छात्रों की आवाज को लेकर राजनीति में नई हलचल है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ‘छात्रों की गूंज’ के जरिए पेपर लीक, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था के सवालों को लेकर छात्रों के बीच पहुंच रहे हैं। लेकिन इसी दौरान दिल्ली यूनिवर्सिटी से आया एक चुनावी संदेश राष्ट्रीय राजनीति के लिए खासा दिलचस्प है जहां DUSU चुनाव में ABVP ने चार में से तीन बड़े पद जीत लिए हैं।
अध्यक्ष पद पर यश डबास, सचिव पद पर रिया छाबड़ी और संयुक्त सचिव पद पर लक्ष्य राज सिंह ने जीत दर्ज की। सिर्फ उपाध्यक्ष पद निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शोकीन के खाते में गया। यानी चार सदस्यीय केंद्रीय पैनल में ABVP के तीन चेहरे, जबकि कांग्रेस की छात्र इकाई NSUI चारों केंद्रीय पदों में से कोई सीट नहीं जीत सकी।
यही वजह है कि इस नतीजे को सिर्फ एक छात्रसंघ चुनाव का परिणाम मानकर छोड़ देना आसान नहीं है। दिल्ली यूनिवर्सिटी देश के सबसे बड़े और सबसे राजनीतिक रूप से चर्चित कैंपस में से एक है। यहां का चुनाव लंबे समय से राष्ट्रीय छात्र राजनीति की दिशा को समझने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। इस बार नतीजे ने कम से कम इतना साफ कर दिया है कि देश की राजधानी में कैंपस की राजनीति में ABVP की संगठनात्मक मौजूदगी और चुनावी पकड़ अभी भी मजबूत है।
राहुल गांधी की ‘छात्रों की गूंज’ और सामने आया ABVP का नतीजा
राहुल गांधी का ‘छात्रों की गूंज’ अभियान सीधे छात्रों के मुद्दों को राजनीतिक बहस के केंद्र में लाने की कोशिश है। अभियान की वेबसाइट पर पेपर लीक और नौकरियों की कमी को प्रमुख मुद्दों के तौर पर रखा गया है और छात्रों से पूछा गया है कि शिक्षा व्यवस्था ने उन्हें कहां निराश किया।
राहुल गांधी का तर्क है कि छात्रों की समस्याओं को सिर्फ व्यक्तिगत परेशानी नहीं बल्कि व्यवस्था से जुड़े सवाल के तौर पर देखा जाना चाहिए। लेकिन DUSU का चुनावी संदेश दूसरी तस्वीर सामने रखता है।
यहां छात्रों ने संगठन और उम्मीदवारों के स्तर पर ABVP को तीन महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी हैं। खासकर अध्यक्ष पद की जीत इस परिणाम का सबसे बड़ा हिस्सा है। यश डबास और NSUI के विजय शंकर मीणा के बीच मुकाबला कड़ा रहा, लेकिन अंतिम नतीजे में बाजी ABVP के हाथ लगी।बड़ा सवाल यह है कि इन मुद्दों को कैंपस पर कौन-सा संगठन ज्यादा प्रभावी तरीके से छात्रों तक पहुंचा पा रहा है।
ABVP की तीन सीटें क्यों महत्वपूर्ण हैं?
DUSU का चार केंद्रीय पदों वाला पैनल एक तरह से कैंपस की संगठनात्मक ताकत का संकेत देता है। ABVP ने अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव, तीनों पद जीतकर केंद्रीय पैनल में स्पष्ट बहुमत हासिल किया है। और दिलचस्प बात यह है कि उपाध्यक्ष पद जीतने वाले दीपांशु शोकीन निर्दलीय उम्मीदवार थे और उन्हें NSUI से टिकट नहीं मिला था। इसलिए यह चुनाव केवल ABVP बनाम NSUI की सीधी दोतरफा कहानी भी नहीं है। निर्दलीय उम्मीदवार की जीत बताती है कि व्यक्तिगत उम्मीदवार और स्थानीय कैंपस समीकरण भी महत्वपूर्ण हैं।
फिर भी तीन केंद्रीय पदों पर ABVP की जीत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। खासकर तब, जब चुनाव में 1.51 लाख से ज्यादा छात्र वोट देने के पात्र थे और मतदान करीब 40.46% रहा।
कॉलेजों के नतीजे भी क्या कहते हैं?
