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क्या ईरान के साथ भी अमेरिका वही कर सकता है, जो उसने वेनेजुएला और मादुरो के साथ किया है ?

इज़राइल और अमेरिका ईरान की मौजूदा स्थितियों का फायदा उठाते हुए सीधा दख़ल दे सकते हैं? हालांकि, तीखी बयानबाज़ी और बढ़ते तनाव के बावजूद, अमेरिका या इज़राइल ईरान में कोई सीधा सैन्य हस्तक्षेप करेंगे- इसकी संभावना कम ही नज़र आ रही है।

Kashish Mishra द्वारा Kashish Mishra
6 January 2026
in विश्व
कट्टर इस्लामी आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने की अपील

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जैसे-जैसे ईरान में विरोध प्रदर्शन जारी हैं, मध्य-पूर्व में भू-राजनीतिक पारा एक बार फिर बढ़ता जा रहा है। विश्लेषकों का एक बड़ा वर्ग वेनेज़ुएला में की गई अमेरिकी कार्रवाई की ईरान से तुलना करते हुए ये सवाल पूछ रहा है कि क्या अमेरिका ने जो कुछ वेनेजुएला में किया, वैसा ही कुछ वो ईरान में भी कर सकता है ? क्या इज़राइल और अमेरिका ईरान की मौजूदा स्थितियों का फायदा उठाते हुए सीधा दख़ल दे सकते हैं? हालांकि, तीखी बयानबाज़ी और बढ़ते तनाव के बावजूद, अमेरिका या इज़राइल ईरान में कोई सीधा सैन्य हस्तक्षेप करेंगे- इसकी संभावना कम ही नज़र आ रही है।

ईरान के भीतर मौजूदा अशांति की जड़ें मुख्य रूप से घरेलू चुनौतियों और मुसीबतों में छिपी हैं। ईरान के अलग-अलग शहरों में कई दिनों से जारी ये प्रदर्शन गहरे आर्थिक असंतोष, महंगाई, बेरोज़गारी और शासन व जवाबदेही से जुड़े पुराने मुद्दों से प्रेरित हैं। इस्लामी शासन के ख़िलाफ़ हुए इन प्रदर्शनों को कुचलने के लिए ताक़त का इस्तेमाल किया गया और सुरक्षाबलों के साथ हुई झड़प में कई लोगों के मारे जाने की जानकारी है।

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इन घटनाओं पर वाशिंगटन और तेल अवीव की भी तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं। डोनॉल्ड ट्रम्प ने तेहरान की चेतावनी दी है कि अगर आम लोगों पर गोलियां चलाईं गईं तो अमेरिका इसका बदला लेगा। लेकिन ईरान में अमेरिका के लिए सीधे हस्तक्षेप की क़ीमत रणनीतिक और सैन्य लिहाज़ से इतनी ज्यादा है कि ट्रम्प फ़िलहाल ये क़ीमत चुकाने को शायद ही तैयार हों।ईरान के विरोध प्रदर्शनों की वजह घरेलू या फिर विदेशी साज़िश ?ईरान के खामनेई नेतृत्व ने इन प्रदर्शनों को बाहरी ताक़तों की साज़िश बताने की कोशिश की है और आरोप लगाया है कि विदेशी शक्तियाँ देश की समस्याओं का फायदा उठाकर ईरान को अस्थिर करना चाहती हैं। लेकिन अधिकांश विश्लेषकों का मानना है कि इन विरोधों की जड़ें देश के भीतर ही हैं।

वर्षों से लागू अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते ईरान पर जबरदस्त आर्थिक दबाव है और ये लगातार गहराता जा रहा है। इससे आम लोगों की जेब और सरकार पर उनका भरोसा कमजोर हुआ है। ईरानी रियाल की क़ीमत एक डॉलर के मुकाबले 42,000 पहुँच चुकी है। खाने-पीने की चीज़ें बेतहाशा महंगी हैं और रोज़गार के अवसर लगातार घट रहे हैं। शासन में पारदर्शिता की कमी और मूलभूत नागरिक अधिकारों के दमन ने कोढ़ में खाज का काम किया, जिसकी वजह से सरकार और समाज के बीच की दूरियां और बढ़ गई हैं।इसके बावजूद, खामनेई के नेतृत्व वाली इस्लामी सत्ता का ईरान और वहां की संस्थाओं पर नियंत्रण अभी भी काफी मज़बूत है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स सहित सुरक्षा तंत्र अभी भी अपने शासकों के लिए वफ़ादार और पर्याप्त सक्षम हैं। यही वजह है कि केवल विरोध प्रदर्शनों के आधार पर शासन के गिरने या वेनेजुएला, लीबिया या अथवा इराक जैसे बाहरी सैन्य हस्तक्षेप की संभावना कम दिखाई देती है।

