर ही बदल दी।

शुरुआत में आसान नहीं था UPI का सफर

UPI से पहले डिजिटल पैसे भेजने के लिए लोगों के पास NEFT, RTGS और IMPS जैसे विकल्प मौजूद थे, लेकिन इनमें अलग-अलग प्रक्रियाएं और बैंकिंग विवरण की जरूरत पड़ती थी। UPI ने इस पूरी प्रक्रिया को एक ही प्लेटफॉर्म पर लाने का काम किया। मोबाइल फोन से कुछ ही सेकंड में पैसे भेजना, QR कोड स्कैन करके भुगतान करना और अलग-अलग बैंक खातों को एक ही ऐप से इस्तेमाल करना इसकी बड़ी खासियत बनी।

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अगस्त 2016 में UPI आम ग्राहकों के लिए उपलब्ध होना शुरू हुआ। शुरुआत में इसका इस्तेमाल सीमित था, लेकिन धीरे-धीरे बैंक, दुकानदार और ग्राहक इससे जुड़ते गए। जून 2017 में UPI ने पहली बार एक महीने में 1 करोड़ लेन-देन का आंकड़ा पार किया। यानी लॉन्च के करीब 11 महीने में ही इसके ट्रांजैक्शन वॉल्यूम में जबरदस्त उछाल देखने को मिला।

कोरोना काल ने बदल दी UPI की तस्वीर

UPI की लोकप्रियता को सबसे बड़ा बढ़ावा कोरोना महामारी और लॉकडाउन के दौरान मिला। जब लोग घरों से बाहर नहीं निकल पा रहे थे और नकद लेन-देन से भी बच रहे थे, तब डिजिटल भुगतान तेजी से जरूरी होता गया। RBI के मुताबिक, महामारी के दौरान लोगों ने कैश के बजाय डिजिटल भुगतान को प्राथमिकता दी और डिजिटल लेन-देन में तेज रिकवरी देखने को मिली। खास तौर पर छोटे-छोटे रोजमर्रा के भुगतान में डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल बढ़ा।

यही वह दौर था जब UPI सुविधा से आगे बढ़कर जरूरत बन गया। सब्जी वाले से लेकर किराना दुकानदार, मेडिकल स्टोर, कैब ड्राइवर, रेस्तरां और ऑनलाइन कारोबार तक QR कोड और UPI भुगतान आम होने लगा।

आज UPI की पहुंच कितनी बड़ी है?

UPI की रफ्तार का अंदाजा इसके मौजूदा आंकड़ों से लगाया जा सकता है। NPCI के आंकड़ों के मुताबिक, मई 2026 में UPI के जरिए करीब 23.20 अरब यानी 2,320 करोड़ लेन-देन हुए। इनका कुल मूल्य करीब ₹29.90 लाख करोड़ रहा। इस महीने 720 बैंक UPI नेटवर्क पर लाइव थे।

यानी आज UPI सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित डिजिटल पेमेंट सिस्टम नहीं है। छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में भी इसका इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। QR कोड ने डिजिटल पेमेंट को बेहद आसान बना दिया है। ग्राहक को बैंक अकाउंट नंबर या IFSC बताने की जरूरत नहीं पड़ती, सिर्फ QR स्कैन करके भुगतान किया जा सकता है।

UPI ने बदली आम आदमी की भुगतान की आदत

UPI ने सबसे बड़ा बदलाव रोजमर्रा के छोटे भुगतान में किया है। पहले 10, 20, 50 या 100 रुपये के भुगतान के लिए नकद रखना जरूरी माना जाता था। अब मोबाइल फोन से कुछ सेकंड में रकम भेजी जा सकती है।

बिजली-पानी के बिल, मोबाइल रिचार्ज, ऑनलाइन खरीदारी, किराना सामान, यात्रा, फीस और दूसरे कई भुगतान UPI से किए जा रहे हैं। इसके अलावा दोस्तों और परिवार के बीच पैसे भेजने के लिए भी UPI बेहद लोकप्रिय हो चुका है।