DUSU के केंद्रीय नतीजों के बाहर कॉलेज स्तर की राजनीति भी इस तस्वीर को और दिलचस्प बनाती है। दिल्ली यूनिवर्सिटी के अलग-अलग कॉलेजों में ABVP से जुड़े उम्मीदवारों ने कई प्रमुख पदों पर जीत दर्ज की है। इससे यह संकेत जरूर मिलता है कि संगठन की पहुंच सिर्फ विश्वविद्यालय के केंद्रीय पैनल तक सीमित नहीं है। कैंपस की जमीन पर संगठन, उम्मीदवारों का नेटवर्क और कॉलेज स्तर की सक्रियता चुनावी राजनीति में बड़ा फैक्टर बनी हुई है।
फिर PM मोदी और सरकार Gen Z तक कैसे पहुंच रहे हैं?
यहीं कहानी का दूसरा हिस्सा शुरू होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने युवाओं तक पहुंच के लिए केवल राजनीतिक भाषणों पर निर्भर रहने के बजाय शिक्षा, परीक्षा, स्किल, खेल और डिजिटल माध्यमों को भी संवाद का जरिया बनाया है। कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री ने 13 साल के बाद श्रीराम कालेज में छात्रों को संबोधित किया। इंस्टग्राम पर प्रधानमंत्री ने अपनी पहुंच बढ़ाई है। भाजपा ने अपने मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों को GENZ के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने का लिए प्रयास करने के लिए कहा गया है। चुनावी नतीजों से साफ हुआ है कि Gen Z तक पहुंचने की राजनीति अब केवल ‘युवा हमारे साथ हैं’ कहने से नहीं चलती। सोशल मीडिया, प्रत्यक्ष संवाद, परीक्षा, रोजगार, स्किल, खेल और भविष्य की आकांक्षाएं, इन सबको जोड़ना पड़ता है।
असली मुकाबला अब ‘गूंज’ का है
यहीं DUSU का नतीजा और ‘छात्रों की गूंज’ एक दिलचस्प राजनीतिक तस्वीर बनाते हैं। राहुल गांधी छात्रों की समस्याओं को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी राजनीतिक आवाज मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं दिल्ली यूनिवर्सिटी के चुनाव में छात्रों ने ABVP को तीन केंद्रीय पद देकर उसके संगठन और उम्मीदवारों पर भरोसा जताया है। दूसरी तरफ सरकार और प्रधानमंत्री मोदी परीक्षा, स्किल, खेल और सीधे छात्र संवाद जैसे माध्यमों से युवाओं तक अपनी पहुंच बनाए हुए हैं।
इसलिए DUSU का संदेश फिलहाल इतना साफ है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के कैंपस में ABVP की गूंज कमजोर नहीं हुई, बल्कि तीन बड़े पदों की जीत के साथ उसकी चुनावी आवाज और मजबूत होकर सामने आई है।
लेकिन Gen Z की पूरी राजनीतिक दिशा तय करने के लिए सिर्फ DUSU पर्याप्त नहीं है। आने वाले छात्र चुनाव, युवाओं के मुद्दों पर जनमत, रोजगार और शिक्षा से जुड़े सवाल और राष्ट्रीय चुनावों में युवा मतदाताओं का व्यवहार ही बताएगा कि कैंपस की यह हुंकार कितनी बड़ी राजनीतिक गूंज में बदलती है।





























