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वैसे दो क्रांतिकारियों को भारत भूमि वापस लाने के लिए दशकों की प्रतीक्षा करनी पड़ी

दो क्रांतिकारी को जोड़ती एक अनोखी कड़ी

Animesh Pandey द्वारा Animesh Pandey
12 March 2023
in इतिहास
वैसे दो क्रांतिकारियों को भारत भूमि वापस लाने के लिए दशकों की प्रतीक्षा करनी पड़ी
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1974। दिल्ली एयरपोर्ट पर कई सरकारी उच्चाधिकारी और इंदिरा गांधी के नेतृत्व में केन्द्रीय प्रशासन कुछ लोगों की प्रतीक्षा कर रहे थे। आखिरकार हवाई जहाज़ एयरपोर्ट पर उतरा, और उक्त हस्तियों में से एक निकले। परंतु ये कोई जीवित व्यक्ति नहीं थे, ये मृत शरीर के अवशेष थे, जिनमें से एक को तीन दशकों से भी अधिक समय बाद, और एक को छह दशक से भी अधिक समय बाद भारत भूमि में “तर्पण” का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

इस लेख में पढ़िए कैसे दो क्रांतिकारी एक ही स्थान पर भारत माँ की स्वतंत्रता हेतु अपने प्राण अर्पण किये, और कैसे दशकों बाद दोनों को भारत भूमि वापस लाने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगाना पड़ा।

उधम सिंह और मदनलाल ढींगरा

पता है उधम सिंह और मदनलाल ढींगरा में क्या समान बात है? एक के समक्ष गदर पार्टी की नींव रखी जा रही थी, और दूसरे ने उनके आदर्शों से प्रेरित होकर असंभव को भी संभव कर दिखाया। परंतु दोनों में एक और बात समान है : लंदन का पेंटनविल कारागार, जहां दोनों को मृत्युदंड दिया गया, और दोनों के अवशेष कई वर्षों तक पड़े रहे।

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परंतु इन दोनों क्रांतिवीरों को ऐसे अनदेखा क्यों किया गया? कारण तो अनेक है, परंतु एक बात स्पष्ट थी : दोनों क्रांतिकारी थे, जो गांधी और नेहरू की विचारधारा के ठीक विपरीत था।

और पढ़ें: “इस बैठक के बाद स्वतंत्रता आंदोलन की तस्वीर बदल गई”, वीर सावरकर और नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने क्या बातचीत की थी?

मॉर्ले मिंटो रिफॉर्म्स की घोषणा

जब मॉर्ले मिंटो रिफॉर्म्स की घोषणा हुई, तो कई भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों ने इसका विरोध किया। इसी बीच क्रांतिकारियों ने अंग्रेज़ों को सबक सिखाने की योजना बनाई। इसमें मदनलाल ढींगरा अग्रणी रहे। अमृतसर में अंग्रेज़ समर्थक परिवार के घर जन्मे मदनलाल को ब्रिटिश साम्राज्यवाद से बचपन से ही घृणा था। इसके पीछे इन्होंने अपने परिवार से नाता ही तोड़ लिया था।

इसी बीच 1 जुलाई 1909 को ब्रिटिश प्रशासन के कई उच्चाधिकारी इम्पेरियल इंस्टीट्यूट में इंडियन असोसिएशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में भाग लेने आए थे, जिनमें से एक भारत में स्थित सेक्रेटरी ऑफ स्टेट के राजनीतिक सहायक विलियम कर्ज़न विली भी थे।

इनपर मदनलाल ढींगरा ने ताबड़तोड़ गोलियां बरसाई, और विलियम कर्ज़न को बचाने आगे आए पारसी डॉक्टर कवासजी लालकाका भी क्रॉस फायरिंग में मारे गए।

मदनलाल को हिरासत में लिया गया  और कुछ ही समय बाद 17 अगस्त 1909 में उन्हे मृत्युदंड दिया गया। परंतु कथा यहाँ से बस प्रारंभ ही हुई थी।

जब अंग्रेज़ों के दबाव में कुछ भारतीयों ने मदनलाल ढींगरा के निंदा में एक प्रस्ताव पारित करने का निर्णय लिया। परंतु जैसे ही ये दावा किया जाने लगा कि यह निर्णय “सर्वसम्मति से लिया गया है”, एक युवक ने आगे बढ़कर उद्घोष किया, “नहीं, ये सर्वसम्मति से लिया गया निर्णय नहीं!” ये ओजस्वी व्यक्ति कोई और नहीं, भारत के प्रखर राष्ट्रवादी, “स्वातंत्र्यवीर” विनायक दामोदर सावरकर थे।

और पढ़ें: ‘वीर सावरकर को पूजती थीं इंदिरा गांधी’, विक्रम संपत ने कांग्रेसियों का धागा खोल दिया!