RBI ने भी UPI को भारत के रिटेल पेमेंट सिस्टम में एक बड़ा बदलाव लाने वाला माध्यम माना है। UPI की 24×7 उपलब्धता, तत्काल भुगतान, QR कोड और बैंक खातों को एक ही इंटरफेस से जोड़ने जैसी सुविधाओं ने इसे आम लोगों के लिए आसान बनाया है।

सिर्फ सुविधा नहीं, आर्थिक बदलाव का जरिया

UPI की सफलता का असर सिर्फ भुगतान तक सीमित नहीं है। इससे छोटे दुकानदारों और कारोबारियों के लिए डिजिटल भुगतान स्वीकार करना आसान हुआ है। ग्राहक को खुले पैसे की चिंता नहीं रहती और दुकानदार को हर लेन-देन के लिए नकदी संभालने की जरूरत कम हुई है।

RBI के अनुसार, भारत में डिजिटल पेमेंट का विस्तार वित्तीय समावेशन को भी बढ़ावा दे रहा है। डिजिटल भुगतान के बढ़ते इस्तेमाल ने बैंकिंग और औपचारिक अर्थव्यवस्था से जुड़ने के नए रास्ते खोले हैं।

UPI के सामने नई चुनौतियां भी

हालांकि UPI की सफलता के साथ कुछ चुनौतियां भी सामने आई हैं। डिजिटल फ्रॉड, फर्जी QR कोड, फिशिंग लिंक और गलत व्यक्ति को पैसे भेजने जैसी घटनाओं ने साइबर सुरक्षा को महत्वपूर्ण मुद्दा बना दिया है। ऐसे में UPI का इस्तेमाल करते समय PIN, OTP और बैंकिंग जानकारी किसी के साथ साझा न करना बेहद जरूरी है।

इसके अलावा डिजिटल भुगतान पर बढ़ती निर्भरता के साथ इंटरनेट, मोबाइल नेटवर्क और तकनीकी सिस्टम की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण हो गई है। यानी जिस सिस्टम ने कैश की जरूरत कम की है, उसी के कारण डिजिटल कनेक्टिविटी अब रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन गई है।

दस साल में ‘विकल्प’ से ‘आदत’ तक

UPI की दस साल की कहानी सिर्फ एक तकनीकी प्लेटफॉर्म की सफलता की कहानी नहीं है। यह भारत में लोगों की भुगतान संबंधी आदतों में आए बड़े बदलाव की कहानी भी है। 2016 में जिस सिस्टम को समझाने और अपनाने में समय लगा, वही आज करोड़ों लोगों के रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन चुका है।

आज किसी दुकान पर पहुंचने के बाद सवाल अक्सर यह नहीं होता कि “UPI है क्या?“, बल्कि यह होता है कि “QR कहां है?“

मई 2026 में एक ही महीने में 23 अरब से ज्यादा UPI लेन-देन और करीब ₹30 लाख करोड़ का भुगतान इस बदलाव की तस्वीर साफ कर देता है।

UPI ने भारत को कैश से डिजिटल भुगतान की ओर तेजी से आगे बढ़ाया है। आने वाले वर्षों में इसका विस्तार केवल दुकानों और मोबाइल भुगतान तक सीमित नहीं रहने वाला, बल्कि क्रेडिट, बिल भुगतान, सरकारी सेवाओं और दूसरे वित्तीय क्षेत्रों में भी इसका इस्तेमाल बढ़ने की संभावना है। दस साल पूरे कर चुका UPI अब सिर्फ भुगतान का माध्यम नहीं, बल्कि भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की पहचान बन चुका है।

Tags: locckdownUPIUPI की दस सालकोरोना महामारीप्लेटफॉर्मलॉकडाउन
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