भारतीय समुद्री कूटनीति के विस्तार की कहानी हिंद महासागर क्षेत्र में लगातार मजबूत होती मौजूदगी और साझेदारी के जरिए साफ तौर पर देखी जा सकती है। हाल ही में भारतीय नौसेना के युद्धपोत INS Trikand की मॉरीशस यात्रा ने एक बार फिर इस रणनीति को वैश्विक मंच पर उजागर किया। लेकिन यह पहल केवल जहाजों की तैनाती तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरी और दीर्घकालिक रणनीति काम कर रही है, जिसका मुख्य आधार प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और स्थायी साझेदारी है। पिछले नौ वर्षों में भारतीय नौसेना ने मॉरीशस के नेशनल कोस्ट गार्ड के 516 अधिकारियों को प्रशिक्षित किया है, जो इस बात का प्रमाण है कि भारत केवल अपनी उपस्थिति ही नहीं बढ़ा रहा, बल्कि अपने साझेदार देशों की क्षमता को भी मजबूत कर रहा है।
यह यात्रा उस समय हुई जब मॉरीशस अपने 58वें स्वतंत्रता दिवस और 34वें गणतंत्र दिवस का जश्न मना रहा था। 12 मार्च को मनाया जाने वाला यह दिन मॉरीशस के लिए ऐतिहासिक महत्व रखता है, क्योंकि इसी दिन 1968 में उसने ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त की थी। इस अवसर पर भारतीय नौसेना के जवानों ने राष्ट्रीय दिवस परेड में हिस्सा लिया, जिसमें नौसैनिक टुकड़ी, जहाज का बैंड और एक हेलीकॉप्टर भी शामिल था। हालांकि इस तरह की भागीदारी अब दोनों देशों के बीच एक परंपरा बन चुकी है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इन यात्राओं का असली महत्व उनके परिचालन और रणनीतिक पहलुओं में छिपा होता है, न कि केवल औपचारिक समारोहों में।
13 मार्च को पोर्ट लुईस से रवाना होने के बाद INS त्रिकंड ने मॉरीशस के गश्ती पोत CGS Valiant के साथ एक संयुक्त अभ्यास किया। इसके साथ ही दोनों देशों ने मॉरीशस के विशेष आर्थिक क्षेत्र यानी EEZ में संयुक्त निगरानी भी की। मॉरीशस का EEZ लगभग 2.3 मिलियन वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है, जो उसके भौगोलिक क्षेत्रफल की तुलना में बहुत बड़ा है। इतने विशाल समुद्री क्षेत्र की निगरानी करना किसी भी छोटे देश के लिए एक बड़ी चुनौती है, खासकर तब जब संसाधन सीमित हों। ऐसे में भारत की ओर से मिलने वाली सहायता मॉरीशस के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होती है।
भारत ने केवल सैन्य सहयोग तक ही अपनी भूमिका सीमित नहीं रखी है, बल्कि प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग के माध्यम से मॉरीशस की समुद्री क्षमता को मजबूत करने में भी अहम योगदान दिया है। पिछले नौ वर्षों में 516 कोस्ट गार्ड अधिकारियों को प्रशिक्षण देना इस बात का संकेत है कि भारत दीर्घकालिक साझेदारी को प्राथमिकता दे रहा है। यह प्रशिक्षण न केवल तकनीकी कौशल को बढ़ाता है, बल्कि दोनों देशों के बीच विश्वास और सहयोग को भी मजबूत करता है।
मॉरीशस की अर्थव्यवस्था में समुद्री संसाधनों की अहम भूमिका है। देश की GDP का 10 प्रतिशत से अधिक हिस्सा ब्लू इकॉनमी से आता है, जो पर्यटन के अलावा लगभग 10,000 लोगों को रोजगार प्रदान करती है। ऐसे में समुद्री सुरक्षा और संसाधनों की रक्षा केवल रणनीतिक जरूरत नहीं, बल्कि आर्थिक अनिवार्यता भी है। भारत ने इस आवश्यकता को समझते हुए मॉरीशस को कई महत्वपूर्ण संसाधन उपलब्ध कराए हैं, जिनमें इंटरसेप्टर बोट, डोर्नियर समुद्री गश्ती विमान और तटीय निगरानी रडार सिस्टम शामिल हैं।
