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दुनिया के पहले ‘लिक्विड मिरर टेलीस्कोप’ के साथ अब अंतरिक्ष का ‘बादशाह’ बन गया है भारत

पूरी दुनिया के लिए मददगार साबित होगा यह टेलीस्कोप!

Ruchi Mehra द्वारा Ruchi Mehra
4 June 2022
in चर्चित, ज्ञान
Liquid-Mirror telescope uttarakhand

Source- TFI

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अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत ने बड़ी और ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है, जिसकी चर्चा हर तरफ हो रही है। दरअसल, उत्तराखंड में इंटरनेशनल लिक्विड मिरर टेलीस्कोप (ILMT) स्थापित किया गया है। यह टेलीस्कोप ब्रह्मांड में होने वाली नई घटनाओं पर नजर रख सकेगा। ध्यान देने वाली बात है कि यह देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया का पहला ऐसा लिक्विड मिरर टेलीस्कोप है, जिसका इस्तेमाल खगोलीय प्रेक्षण के लिए किया जाएगा। पहले भी लिक्विड मिरर टेलीस्कोप बनाए गए हैं, लेकिन इनका इस्तेमाल उपग्रहों पर नजर रखने या फिर सैन्य उद्देश्यों के लिए किया जाता था। वर्ष 2017 में नैनीताल स्थित आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (ARIES Nainital) ने कनाडा, बेल्जियम, पोलैंड और अन्य 9 देशों के साथ मिलकर ILMT यानी इंटरनेशनल लिक्विड मिरर टेलीस्कोप के प्रोजेक्ट को शुरू किया था। टेलीस्कोप में एक पतली फिल्म से बना 4 मीटर व्यास वाला रोटेटिंग मिरर लगा हुआ है, जो प्रकाश को इकट्ठा करने और फोकस करने का काम करता है।

और पढ़ें: Skyroot Aerospace ने शुरू की भारतीय निजी क्षेत्र में अंतरिक्ष की रेस

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अंतरिक्ष में होने वाली हलचल पर रखी जाएगी करीब से नजर

इस टेलीस्कोप की मदद से अंतरिक्ष से गिरने वाले मलबे और क्षुद्रग्रहों जैसी क्षणिक वस्तुओं पर नजर रखने में मदद मिलेगी। साथ ही यह सुपरनोवा को भी देखने का काम करेगा। ILMT से कई आकाशगंगाओं और अन्य खगोलीय सोर्सेज की निगरानी करना आसान होगा। टेलीस्कोप में लगी पतली पारदर्शी फिल्म पारे को हवा से बचाने में मदद करती है। साथ ही इसमें एक बड़ा इलेक्ट्रॉनिक कैमरा भी लगाया गया, जो इमेज को रिकॉर्ड करने का काम करेगा। इसमें खास बात यह है कि इससे बहुत ज्यादा डेटा एकत्र किया जा सकेगा।

टेलीस्कोप से संबंधित जानकारी देते हुए ARIES के निदेशक प्रो. दीपांकर बताते हैं कि इस लिक्विड टेलीस्कोप को नैनीताल के करीब 60 किलोमीटर की दूरी पर देवस्थल में समुद्र सतह से 2450 मीटर की ऊंचाई पर स्थापित किया गया। दूरबीन की स्थापना से ARIES समेत तमाम देशों एवं अंतरिक्ष से जुड़े कई नए रहस्यों की जानकारी हासिल करने में खगोल वैज्ञानिकों को मदद मिलेगी। प्रो. दीपांकर का दावा है कि दूरबीन से प्रतिदिन घटने वाली घटनाओं पर बारीकी से अध्ययन किया जा सकेगा। टेलीस्कोप की सहायता से अंतरिक्ष में होने वाली हलचल पर नजर रखी जा सकेगी। इससे साथ ही में भविष्य में होने वाले परिवर्तन को जानने में भी यह टेलीस्कोप काफी काम आएगा।

