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साईं की सच्चाई: शिरडी साईं बाबा का जीवन और समय- मूल कहानी

इस विशेष सीरीज़ में हम शिरडी साईं की वास्तविक सच्चाई आपके सामने लेकर आएंगे। पहले दिन पढ़िए 'साईं बाबा' बनने की वास्तविक कहानी।

Animesh Pandey द्वारा Animesh Pandey
29 September 2022
in ज्ञान
sai baba
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“शिरडी वाले साईं बाबा, आया है तेरे दर पे सवाली”

“साईं राम, साईं श्याम, दुख भंजन तेरो नाम”

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ऐसे नाना प्रकार के भजन और गीत आपने इस व्यक्ति के बारे में सुने ही होंगे। यह देव अपने आप में एक विचित्र माया है। इन्हें कुछ शब्दों में सीमित करना बहुत अजीब है। कुछ लोगों के लिए ये अतुलनीय है, तो कुछ के लिए यह ढोंगी, कुछ के लिए यह देवों के देव है, तो कुछ के लिए यह औघड़ प्राणी है। पर आखिर हैं कौन यह साईं बाबा, जिनकी कथाओं से आज भी लोगों का मन नहीं भरा है?

इसका मूल कारण है Bubonic Plague महामारी। जैसे आज कोविड ने एक समय त्राहिमाम मचा दिया था, वैसे ही 20वीं शताब्दी से पूर्व Bubonic plague ने भी हाहाकार मचाया था। चूहों के आतंक से संपूर्ण जगत आतंकित था और भारत में भारी संख्या में लोग मर रहे थे। लोग अब दवा पर कम, प्रार्थना के अधिक भरोसे थे। परंतु कुछ लोगों का आस्था पर से भी विश्वास उठने लगा, क्योंकि जब अपने ही साथ न हो, तो आस्था कितनी देर टिकती?

तो इससे साईं बाबा का क्या नाता?

पुणे के निकट पंधारपुर जिला में स्थित शिरडी में भी प्लेग की महामारी फैली हुई थी। वहां लोग अपनी आस्था से तंग आने लगे थे। ऐसे में उन्हें आवश्यकता थी एक ऐसे व्यक्ति की, जो तुरंत उनके दुख दर्द दूर करें, जो इंस्टेंट मुक्ति दिलाए। तो प्रकट हुए साईं।

और पढ़े: सत्य साईं कोई ‘बाबा’ नहीं एक औसत जादूगर थे, ये रहे उनके कर्मकांड के काले चिट्ठे

साईं बाबा का जन्म

साईं बाबा का जन्म कब और कहां हुआ था एवं उनके माता-पिता कौन थे, इस बारे में कोई ऐतिहासिक प्रमाण मिलना कठिन है। उनके जन्मस्थान एवं तिथि की बात वास्तव में उनके अनुयायियों के विश्वास एवं श्रद्धा पर आधारित हैं। शिरडी साईं बाबा के अवतार माने जाने वाले श्री सत्य साईं बाबा ने अपने पूर्व रूप का परिचय देते हुए शिरडी साईं बाबा के प्रारंभिक जीवन संबंधी घटनाओं पर प्रकाश डाला है, जिससे ज्ञात होता है कि उनका जन्म 28 सितंबर 1835 में तत्कालीन हैदराबाद राज्य के पाथरी नामक गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। किसी दस्तावेज से इसका प्रामाणिक पता नहीं चलता है। स्वयं शिरडी साईं ने इसके बारे में कुछ नहीं बताया।

एक जनश्रुति के अनुसार-

एक बार श्री साईं बाबा ने अपने एक अंतरंग भक्त म्हालसापति को, जो कि बाबा के साथ ही मस्जिद तथा चावड़ी में शयन करते थे, बताया था कि “मेरा जन्म पाथर्डी (पाथरी) के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। मेरे माता-पिता ने मुझे बाल्यावस्था में ही एक फकीर को सौंप दिया था।” जब यह चर्चा चल रही थी तभी पाथरी से कुछ लोग वहां आये तथा बाबा ने उनसे कुछ लोगों के संबंध में पूछताछ भी की।

ऐसे ही जन्मतिथि एवं स्थान की तरह ही साईं के माता-पिता के बारे में भी प्रमाणिक रूप से कुछ भी ज्ञात नहीं है। श्री सत्य साईं बाबा द्वारा दिए गए पूर्वोक्त विवरण के अनुरूप उनके पिता का नाम श्री गंगा बावड़िया एवं उनकी माता का नाम देवगिरि अम्मा माना जाता है। ये दोनों भगवान शिव और माता पार्वती के उपासक थे तथा शिव के आशीर्वाद से ही उनके संतान हुई थी। कहा जाता है कि जब साईं अपनी मां के गर्भ में थे उसी समय उनके पिता के मन में ब्रह्म की खोज में अरण्यवास की अभिलाषा तीव्र हो गयी थी।

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मुसलमान फकीर ने किया लालन-पालन

वे अपना सब कुछ त्याग कर जंगल में निकल पड़े थे। उनके साथ उनकी पत्नी भी थी। मार्ग में ही उन्होंने बच्चे को जन्म दिया था और पति के आदेश के अनुसार उसे वृक्ष के नीचे छोड़कर चली गयी थी। एक मुस्लिम फकीर उधर से निकले जो निःसंतान थे। उन्होंने ही उस बच्चे को अपना लिया और प्यार से ‘बाबा’ नाम रखकर उन्होंने उसका पालन-पोषण किया।

