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चीन में गणतांत्रिक वादे की त्रासदी उसका घरेलू मामला भर नहीं है, इसका प्रभाव पूरी दुनिया महसूस कर रही है

चीन के साम्राज्यवादी मॉडल ने दुनिया से चीन के रिश्तों को नया रूप दिया है। जो देश कभी नागरिकता और समानता की बात करता था, वह अब निष्ठा और चुप्पी की माँग करता है।

Kashish Mishra द्वारा Kashish Mishra
7 January 2026
in विश्व
आधुनिक गणतंत्र का चीनी वादा भी चाइनीज़ सामान की तरह निकला

आधुनिक गणतंत्र का चीनी वादा भी चाइनीज़ सामान की तरह निकला

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जब 1912 में चीन गणराज्य की घोषणा हुई, तो इसे साम्राज्य से इसका अलगाव माना गया। चिंग राजवंश के पतन का अर्थ था—विजय, पदानुक्रम और वंशानुगत सत्ता पर आधारित शासन का अंत। सुन यात-सेन और अन्य गणतांत्रिक नेताओं ने नागरिकता, प्रतिनिधित्व और दुनिया के साथ सहयोग पर आधारित एक आधुनिक राज्य की बात की। उनका तर्क था कि चीन अब किसी साम्राज्य की तरह नहीं एक आधुनिक गणतंत्र की तरह व्यवहार करेगा।क़रीब आधी सदी बीतने के बाद आज आधुनिक चीन उस कल्पना से बहुत अलग दिखाई देता है, जिसकी कल्पना उन नेताओं ने की थी। आज बीजिंग में शासन करने वाली राजनीतिक व्यवस्था गणतांत्रिक विचारों को नहीं दर्शाती। इसके बजाय, देश के भीतर और बाहर उसका व्यवहार उसी साम्राज्यवादी मॉडल से मिलता-जुलता है, जिसे उसने कभी अस्वीकार किया था। तिब्बत से हांगकांग तक, ताइवान से दक्षिण चीन सागर तक- चीनी सत्ता सहमति के बजाय ताक़त और नियंत्रण की साम्राज्यवादी नीति का ही प्रयोग कर रहा है।

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चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) खुद को चीन के इस नए आधुनिक और गणतांत्रिक स्वरूप की वैध उत्तराधिकारी बताती है। लेकिन जिन क्षेत्रों पर उसका प्रभाव है, वहाँ उसके काम करने के तरीके कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। ताइवान के मामले में बीजिंग संप्रभुता का दावा करता है, लेकिन वो वहां के लोगों को अपने राजनीतिक भविष्य पर निर्णय लेने की अनुमति नहीं देता। सैन्य अभ्यास, कूटनीतिक अलगाव और आर्थिक दबाव—इन सबका इस्तेमाल ऐसे दावे को मज़बूत करने के लिए किया जाता है, जो किसी भी तरह की जनभागीदारी नहीं, बल्कि ताक़त पर टिका है।

हॉंगकॉंग इसका एक और उदाहरण है। “एक देश, दो प्रणाली” के ढांचे के तहत जब ब्रिटेन ने 1997 में हॉंगकॉंग को चीन को लौटाया था, तो इसके एवज़ में एक शर्त भी रखी गई थी। वो शर्त थी- इस शहर को बड़े स्तर पर स्वायत्तता देने की। लेकिन यह वादा धीरे-धीरे खोखला होता गया। चुनावी सुधारों को पूरी तरह बदल दिया गया। चीनी सत्ता से असहमति को अपराध घोषित कर दिया गया और स्वतंत्र संस्थानों को कड़े केंद्रीय नियंत्रण में लाया गया।

दक्षिण चीन सागर में भी यही पैटर्न दिखता है। कृत्रिम द्वीप, सैन्य ठिकाने और बढ़ा-चढ़ा कर पेश किए गए समुद्री दावे। चीन की इन गतिविधियों ने इस विवादित इलाके को नए सिरे से गढ़ दिया है। मतभेदों को बातचीत से सुलझाने के बजाय, बीजिंग ने ताक़त की मौजूदगी और दबाव का सहारा लिया। क्षेत्र के छोटे देशों को उन नई वास्तविकताओं के साथ तालमेल बिठाना पड़ा, जिन्हें उन्होंने चुना नहीं था।
ये नीतियाँ गणतांत्रिक शासन नहीं, बल्कि साम्राज्यवादी विस्तार का संकेत देती हैं, जहाँ स्थानीय आवाज़ों या साझा नियमों की परवाह किए बिना बाहर की ओर सत्ता थोपी जाती है।

क्या CPC ‘रिपब्लिक ऑफ चाइना’ की वैध उत्तराधिकारी है ?

