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एक फोन कॉल और बढ़ती नाराज़गी—भारत को लेकर ट्रंप क्यों खफा

भारत के खिलाफ ट्रंप की कार्रवाइयाँ व्यापारिक कारणों से कम और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सीधे बातचीत से इनकार किए जाने से आहत उनके अहंकार से ज़्यादा प्रेरित दिखीं।

Kashish Mishra द्वारा Kashish Mishra
9 January 2026
in भारत, विश्व
एक फोन कॉल और बढ़ती नाराज़गी—भारत को लेकर ट्रंप क्यों खफा

“व्यक्तिगत नाराज़गी या व्यापार नीति

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अपने स्वभाव के अनुरूप, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर शोर-शराबे और आर्थिक दबाव की नीति अपनाई। उन्होंने टैरिफ़ को व्यापार नीति के औज़ार की बजाय व्यक्तिगत नाराज़गी के हथियार की तरह इस्तेमाल किया। भारत के खिलाफ ट्रंप की कार्रवाइयाँ व्यापारिक कारणों से कम और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सीधे बातचीत से इनकार किए जाने से आहत उनके अहंकार से ज़्यादा प्रेरित दिखीं।

दरअसल, प्रधानमंत्री मोदी ने न तो द्विपक्षीय व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के लिए ट्रंप से सीधे बातचीत की और न ही उनकी शर्तों के आगे झुकने को तैयार हुए। इसकी कीमत भारत को चुकानी पड़ी — उस पर 50 प्रतिशत का कड़ा टैरिफ़ लगा दिया गया, और आगे और शुल्क लगाए जाने का ख़तरा अब भी बना हुआ है।

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एक अहम खुलासे में अमेरिका के वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक ने कहा कि लंबे समय से लंबित भारत–अमेरिका व्यापार समझौता किसी नीतिगत मतभेद के कारण नहीं, बल्कि इसलिए टूट गया क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप से सीधे बात करने से इनकार कर दिया।

लुटनिक ने यह टिप्पणी उद्यमी चामथ पालिहापिटिया द्वारा होस्ट किए गए ऑल-इन पॉडकास्ट में की। इससे ऐसे नेता की छवि उभरती है जो गंभीर कूटनीति की बजाय तमाशे और व्यक्तिगत प्रशंसा में अधिक रुचि रखता है।

लुटनिक के मुताबिक, व्यापार समझौता लगभग तैयार था, लेकिन इसे अंतिम रूप देने की शर्त यह थी कि प्रधानमंत्री मोदी व्यक्तिगत रूप से ट्रंप को फोन करें। उन्होंने कहा कि भारत को एक स्पष्ट और समय-सीमित मौका दिया गया था — “तीन शुक्रवार” — जिनके भीतर समझौता पूरा किया जाना था।

उनके अनुसार, भारत सरकार इस मांग से असहज थी और अंततः मोदी ने फोन नहीं किया। नतीजतन, बातचीत की कतार में भारत से पीछे रहे वियतनाम, इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे देश आगे निकल गए।

लुटनिक ने यह भी कहा कि जिन शर्तों पर भारत और अमेरिका कभी समझौते के बेहद करीब पहुँचे थे, वे अब लागू नहीं हैं।
“हम उस व्यापार समझौते से पीछे हट चुके हैं, जिस पर पहले सहमति बनी थी। अब हम उस पर विचार भी नहीं कर रहे,” उन्होंने कहा।

तुलना करते हुए लुटनिक ने ब्रिटेन का उदाहरण दिया। उनके अनुसार, जब ब्रिटेन की समय-सीमा नज़दीक आई तो प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने व्यक्तिगत रूप से ट्रंप को फोन किया। उसी दिन समझौता पूरा हुआ और अगले दिन एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में इसकी औपचारिक घोषणा कर दी गई।

एक व्यापारी की भाषा में लुटनिक ने कहा कि भारत “झूले के गलत सिरे” पर खड़ा था, जहाँ मंशा नहीं बल्कि समय निर्णायक साबित हुआ। उन्होंने ज़ोर दिया कि देरी की वजह भारत की अनिच्छा नहीं, बल्कि उसकी आंतरिक राजनीतिक और संसदीय प्रक्रियाओं की जटिलता थी।

इसके बावजूद, लुटनिक ने संकेत दिया कि रास्ता पूरी तरह बंद नहीं हुआ है और कहा,
“भारत इसे सुलझा लेगा।”

हालाँकि लुटनिक ने इन घटनाओं की सटीक समयावधि नहीं बताई, लेकिन पिछले साल न्यूयॉर्क टाइम्स और एक जर्मन अख़बार की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि ट्रंप ने जुलाई में प्रधानमंत्री मोदी को “चार बार” फोन किया, लेकिन प्रधानमंत्री ने कथित तौर पर अमेरिका के सनकी राष्ट्रपति से बात नहीं की।

यह पूरा प्रकरण ऐसे समय हुआ जब भारत–अमेरिका संबंधों में तनाव था। ट्रंप ने भारत द्वारा रूसी तेल की ख़रीद जारी रखने पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ़ लगाया, जिससे कुल शुल्क 50 प्रतिशत हो गया।

तनाव तब और बढ़ गया जब ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच हुए संघर्षविराम को लेकर ट्रंप ने श्रेय लेने की कोशिश की। इस पर प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप से फोन पर साफ़ कहा कि संघर्षविराम दोनों देशों के बीच सीधे बातचीत से हुआ था, इसमें अमेरिका की कोई भूमिका नहीं थी।

प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप की नोबेल शांति पुरस्कार की महत्वाकांक्षा का भी समर्थन नहीं किया, जबकि पाकिस्तान ने इस मौके का फ़ायदा उठाते हुए वॉशिंगटन से अपने संबंधों में सुधार देखा।