बाबा का लालन-पालन एक मुसलमान फकीर के द्वारा हुआ था, परंतु बचपन से ही उनका झुकाव विभिन्न धर्मों की ओर था लेकिन किसी एक धर्म के प्रति उनकी एकनिष्ठ आस्था नहीं थी। कभी वे हिन्दुओं के मंदिर में घुस जाते थे तो कभी मस्जिद में जाकर शिवलिंग की स्थापना करने लगते थे। इससे न तो गांव के हिंदू उनसे प्रसन्न थे और न मुसलमान। निरंतर उनकी शिकायतें आने के कारण उनको पालने वाले फकीर ने उन्हें अपने घर से निकाल दिया। साईं के जितने वृत्तांत प्राप्त हैं वे सभी उनके किसी न किसी चमत्कार से जुड़े हुए हैं। ऐसे ही एक वृत्तांत के अनुसार औरंगाबाद जिले के धूप गांव के एक धनाढ्य मुस्लिम सज्जन की खोयी घोड़ी बाबा के कथनानुसार मिल जाने से उन्होंने प्रभावित होकर बाबा को आश्रय दिया और कुछ समय तक बाबा वहीं रहे।

अब बाबा पहली बार सोलह वर्ष की उम्र में शिरडी में एक नीम के पेड़ के तले पाए गए थे। उनके इस निवास के बारे में कुछ चमत्कारिक कथाएं प्रचलित हैं। कुछ समय बाद वे वहां से अदृश्य हो गए थे। पुनः शिरडी आने एवं उसे निवास स्थान बनाने के संदर्भ में कथा है कि चांद पाटिल के आश्रय में कुछ समय तक रहने के बाद एक बार पाटिल के एक निकट संबंधी की बारात शिरडी गांव गयी जिसके साथ बाबा भी गए। विवाह संपन्न हो जाने के बाद बारात तो वापस लौट गयी परंतु बाबा को वह जगह काफी पसंद आयी और वे वही एक जीर्ण-शीर्ण मस्जिद में रहने लगे और आयु पर्यंत वहीं रहे।

अब प्रश्न ये उठता है कि बंधु को मस्जिद ही क्यों मिली, कोई और स्थान क्यों नहीं? वे किसी पेड़ के नीचे भी रह लेते, किसी कुटिया में भी रह सकते थे। क्या इससे उनका स्थान कम हो जाता? परंतु इसके स्वयं साईं जानें और उनके परम प्रिय भक्त।

और पढ़े: शनि देवता महानगरों के ‘भगवान’ कैसे बन गए?

‘साईं’ नाम से प्रसिद्ध हो गए

अब कहा जाता है कि चांद पाटिल के संबंधी की बारात जब शिरडी गांव पहुंची थी तो खंडोबा के मंदिर के सामने ही बैल गाड़ियां खोल दी गयी थीं और बारात के लोग उतरने लगे थे। वहीं एक श्रद्धालु व्यक्ति म्हालसापति ने तरुण फकीर के तेजस्वी व्यक्तित्व से अभिभूत होकर उन्हें ‘साईं’ कहकर सम्बोधित किया। धीरे-धीरे शिरडी में सभी लोग उन्हें ‘साईं’ या ‘साईं बाबा’ के नाम से ही पुकारने लगे और इस प्रकार वे ‘साईं’ नाम से प्रसिद्ध हो गए।

साईं बाबा का पालन-पोषण मुसलमान फकीर के द्वारा हुआ था और बाद में भी वे प्रायः मस्जिदों में ही रहे। उन्हें लोग सामान्यतया मुस्लिम फकीर के रूप में ही जानते थे। वे निरंतर अल्लाह का स्मरण करते थे। वे ‘अल्लाह मालिक’ कहा करते थे। हालांकि उन्होंने सभी धर्मों की एकता पर बल दिया है और विभिन्न धर्मावलंबियों को अपने आश्रय में स्थान देते थे। उनके अनुयायी हिन्दू और मुसलमान दोनों थे। उनके आश्रयस्थल (मस्जिदों) में हिन्दुओं के विभिन्न धार्मिक पर्व भी मनाए जाते थे और मुसलमानों के भी। उन्होंने हिंदू धर्म-ग्रंथों के अध्ययन को भी प्रश्रय दिया था। उस समय भारत के कई प्रदेशों में हिन्दू-मुस्लिम द्वेष व्याप्त था, परंतु उनका संदेश था: ‘सबका मालिक एक!’ ये उनका नारा बन गया, जिसके बल पर आज तक उनके अनुयायी उनका नाम जपते हैं, आगे आप समझदार हैं।

अब विजयदशमी एक ऐसा उत्सव है, जिसपर सम्पूर्ण राष्ट्र उत्सव मनाता है, परंतु साईं भक्तों के लिए ये मातम का समय होता है। 15 अक्टूबर 1918 को इसी दिन साईं बाबा ने अपनी देह त्यागी थी क्योंकि उनके भक्त पर संकट आन पड़ा था। परंतु ये कितना सत्य था और कितना असत्य, ये आज तक पता नहीं चला है। कहीं इसीलिए तो शिरडी के पीठाधीशों ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र में दान देने से मना तो नहीं किया?

और पढ़े: प्राचीन महावीर हनुमान मन्दिर पटना का इतिहास, प्रसाद एवं विस्तार

ये तो ठहरी साईं बाबा के उद्भव की बात, परंतु साईं बाबा जो धूनी रमाये रहते थे, अचानक स्वर्ण सिंहासन और असंख्य भक्तों के भागी कैसे बने? और उनके सत्य को उजागर करने वाले को हेय की दृष्टि से क्यों देखा जाए? इसके बारे में भी चर्चा करनी होगी, परंतु उसके बारे में फिर कभी।

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Tags: Bubonic PlagueSai babaश्री सत्य साईं बाबासाईं बाबा
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