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी खुद को चीन के आधुनिक इतिहास का झंडाबरदार बताती है। वास्तविकता में, यह 1912 से शुरू हुए गणतांत्रिक प्रयोग से पलायन का प्रतिनिधित्व करती है। उस चीनी गणराज्य का उद्देश्य साम्राज्यवादी शासन को नागरिकता और क़ानून पर आधारित व्यवस्था से बदलना था। लेकिन मौजूदा कम्युनिस्ट व्यवस्था सत्ता को एक ही पार्टी में केंद्रित करती है, जिसे किसी भी प्रकार से चुनौती नहीं दी जा सकती है।

यह दृष्टिकोण गणतंत्र से ज़्यादा उसी राजशाही सोच के क़रीब है। सत्ता ऊपर से नीचे थोपी जाती है। लोगों से सरकार के प्रति निष्ठा के सबूत मांगे जाते हैं- उस पर बातचीत नहीं होती। विविधता को अस्थिरता माना जाता है। सीमाओं को समुदायों द्वारा साझा स्थानों की तरह नहीं, बल्कि संपत्ति की तरह देखा जाता है, जिन पर नियंत्रण होना चाहिए।
CPC चीन में एक गणराज्य की तरह शासन नहीं करती। वह एक ऐसे केंद्र की तरह शासन करती है, जिसके चारों ओर कड़े घेरे हैं और सब कुछ उन घेरों के नियंत्रण में है।

चीन के “राष्ट्रीय पुनरुत्थान” की परिभाषा

बीजिंग का “राष्ट्रीय पुनरुत्थान” का नारा अक्सर एक आधुनिक परियोजना के रूप में पेश किया जाता है। व्यवहार में, यह राजवंशीय पुनर्स्थापना की भाषा से काफ़ी मेल खाता है। अतीत की महानता को याद किया जाता है। एकता को आज्ञाकारिता के रूप में परिभाषित किया जाता है और शक्ति को ज्यादा से ज्यादा ज़मीन पर कब्जे से मापा जाता है।यह भाषा सुधार और भागीदारी के ज़रिये प्रगति के गणतांत्रिक विचार को नहीं दर्शाती। इसके बजाय, यह खोए हुए क्रम को सत्ता और बल से वापस लाने की पुरानी धारणाओं की प्रतिध्वनि है। अतीत से सीखने की जगह उसे वर्तमान सत्ता को सही ठहराने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
चीन के इस नए ढांचे में असहमति को विश्वासघात बताया जाता है। स्वायत्तता को विखंडन कहा जाता है।

चीन में गणतांत्रिक वादे की विफलता का प्रभाव पूरा एशिया महसूस कर रहा है

चीन के गणतांत्रिक वादे की विफलता उसके भीतर तक सीमित नहीं है। इसके प्रभाव पूरे एशिया में महसूस होते हैं। जब चीन अपने पड़ोसियों से जुड़ता है, तो वह अक्सर साझेदारी के बजाय दबाव की रणनीति का इस्तेमाल करता है। पड़ोसियों और सहयोगियों से संवाद की जगह आर्थिक दबाव का प्रयोग किया जाता है और भरोसे की जगह सैन्य मौजूदगी ले लेती है।दक्षिण चीन सागर के आसपास के देशों के लिए इसका स्पष्ट अर्थ अनिश्चितता और असंतुलन रहा है। ताइवान के लिए इसका मतलब लगातार ख़तरे में जीना है। हांगकांग के लिए इसका मतलब—उस राजनीतिक स्पेस का खो जाना है, जिसकी गारंटी उसे कभी दी गई थी।

तिब्बत सबसे शुरुआती और सबसे स्पष्ट उदाहरण है। 1950 के बाद उसका विलय चीनी साम्राज्यवाद का एक पैटर्न बन गया। पहले सेना भेजना, फिर प्रशासन और राजनीति पर नियंत्रण और फिर आखिरी चरण में सांस्कृतिक और दीर्घकालिक नियंत्रण। तिब्बत में जो कुछ हुआ, वह अपवाद नहीं था; वह आधुनिक चीनी साम्राज्यवाद के लिए एक मॉडल बन गया।आधुनिक चीन तेज़ी से पॉलिटिकल, फ़ाइनेंशियल और मिलिट्री प्रेशर का निर्यात कर रहा है। उसका प्रभाव साझा संस्थाओं या आपसी सहमति से नहीं, बल्कि ताक़त के ज़रिये महसूस होता है। इसने पूरे रीज़नल संतुलन और उसके बर्ताव को बदल दिया है। सहयोग को हतोत्साहित किया है और संवाद को डर और अनिश्चितता से बदल कर रख दिया है।
चीन के टूटे हुए गणतांत्रिक वादे की त्रासदी इसलिए केवल घरेलू नहीं है। इसने दुनिया से चीन के रिश्तों को नया रूप दिया है। जो देश कभी नागरिकता और समानता की बात करता था, वह अब निष्ठा और चुप्पी की माँग करता है।

*चीन के गणतांत्रिक भविष्य का क्या होगा ? *

इतिहास स्थिर नहीं होता। लेकिन अब तक चुना गया रास्ता उन गणतांत्रिक आदर्शों से दूर जाता दिखता है, जो कभी एक अलग तरह की सत्ता और देश का वादा करते थे। 
तिब्बत से दक्षिण चीन सागर तक पैटर्न साफ़ है। सहमति की जगह नियंत्रण आ गया है और भागीदारी की जगह अधिकारों ने ले ली है। वहीं साम्राज्यवादी प्रवृत्ति आधुनिक भाषा पहनकर लौट आई है।
जिस गणराज्य का उद्देश्य साम्राज्य का अंत करना था, वह अपना वादा पूरा नहीं कर सका। उसके स्थान पर जो उभरा है, वह कोई शांतिपूर्ण आधुनिक गणराज्य नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली राज्य है, जो बाहर की ओर हाथ बढ़ाते हुए उसी अतीत की आदतें दोहरा रहा है, जिन्हें उसने कभी छोड़ने का दावा किया था।

Tags: Asiachin bijingChinatibbatwest cchinaचीन में गणतांत्रिक
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