ईरान के प्रदर्शन और अमेरिका की रणनीतिक सावधानी
संयुक्त राज्य अमेरिका ने बयानबाज़ी के स्तर पर काफी तीखा रुख अपनाया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से ईरान को चेतावनी दी कि प्रदर्शनकारियों की हत्या न की जाए, और कहा कि यदि ऐसा हुआ तो अमेरिका “लॉक्ड एंड लोडेड” है। ऐसे बयान प्रदर्शनकारियों के साथ एकजुटता और प्रतिबद्धता दिखाने के लिए तो ठीक हो सकते हैं। लेकिन ट्रम्प उनके लिए ईरान में सेना उतार देंगे- फ़िलहाल तो ऐसा नहीं लगता।इतिहास बताता है कि ईरान के प्रति अमेरिकी नीति हमले की बजाय दबाव पर आधारित रही है। अमरिका, ईरान को कमज़ोर करने के लिए अभी तक प्रतिबंध, कूटनीतिक अलगाव, साइबर ऑपरेशन और कोवर्ट मिशन को ही हथियार की तरह इस्तेमाल करता आया है।अमेरिका जानता है कि उसका सीधा सैन्य हमला पूरे क्षेत्र को युद्ध में झोंक सकता है—जिसकी आँच फ़ारस की खाड़ी, इराक, सीरिया और लेबनान तक भी पहुंचेगी।इसके अलावा, वेनेज़ुएला के विपरीत ईरान पूरी तरह कूटनीतिक रूप से अलग-थलग नहीं है। रूस और चीन के साथ उसके रणनीतिक रिश्ते हैं, जो किसी भी एकतरफ़ा अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का कड़ा विरोध करेंगे। यह वैश्विक संदर्भ वाशिंगटन के विकल्पों को काफी सीमित कर देता है।

तेहरान की प्रतिक्रिया: संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय क़ानून
ईरानी अधिकारियों ने अमेरिकी बयानों को सख़्ती से खारिज किया है। वरिष्ठ नेता अली लारीजानी ने इसे ईरान के आंतरिक मामलों में खुला हस्तक्षेप बताया और संप्रभुता व अंतरराष्ट्रीय क़ानून के सिद्धांतों का हवाला दिया। तेहरान ने साफ कर दिया है कि विरोध प्रदर्शन उसका घरेलू मसला हैं और इसमें किसी भी प्रकार के बाहरी दख़ल को शत्रुतापूर्ण माना जाएगा। यही नहीं ईरान पर बाहरी (सैन्य) हस्तक्षेप के लिए किसी प्रकार की अंतर्राष्ट्रीय वैधता को जुटाना भी मुश्किल है।

ईरान के प्रदर्शन और इज़राइल की भूमिका
इज़राइल की भूमिका अपेक्षाकृत अस्पष्ट बनी हुई है। तेल अवीव लंबे समय से ईरान को अपना सबसे बड़ा रणनीतिक ख़तरा मानता है, ख़ासकर उसके परमाणु कार्यक्रम और हिज़्बुल्लाह जैसे संगठनों को समर्थन के कारण। इज़राइली नेतृत्व ने ईरान पर अमेरिकी दबाव का समर्थन किया है और कहा है कि अगर उसकी सुरक्षा को सीधा ख़तरा हुआ तो वो एकतरफ़ा कार्रवाई से भी नहीं चूकेगा।
फिर भी, ईरान के आंतरिक संकट में इज़राइल की सीधी सैन्य भागीदारी अनिश्चित है। ऐसा कोई भी कदम इज़राइल को लेबनान से लेकर ग़ाज़ा, सीरिया और संभवतः रेड सी तक, यानी कई मोर्चों पर लड़ने के लिए मजबूर कर सकता है। पहले से ही युद्ध में फंसे इज़राइल के लिए सीधे सैन्य टकराव की जगह अमेरिकी प्रतिबंधों, खुफ़िया अभियानों और कूटनीतिक दबाव के साथ खड़ा रहना कहीं ज़्यादा सुरक्षित है।

ईरान पर अमेरिका और इज़राइल की अगली रणनीति क्या हो सकती है ?
इन तमाम तथ्यों को ध्यान में रखें तो अमेरिका के इस इलाके में किसी बड़े सैन्य अभियान को छेड़ने की आशंका काफी सीमित दिखाई देती है। ईरान पर दबाव बढ़ाने के लिए ट्रम्प पुराने पैंतरे आजमाते रहेंगे इसकी संभावना ज्यादा है।अमेरिका ईरान पर प्रतिबंधों का दायरा और बढ़ा सकता है, कोवर्ट ऑपरेशंस के जरिए ईरानी अधिकारियों और उसके प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया जा सकता है। साथ ही अंतरराष्ट्रीय मंच पर ईरान को अवैध और अलग-थलग ठहराने वाली कूटनीतिक तो जारी रहेगी ही।यह रणनीति वाशिंगटन के लिए कहीं ज्यादा मुफीद है, जिसका लक्ष्य है- जंग की अनिश्चितता से बचते हुए ईरान को आर्थिक और राजनीतिक रूप से कमज़ोर करना। इज़राइल भी इसी राह पर चलते हुए अमेरिका के साथ क़रीबी तालमेल बनाए रखेगा, और तभी कोई आक्रामक कदम उठाएगा, जब ईरान की तरफ़ से कोई लक्ष्मण रेखा पार होगी।

ईरान की स्थिति निस्संदेह अस्थिर है। लेकिन अभी भी वह सीमा पार नहीं हुई है जहाँ अमेरिका या इज़राइल के लिए किसी प्रकार के सीधे हस्तक्षेप की स्थिति बन सके। फिर भी, ग़लत आकलन का ख़तरा बना हुआ है। अगर प्रदर्शनकारियों की बड़े पैमाने पर हत्याएँ होती हैं या अमेरिकी अथवा इज़राइली हितों पर हमला होता है, तो हालात बदल भी सकते हैं।

Tags: AmericadonaldIrantehranWashingtonईरानडोनॉल्ड ट्रम्पवाशिंगटन
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