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पश्चिमी देश ग्लोबल वार्मिंग पर डर का माहौल बनाकर रखते हैं, दशकों से बेवकूफ बना रहे हैं

इनकी 'भविष्यवाणी' आजतक कभी भी सही साबित नहीं हुई!

Ruchi Mehra द्वारा Ruchi Mehra
20 July 2022
in चर्चित
Global Warming

Source- TFIPOST.in

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किसी को भी अपने जाल में फंसाए रखने का एक सबसे अच्छा तरीका है डर। इसके जरिए लोग आसानी से चंगुल में फंस रहते है। यही काम पिछले कई दशकों से पश्चिमी देश करते आ रहे है। पश्चिमी देशों द्वारा सबसे बड़ा पर्यावरण प्रेमी का दिखावा किया जाता रहा है। वो हमेशा ही यह दिखाने का प्रयास करते आए है कि पर्यावरण का उनसे बड़ा चिंतक कोई और नहीं। परंतु देखा जाए तो यह पिछले कई सालों से पर्यावरण के नाम पर तरह-तरह की डरावनी और फर्जी भविष्यवाणी कर दुनिया को उल्लू भी बनाते आए है। तेल भंडार समाप्त होने से लेकर हिमयुग, ओजोन परत रिक्तीकरण और ग्लोबल वार्मिंग तक पश्चिम द्वारा कई ऐसी भविष्यवाणी की गई, जो आज तक सही साबित नहीं हो पाई। आज हम जानेंगे कि कैसे अपनी डरावनी भविष्यवाणी के जरिए पश्चिम द्वारा सालों से लोगों को बेवकूफ बनाने का काम किया जा रहा है।

और पढ़ें: पीएम मोदी ने स्पष्ट शब्दों में संदेश दे दिया, ग्लोबल वार्मिंग के लिए पश्चिमी देश जिम्मेदार हैं

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1960 में तेल भंडार खत्म की भविष्यवाणी

1960 का दशक वो समय था जब विश्व में पर्यावरण के मुद्दे ने जोर पकड़ा। इसी दौर यह अफवाह तेजी से फैलाई जाने लगी कि हमारा तेल भंडार तेजी से खत्म हो रहा है। वैसे तो तेल भंडार खत्म होने की संभावना तो कई सालों से जताई जा रही थी, परंतु इस भविष्यवाणी ने तूल 1960 के दशक के दौरान ही पकड़ा। जब कुछ विशेषज्ञों द्वारा यह भविष्यवाणी की जाने लगी कि अगले 10 वर्षों में हमारा तेल भंडार समाप्ति की कगार पर पहुंच जाएगा। परंतु ऐसा हुआ क्या? नहीं। जब विशेषज्ञों द्वारा तेल भंडार खत्म होने की चेतावनी दी थी कि तब उन्होंने इस तर्क को नहीं समझा कि आने वाले समय में अधिक तेल भंडार की खोज की संभावना थी। यही कारण है कि इन तथाकथित विशेषज्ञों की चेतावनी सत्य साबित नहीं हो पाई और आज तक तेल भंडार खत्म होने का झूठ लगातार चलाया जा रहा है।

हिमयुग की वापसी

जब लोगों को धीरे-धीरे तेल को लेकर की गई भविष्यवाणी की सच्चाई समझ में आने लगी। तो 1970 में यह तथाकथित विशेषज्ञ नया जुमला लेकर आए हिमयुग का। 1970 के दशक में हमें ग्लोबल कूलिंग की कहानी परोसी जाने लगी। 1970 के दशक में कुछ प्रेस रिपोर्टों ने निरंतर शीतलन के बारे में अनुमान लगाया गया। 1970 के मध्य तक तापमान में निरंतर गिरावट के चलते बोला जाता था कि पृथ्वी ठंडी हो रही है और हिमयुग की वापसी होने वाली है। परंतु ऐसा कुछ भी हुआ नहीं। हिमयुग नहीं आया, जिससे साबित हुआ कि केवल इसकी बातें करके लोगों को भ्रमित करने की कोशिश की गई।

और पढ़ें: जीवाश्म ईंधन किसे कहते है, उत्पत्ति, लाभ, प्रभाव एवं नुकसान

एसिड वर्षा को लेकर अफवाह

हिमयुग की थ्योरी भी जब फेल हो गई तो भी अफवाह फैलाने का सिलसला थमा नहीं। 1980 के दशक में एक नई भविष्यवाणी की जाने लगी एसिड रेन यानी तेजाब की वर्षा को लेकर। 1980 के दशक से अम्लीय वर्षा को लेकर खूब बातें की जाती थी कि कैसे हमारे पर्यावरण को लेकर एसिड रेन एक बड़ा खतरा बनती जा रही है। यह पेड़-पौधों, जलीय जंतुओं और इंसानों के लिए नुकसानदेही मानी गई। 80 के दशक में ऐसे दावे किए जाने लगे कि अगले 10 वर्षों में एसिड रेन फसलों को बर्बाद करके रख देगी। परंतु 1990 में स्टडी के द्वारा यह स्पष्ट किया कि अम्लीय वर्षा पर्यावरणीय संकट नहीं है।

इसी तरह 1990 के दशक में ओजोन परत में छेद को एक गंभीर वैश्विक संकट बनाया गया था। 1990 के दशक के दौरान दावा किया जाने लगा कि अगले 10 वर्षों में ओजोन परत बर्बाद हो जाएगी। हालांकि इस दावे के पीछे कुछ आधार भी था। यह सच्चाई थी कि ओजोन परत का छेद बढ़ रहा था और यह हमारे लिए बड़ा खतरा भी बन रहा था। परंतु 10 सालों में ओजोन बर्बाद होने के माध्यम से एक डर लोगों के दिमाग में बैठाने के प्रयास किए गए। आज के समय की बात की जाए तो ओजोन छेद काफी हद तक सिकुड़ चुका है।

ठीक इसी तरह 2000 के दशक से बर्फ पिघलने को लेकर भी एक डर लोगों के दिमाग में बैठाया जा रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञों द्वारा यह चेतावनी दी जाती रही है कि ग्लोबल वार्मिंग तेजी से बढ़ रही है, जिस कारण तेजी से बर्फ पिघल रही है और अगर ऐसा ही चलता रहा तो कई शहर डूब सकते है। विशेषज्ञों द्वारा लंबे समय से मालदीव के डूबने के दावे किए जाते रहे है। ऐसा नहीं है कि ग्लोबल वार्मिंग एक गंभीर मुद्दा नहीं है। यकीनन ग्लोबल वार्मिंग चिंता का विषय है और इस पर पूरे विश्व को एकजुट होकर काम करने की भी आवश्यकता है। परंतु पश्चिमी देशों के द्वारा तो ग्लोबल वार्मिंग को लेकर ज्ञान ही दिया जाता रहा है और इसके माध्यम से यह दुनिया को डराने की कोशिश भी करते है। यह तथाकथित विकसित देश इसे कम करने के लिए कुछ पर्याप्त कदम उठाते नजर नहीं आते।

और पढ़ें: हरित ऊर्जा पर सिर्फ और सिर्फ अन्य देशों को ज्ञान देते हैं पश्चिमी देश, स्वयं कुछ नहीं करते

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