वे तब तक भारत माता के समर्थन में नारे लगाते रहे, जब तक उन्होंने पीटपीटकर समारोह स्थल कैक्स्टन हॉल [Caxton Hall] से धक्के मारकर नहीं निकाला गया।

कैक्स्टन हॉल [Caxton Hall]? ये नाम कुछ सुना सुना सा नहीं लग रहा है? होगा क्यों नहीं, इसी स्थल पर 31 वर्ष बाद एक और ऐसी ही सभा आयोजित की गई। ईस्ट इंडियन असोसिएशन और रॉयल सेंट्रल एशियन सोसाइटी की अध्यक्षता में एक विशेष सभा आयोजित की गई, जिसके अतिथियों में कई ‘गणमान्य’ अतिथि सम्मिलित थे। इनमें एक थे लॉर्ड जेटलैंड, जो तत्कालीन ब्रिटिश इंडिया के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट थे, और उनके साथ आए थे अविभाजित पंजाब के पूर्व लेफ्टिनेंट गवर्नर, माइकल ओ डवायर। ये वही दानव  था, जिसने जलियाँवाला बाग के नरसंहार की स्वीकृति दी थी, और जिसने इसे समय की मांग कहकर उचित ठहराया था।

भारत भूमि में “तर्पण” का सौभाग्य

परंतु जैसे ही इस व्यक्ति ने अपना भाषण समाप्त किया, एक व्यक्ति सभा में से एक उठ खड़ा हुआ, और देखते ही देखते कई गोलियां इस राक्षस के शरीर में उतार दी।

ये थे उधम सिंह कंबोज, जिन्होंने जलियाँवाला बाग नरसंहार को करीब से देखा था, और जो प्रारंभ से भारत को स्वतंत्र करने के लिए अपना सर्वस्व अर्पण करने को तैयार थे।

वे प्रारंभ में जलियाँवाला बाग नरसंहार का ऑर्डर देने वाले ब्रिगेडियर जनरल रेजीनाल्ड डायर को मारना चाहते थे, परंतु उसका निधन 1927 में ही मस्तिष्क रोग से हो गया था। अब निशाने पर था माइकल ओ डवायर, जिसे 13 मार्च 1940 को उधम सिंह ने संहार करके ही दम लिया।

उधम सिंह ने भागने का कोई प्रयास नहीं किया, और शीघ्र ही उन्हे हिरासत में लिया गया। उन्हे मृत्युदंड सुनाया गया, और जिस वेदी पर मदनलाल ढींगरा को मृत्युदंड दिया गया, वहीं पर 31 जुलाई 1940 को उधम सिंह को फांसी पर लटका दिया गया। मदनलाल ढींगरा की भांति इनके पार्थिव शरीर को भारत नहीं भेजा गया, और पेंटनविल जेल के ही प्रांगण में उन्हे दफना दिया गया।

फिर 1974 आते आते पंजाब के विधायक साधु सिंह थिन्ड ने अभियान चलाया, ताकि उधम सिंह के अवशेषों को भारत लाया जा सके। जब भारतीय उच्चाधिकारियों की अनुमति स्वीकृत हुई, तो उधम सिंह के अवशेष लाने की तैयारी हुई। इसी बीच मदनलाल ढींगरा के अवशेष भी संयोगवश मिल गए, परंतु दोनों को वापस लाने में एड़ी चोटी का ज़ोर लगाना पड़ा। अगस्त 1974 में जहां उधम सिंह के अवशेष भारत आए, तो वहीं कागज़ी कार्रवाई पूरी होने के बाद सितंबर 1976 में  मदनलाल ढींगरा के पार्थिव शरीर को भारत लाया गया।  आज भी इनके शौर्य और इनके कर्तव्यपरायणता से अधिकांश देश अनभिज्ञ है।

Sources:

Revolutionaries: The Other Story of how India won its Freedom by Sanjeev Sanyal

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