न्यूयॉर्क टाइम्स से बात करते हुए एक भारतीय अधिकारी ने कहा कि मोदी–ट्रंप कॉल को लेकर सरकार सतर्क थी, क्योंकि ट्रंप की अतिशयोक्ति की आदत और बातचीत को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का ख़तरा बना रहता है।

आख़िरकार 17 सितंबर को ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन पर फोन कर बातचीत की पहल की। इसके बाद दोनों नेताओं के बीच दो बार और बातचीत हुई — एक बार दीवाली पर और दूसरी बार दिसंबर में व्यापार समझौते पर चर्चा के लिए। इस साल भारत और अमेरिका समझौता कर पाएँगे या नहीं, यह अभी देखना बाकी है।

भारत पर हॉवर्ड लुटनिक की अपमानजनक टिप्पणियाँ

हॉवर्ड लुटनिक अमेरिका के वाणिज्य मंत्री और वॉल स्ट्रीट की कंपनी कैंटर फ़िट्ज़गेराल्ड के पूर्व सीईओ हैं। वाणिज्य मंत्री के रूप में वे ट्रंप की आक्रामक व्यापार नीतियों के प्रमुख क्रियान्वयनकर्ता रहे हैं, जिन्होंने टैरिफ़ के ज़रिये भारत जैसे देशों पर दबाव बनाया।

भारत को लेकर लुटनिक की सार्वजनिक टिप्पणियाँ — प्रधानमंत्री मोदी को “असहज” बताना या यह कहना कि उन्होंने ट्रंप को फोन “नहीं किया” — संप्रभु निर्णय प्रक्रिया के प्रति सम्मान की कमी दर्शाती हैं और जटिल कूटनीतिक बातचीत को व्यक्तिगत अहंकार की लड़ाई में बदल देती हैं।

व्यापार नीति पर उनके अधिकार को देखते हुए यह रवैया और भी समस्याजनक है, क्योंकि यह कूटनीतिक मर्यादाओं को कमज़ोर करता है, द्विपक्षीय रिश्तों पर असर डालता है और गंभीर वार्ताओं में अपमानजनक भाषा घुसा देता है।

लुटनिक ने बार-बार भारत–अमेरिका व्यापार समझौते के टूटने को व्यक्तिगत लहजे में पेश किया। उन्होंने कहा,
“मैंने पूरा समझौता तैयार किया था। लेकिन साफ़ है, यह ट्रंप का समझौता है। वही इसे पूरा करते हैं। इसके लिए मोदी को राष्ट्रपति को फोन करना था। भारत असहज था। इसलिए मोदी ने फोन नहीं किया।”

पिछले इंटरव्यूज़ में वे यहाँ तक कह चुके हैं कि भारत अंततः “माफ़ी मांगते हुए” बातचीत की मेज़ पर लौटेगा — मानो भारत कोई संप्रभु देश नहीं, बल्कि अपराधबोध में डूबा पक्ष हो।

उन्होंने भारत के रुख को रणनीतिक सोच की बजाय “असहजता” या “दिखावे” के रूप में पेश किया और रूस से तेल ख़रीद, टैरिफ़ वार्ता और ब्रिक्स जैसे मंचों में भारत की भूमिका को ग़लत या व्यर्थ बताया।

प्रधानमंत्री मोदी द्वारा ट्रंप से बातचीत से बचने के संभावित कारण

भारत के प्रति अपमानजनक बयान
ट्रंप ने बार-बार भारत को “टैरिफ़ किंग” कहा, उसे “अच्छा व्यापारिक साझेदार नहीं” बताया और भारतीय आयात पर भारी शुल्क लगाकर भारत को अमेरिका का शोषक दिखाया।

व्यापार विवाद के दौरान ट्रंप ने भारत और रूस को “मरी हुई अर्थव्यवस्थाएँ” तक कह दिया, जिससे दोनों देशों की आर्थिक साख को एक साथ खारिज किया गया।

टेस्ला फैक्ट्री को लेकर ट्रंप ने भारत की नीतियों को “अमेरिका के लिए अनुचित” बताया, जिसे भारत की आर्थिक संप्रभुता के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैया माना गया।

भारत पर जीएमओ थोपने का दबाव
ट्रंप प्रशासन ने भारत पर आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) फ़सलों — खासकर मक्का और सोयाबीन — के आयात की अनुमति देने का दबाव बनाया।

भारत ने खाद्य सुरक्षा, पर्यावरणीय जोखिम, छोटे किसानों की सुरक्षा, बीज संप्रभुता और सांस्कृतिक कारणों का हवाला देते हुए इन मांगों को ठुकरा दिया। जीएमओ नियमों में ढील न देना भारत–अमेरिका व्यापार वार्ता में एक बड़ा रोड़ा बना।

शांति समझौते का झूठा दावा
पहलगाम आतंकी हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका ने व्यापार दबाव के ज़रिये भारत–पाकिस्तान के बीच शांति करवाई।

भारत ने इन दावों को सिरे से ख़ारिज करते हुए स्पष्ट किया कि संघर्षविराम दोनों देशों की सेनाओं के बीच सीधे संवाद से हुआ, किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता नहीं थी।

प्रधानमंत्री मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने साफ़ किया कि भारत पाकिस्तान के मामलों में किसी भी तीसरे पक्ष की भूमिका स्वीकार नहीं करता।

Tags: Donald TrumpGMOHoward LutnickIndiaPrime minister Narendra ModitarrrifTrump-Modiunited statesटैरिफप्रधानमंत्री मोदीराष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप
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