नई दिल्ली में हुए BRICS Summit के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल और विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल के स्नैक्स खाते हुए वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आए। इसके बाद कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता रितु चौधरी ने डोभाल पर तंज कसते हुए सवाल उठाए। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने डोभाल की “Larger than Life” छवि बनाई, लेकिन वीडियो में उनकी “असलियत” दिखाई दे रही है। उन्होंने इसे शिष्टाचार और प्रोटोकॉल से भी जोड़ दिया।
सवाल यह है कि क्या BRICS जैसे बेहद कठिन कूटनीतिक सम्मेलन के बीच किसी अधिकारी के कुछ खाते हुए दिख जाने को उनकी कार्यक्षमता या भारत की कूटनीतिक उपलब्धि से जोड़ना वाजिब है? और उससे भी बड़ा सवाल कि क्या विपक्ष का ध्यान उस उपलब्धि पर होना चाहिए, जिसके लिए भारत को आखिरी रात तक लगातार बातचीत करनी पड़ी?
BRICS में हासिल क्या हुआ
12 सितंबर को नई दिल्ली में BRICS नेताओं ने New Delhi Declaration को अपनाया। खास बात यह थी कि पश्चिम एशिया में युद्ध और तनाव के बीच इस समूह में ऐसे देश भी शामिल हैं जिनके आपसी हित कई मुद्दों पर अलग-अलग हैं। इसके बावजूद संयुक्त घोषणा पर सहमति बनी।
प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी New Delhi Declaration में पश्चिम एशिया की स्थिति पर चिंता जताते हुए अधिकतम संयम बरतने और ऐसे कदमों से बचने की अपील की गई, जो तनाव को और बढ़ा सकते हैं।
यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि BRICS अब सिर्फ पांच देशों का समूह नहीं है। इसमें अलग-अलग रणनीतिक हितों वाले देश हैं और पश्चिम एशिया का संकट खुद BRICS के भीतर कई तरह के समीकरण पैदा करता है। ईरान और UAE जैसे देशों का एक ही घोषणा-पत्र पर सहमत होना अपने आप में आसान कूटनीतिक काम नहीं था। Reuters ने भी इस सहमति को मौजूदा क्षेत्रीय तनाव के बीच महत्वपूर्ण कूटनीतिक प्रगति के तौर पर रिपोर्ट किया।
क्या यह सब एक रात में हो गया था? बिल्कुल नहीं
BRICS की संयुक्त घोषणा पर बातचीत आखिरी समय तक चली। रिपोर्टों के मुताबिक, भारत की अध्यक्षता में तैयार हो रहे दस्तावेज पर 12 सितंबर की सुबह करीब 4 बजे तक बातचीत चली। यानी जब सोशल मीडिया पर वीडियो को लेकर यह सवाल उठाया जा रहा था कि कोई अधिकारी बैठक के दौरान ड्राई फ्रूट्स या स्नैक्स क्यों खा रहा है, उस समय यह भूलना आसान है कि ऐसे सम्मेलन में अधिकारी कई घंटे लगातार बैठकों, वार्ताओं और दस्तावेजों पर बातचीत में लगे रहते हैं।
एक होस्ट कंट्री के लिए संयुक्त बयान हासिल करना सिर्फ मंच पर नेताओं की तस्वीर खिंचवाने का काम नहीं होता। उसके पीछे घंटों की बातचीत, शब्दों पर सहमति, अलग-अलग देशों की आपत्तियों को संभालना और अंत में ऐसा दस्तावेज तैयार करना होता है जिसे सभी स्वीकार कर सकें।
तो क्या स्नैक्स खाना भी अब प्रोटोकॉल का मुद्दा है?