इसके अलावा भारत ने मॉरीशस को हाइड्रोग्राफिक सर्वेक्षण में भी मदद दी है। यह प्रक्रिया समुद्र के तल का नक्शा तैयार करने के लिए की जाती है, जो सुरक्षित नौवहन, बंदरगाह विकास और समुद्री संसाधनों के आकलन के लिए बेहद जरूरी होती है। यह तकनीकी सहायता दोनों देशों के बीच सहयोग को और गहरा बनाती है।
2024 की शुरुआत में अगालेगा द्वीप पर एयरस्ट्रिप और जेटी का निर्माण भारत की मदद से किया गया, जिसने मॉरीशस की समुद्री सुरक्षा क्षमता को एक नया आयाम दिया। इस बुनियादी ढांचे की मदद से अब मॉरीशस तेजी से अपने सुदूर क्षेत्रों में सैनिक और उपकरण भेज सकता है, जो पहले संभव नहीं था। यह सुविधा समुद्री डकैती और मादक पदार्थों की तस्करी जैसे खतरों से निपटने में बेहद उपयोगी साबित हो रही है।
दोनों देश Information Fusion Centre for Indian Ocean Region के माध्यम से समुद्री सूचनाओं का आदान-प्रदान भी करते हैं। यह एक बहुपक्षीय मंच है, जहां विभिन्न देशों के बीच जहाजों की गतिविधियों पर नजर रखी जाती है और संभावित खतरों की पहचान की जाती है। यह सहयोग हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
भारत और मॉरीशस के संबंध केवल सामान्य परिस्थितियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि संकट के समय भी यह साझेदारी मजबूत साबित हुई है। दिसंबर 2024 में जब साइक्लोन चिडो ने इस क्षेत्र को प्रभावित किया, तब भारत ने तुरंत राहत सामग्री और तकनीकी सहायता प्रदान की। यह कदम भारत की ‘Neighbourhood First’ नीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह अपने पड़ोसी देशों के लिए सबसे पहले मदद पहुंचाने वाला देश बनने की कोशिश करता है।
भारतीय नौसेना के लिए INS त्रिकंड की यह यात्रा हिंद महासागर में व्यापक समुद्री रणनीति का हिस्सा है। भारत इस रणनीति को ‘MAHASAGAR’ यानी Maritime Security and Growth for All in the Region के तहत आगे बढ़ा रहा है। इस दृष्टिकोण में महासागर को प्रतिस्पर्धा का क्षेत्र नहीं, बल्कि साझा संसाधन के रूप में देखा जाता है, जिसकी सुरक्षा और विकास के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं।
भारत की यह नीति न केवल उसकी क्षेत्रीय भूमिका को मजबूत कर रही है, बल्कि उसे एक जिम्मेदार और भरोसेमंद साझेदार के रूप में भी स्थापित कर रही है। मॉरीशस जैसे छोटे देशों के लिए यह सहयोग बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उन्हें अपनी सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में मदद करता है।
समय के साथ भारत और मॉरीशस के बीच यह संबंध और मजबूत होता जा रहा है। प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता, बुनियादी ढांचा विकास और संकट के समय सहायता जैसे कई पहलुओं में भारत की भूमिका लगातार बढ़ रही है। यह साझेदारी केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे हिंद महासागर क्षेत्र में स्थिरता और सहयोग को बढ़ावा देने में भी योगदान दे रही है।
इस पूरी कहानी से यह स्पष्ट होता है कि भारत की समुद्री कूटनीति केवल शक्ति प्रदर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक संतुलित और दीर्घकालिक रणनीति पर आधारित है। प्रशिक्षण, सहयोग और विश्वास के आधार पर भारत अपने साझेदार देशों के साथ ऐसे संबंध बना रहा है, जो आने वाले समय में क्षेत्रीय और वैश्विक राजनीति को भी प्रभावित कर सकते हैं।





