ध्यान देने वाली बात है कि यह टेलीस्कोप अंतरिक्ष के कचरे यानी Space Debris का पता लगाने में भी सहायता करेगा। गौरतलब है कि अंतरिक्ष में एकत्रित हो रहा कचरा भविष्य के लिए एक बड़ा खतरा बनता जा रहा है। अंतरिक्ष में लगातार बढ़ रहे कचरे ने वैज्ञानिकों की चिंता भी बढ़ा दी है। वैज्ञानिकों के द्वारा लगातार यह चेतावनी दी जाती रही है कि अंतरिक्ष में सैटेलाइट का बढ़ता कचरा धरती के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। यह अंतरिक्ष में मौजूद तमाम उपग्रहों, अंतरिक्ष यात्रियों और अंतरिक्ष स्टेशन के लिए भविष्य में काफी घातक साबित हो सकता है। नासा के मुताबिक अंतरिक्ष कचरे में सैटेलाइट, स्पेसक्राफ्ट, बैटरी, रॉकेट और बाकी टैक्नोलॉजी के खराब और पुराने टुकड़े मौजूद हैं।

पूरी दुनिया के लिए मददगार साबित होगा यह टेलीस्कोप

आपको ज्ञात होगा कि इस वक्त दुनिया के सभी शक्तिशाली देशों के बीच अंतरिक्ष में अपना दबदबा कायम करने की होड़ मची हुई है, जो इस समस्या को और घातक रुप दे रही है। दिन प्रतिदिन अंतरिक्ष में कूड़ा बढ़ता ही चला जा रहा है। अंतरिक्ष में मौजूद मलबा बहुत तेज स्पीड में पृथ्वी की कक्षा में चक्कर काट रहा है। खास तौर पर निचली कक्षा में टुकड़े 25,265 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से चक्कर काट रहे हैं, जो दूसरे उपग्रहों से टकराकर भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं। नासा के अनुसार धरती से 600 किलोमीटर तक की ऊंचाई पर जो कचरा मौजूद होगा वो कुछ सालों में धरती पर गिर भी सकता है। वहीं, एक हजार किलोमीटर या फिर उससे अधिक की ऊंचाई पर स्थित कचरा सदियों तक आसमान में ही चक्कर काटते रहते हैं।

कुछ आंकड़ों पर गौर करें तो संयुक्त राष्ट्र के स्पेस सर्विलांस नेटवर्क के मुताबिक अंतरिक्ष में 10 सेंटीमीटर से बड़े लगभग 23 हजार, एक सेंटीमीटर से बड़े 5 लाख और एक मिलीमीटर से बड़े 1 करोड़ से भी अधिक ऐसे टुकड़े मौजूद हैं। नासा के अनुमान के मुताबिक हर रोज करीब एक मलबा या तो पृथ्वी पर गिरता है या फिर वातावरण में आकर जल जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार कचरे से बड़े नुकसान की अब तक कोई बड़ी जानकारी प्राप्त नहीं हुई, क्योंकि कचरा पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करते ही जल जाता है और नष्ट हो जाता है। हालांकि, अगर कोई बड़ा पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर जाए और यह पूरी तरह से नष्ट न हो तो इसके और भी विनाशकारी परिणाम देखने को मिल सकते हैं। ऐसे में अब उत्तराखंड में जो लिक्विड मिरर टेलीस्कोप स्थापित किया गया है, वो अंतरिक्ष में मौजूद कचरे से संबंधित जानकारी देने में मदद करेगा। यह पूरी दुनिया के लिए मददगार साबित हो सकता है।

और पढ़ें: ISRO ने शुरू किया प्रोजेक्ट ‘नेत्र’, अब अंतरिक्ष में उपग्रहों को डेब्रीज से नहीं पहुंचेगा नुकसान

Tags: ARIESILMTआकाशगंगा
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