यहीं कांग्रेस प्रवक्ता रितु चौधरी के हमले पर सवाल उठता है। अगर किसी वीडियो में अजीत डोभाल बैठक के दौरान कुछ खाते दिखाई दे रहे हैं, तो सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि वीडियो अपने आप यह साबित नहीं करता कि वह काम नहीं कर रहे थे या बैठक के दौरान कोई अनुचित व्यवहार कर रहे थे। बल्कि यह भी संभव है कि लगातार बैठकों के बीच उपलब्ध कराए गए स्नैक्स ही खाने का समय मिला हो। और यही बात रणधीर जायसवाल के वीडियो पर भी लागू होती है।
कल्पना कीजिए कि यही वीडियो किसी पश्चिमी देश के राजनयिक का होता। क्या उसे इस तरह पेश किया जाता कि देखिए, अधिकारी प्रोटोकॉल तोड़ रहा है? या फिर इसे इस अंदाज में दिखाया जाता—“देखिए, कितना सहज और कैजुअल है; भूख लगी तो सामने रखा स्नैक खा लिया, कोई दिखावा नहीं।”
हम अक्सर पश्चिमी अधिकारियों की अनौपचारिकता को “ease” और “informality” के रूप में देखते हैं। लेकिन वही व्यवहार किसी भारतीय अधिकारी का हो तो उसे “शिष्टाचार की कमी” या “प्रोटोकॉल की अनदेखी” बताना क्या दोहरा पैमाना नहीं है?
क्या असली मुद्दा डोभाल हैं या भारत की कूटनीति?
कांग्रेस की आलोचना का अधिकार अपनी जगह है। सरकार और उसके अधिकारियों के काम पर सवाल उठाना विपक्ष की भूमिका का हिस्सा है। लेकिन सवाल यह है कि आलोचना का आधार क्या हो?
अगर डोभाल या विदेश मंत्रालय के किसी अधिकारी के किसी फैसले, बातचीत या कूटनीतिक रणनीति पर सवाल है तो उस पर बहस होनी चाहिए। लेकिन कुछ सेकंड के वीडियो में किसी को स्नैक्स खाते देखकर उसकी “औकात” या “क्षमता” पर सवाल खड़ा करना राजनीतिक आलोचना को बहुत सतही बना देता है। खासकर तब, जब उसी सम्मेलन में भारत को एक ऐसा संयुक्त दस्तावेज हासिल हुआ जिसमें पश्चिम एशिया के गंभीर संकट पर साझा भाषा बनी।
New Delhi Declaration में BRICS नेताओं ने संवाद, कूटनीति और शांतिपूर्ण समाधान की जरूरत पर भी जोर दिया।
सरकार की उपलब्धियों पर सवाल उठाना जरूरी है। विपक्ष का काम सिर्फ प्रशंसा करना नहीं है। लेकिन आलोचना तब ज्यादा प्रभावी होती है जब वह उपलब्धि के वास्तविक पैमाने को स्वीकार करने के बाद उसकी सीमाओं पर सवाल उठाए। मसलन, पूछा जा सकता है कि BRICS घोषणा में भारत के लिए कौन-कौन से ठोस परिणाम निकले? पश्चिम एशिया पर साझा बयान का वास्तविक असर क्या होगा? आतंकवाद, UNSC सुधार, व्यापार, स्थानीय मुद्राओं और ग्लोबल साउथ के मुद्दों पर भारत कितना आगे बढ़ पाया? लेकिन “डोभाल ने स्नैक क्यों खाया?” इससे न तो BRICS की कूटनीति समझ में आती है और न भारत की विदेश नीति।
रितु चौधरी के बयान अकेला नहीं ?
इसे कांग्रेस की उस राजनीतिक शैली के हिस्से के रूप में देखा जा सकता है जिसमें सरकार की बड़ी उपलब्धियों के बीच भी उसके प्रतीकों और चेहरों पर हमला किया जाता है। यह पहली बार नहीं है जब विपक्ष ने किसी उपलब्धि के साथ जुड़े सरकारी नैरेटिव को चुनौती दी हो। इससे पहले चिंदबरम ने BRICS की उपयोगिता पर सवाल खड़े किए। लेकिन यहां समस्या यह है कि बहस BRICS के परिणामों से हटकर एक स्नैक तक सिमट गई। और यही वह जगह है जहां आलोचना अपनी धार खो देती है।





























