महाराष्ट्र के नागपुर से एक ऐसा चौंकाने वाला मामला सामने आया है जिसने समाज सेवा के नाम पर चल रहे काले धंधों और वैचारिक कट्टरता की पोल खोल दी है। 18 अप्रैल को नागपुर में एनजीओ संचालक रियाज फाजिल काजी की गिरफ्तारी के बाद पूरे राज्य में हड़कंप मच गया है। यह मामला मानकापुर पुलिस स्टेशन में एक 23 वर्षीय महिला एचआर प्रोफेशनल द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के बाद शुरू हुआ। जिसे शुरुआत में कार्यस्थल पर उत्पीड़न का मामला माना जा रहा था, वह अब एक बहुस्तरीय जांच में बदल गया है, जिसमें यौन उत्पीड़न, जबरन धार्मिक प्रथाओं को थोपना, साइबर स्टॉकिंग और मानहानि जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं। महाराष्ट्र एटीएस (ATS) अब इस मामले की जांच में स्थानीय पुलिस के साथ शामिल हो गई है, ताकि इस एनजीओ के फंडिंग नेटवर्क और अन्य संदिग्ध संपर्कों की पड़ताल की जा सके।
समाज सेवा का मुखौटा और उसके पीछे की कड़वी सच्चाई
इस पूरे विवाद के केंद्र में ‘यूनिवर्सल मल्टीपर्पस सोसाइटी’ नामक संस्था है, जो मानकापुर पुलिस स्टेशन से महज एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। कागजों पर यह संस्था 2010 से स्वास्थ्य शिविरों, शैक्षिक सहायता और झुग्गी-झोपड़ी के बच्चों के कल्याण जैसे सामाजिक कार्यों में शामिल होने का दावा करती रही है। कई अन्य सामुदायिक फाउंडेशन के साथ इसके जुड़ाव ने इसे समाज में एक विश्वसनीय छवि प्रदान की थी। लेकिन एफआईआर के अनुसार, इस सार्वजनिक छवि के पीछे महिला कर्मचारियों के लिए एक बहुत ही खौफनाक हकीकत छिपी थी। एनजीओ का इस्तेमाल कथित तौर पर महिलाओं के शोषण और उन पर एक विशिष्ट धार्मिक विचारधारा थोपने के लिए किया जा रहा था।
एफआईआर में यौन शोषण और सीसीटीवी से छेड़छाड़ के सनसनीखेज खुलासे
23 वर्षीय पीड़िता, जो सितंबर 2023 से इस एनजीओ में एचआर हेड के रूप में कार्यरत थी, ने रियाज काजी के खिलाफ विस्तार से बयान दिए हैं। एफआईआर के मुताबिक, 18 जुलाई 2024 को ऑफिस में जन्मदिन के जश्न के बाद आरोपी ने पीड़िता को अपने केबिन में बुलाया। वहां उसने पीड़िता को जबरन गले लगाया और माथे पर चूमते हुए कहा, “मैं आज तुम्हें छोड़ना नहीं चाहता।” पीड़िता ने बताया कि नौकरी खोने के डर से वह उस समय खुलकर विरोध नहीं कर पाई।
जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी रियाज काजी बहुत शातिर तरीके से अपनी हरकतों को अंजाम देता था। वह कोई भी अनुचित प्रयास करने से पहले ऑफिस के सीसीटीवी कैमरों को जानबूझकर डिस्कनेक्ट कर देता था ताकि कोई सबूत न रहे। जब भी पीड़िता ने उसके व्यवहार का विरोध किया, तो कार्यस्थल पर उसे अपमानित किया गया और उसे मानसिक प्रताड़ना दी गई।
डिजिटल निगरानी और धर्मांतरण का संगठित दबाव
शिकायत में आरोपी द्वारा की जा रही डिजिटल जासूसी का भी जिक्र है। आरोपी ने अपना और पीड़िता का नाम मिलाकर एक फर्जी इंस्टाग्राम अकाउंट बनाया था, जिसके जरिए वह महिला स्टाफ और स्वयंसेवकों की ऑनलाइन गतिविधियों और आवाजाही पर नजर रखता था। यह उत्पीड़न केवल शारीरिक और मानसिक तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें धार्मिक कोण भी शामिल था।
पीड़िता की छोटी बहन, जिसने नवंबर 2025 में असिस्टेंट प्रोजेक्ट मैनेजर के रूप में एनजीओ जॉइन किया था, ने बताया कि उसे फील्ड वर्क के दौरान जबरन पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े (बुर्का/हिजाब) पहनने और विशिष्ट इस्लामी प्रार्थनाएं करने के लिए मजबूर किया गया। दबाव इतना बढ़ गया कि उसने दो महीने के भीतर ही इस्तीफा दे दिया। एफआईआर के अनुसार, अन्य गैर-मुस्लिम महिला कर्मचारियों पर भी ‘कलमा’ पढ़ने और ‘नमाज’ अदा करने का दबाव बनाया जाता था, जिसके कारण 2024 में एक 24 वर्षीय शिक्षिका सहित कई कर्मचारियों ने इस्तीफा दे दिया।
मानहानि, धमकियां और एटीएस की एंट्री
अप्रैल के महीने में यह उत्पीड़न चरम पर पहुंच गया। 13 अप्रैल को आरोपी काजी ने एक पूर्व कर्मचारी की मां को फोन किया और पीड़िता व उसकी बहन के लिए “कॉल गर्ल” और “वेश्या” जैसे अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। उसने झूठा दावा किया कि ये महिलाएं “नाइट एक्टिविटी” में शामिल हैं और परिवार को उनसे संबंध तोड़ने की धमकी दी। 17 अप्रैल को एक ऑडियो रिकॉर्डिंग सामने आने के बाद मामला पूरी तरह खुल गया। अगले दिन जब पीड़ित पक्ष एनजीओ कार्यालय पहुंचा, तो वह बंद मिला, जिसके बाद पुलिस ने तत्काल कार्रवाई कर आरोपी को दबोच लिया।
वरिष्ठ निरीक्षक हरेश कलसेकर ने पुष्टि की है कि आरोपी को 23 अप्रैल तक पुलिस हिरासत में भेज दिया गया है। अब तक 3 से 4 महिलाएं शिकायत लेकर सामने आई हैं। पुलिस सीसीटीवी फुटेज, कॉल रिकॉर्ड और सोशल मीडिया डेटा की जांच कर रही है। आरोपी पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 74 (महिला पर हमला), 75(2), 78(2), 296 (अश्लील कृत्य), 302(1) (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना) और आईटी एक्ट की धारा 66-बी के तहत मामला दर्ज किया गया है।
नासिक टीसीएस मामले से जुड़ते तार?
यह मामला महाराष्ट्र में इसलिए भी चर्चा का विषय बना हुआ है क्योंकि हाल ही में नासिक के टीसीएस (TCS) विवाद में भी कार्यस्थल पर धार्मिक दबाव और शोषण के इसी तरह के आरोप लगे थे। एटीएस अब यह जांच रही है कि क्या इन घटनाओं के पीछे कोई बड़ा संगठित नेटवर्क है जो एनजीओ और संस्थानों की आड़ में ‘वैचारिक धर्मांतरण’ और ‘शोषण’ का एजेंडा चला रहा है। नागपुर का यह मामला अब केवल एक व्यक्तिगत शिकायत नहीं, बल्कि सामाजिक संस्थानों की जवाबदेही और उनके पीछे छिपे संभावित खतरों की एक बड़ी जांच बन गया है।




























