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बांग्लादेश के हिंदुओं की ये ‘हुंकार’ इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?

Prashant Pole द्वारा Prashant Pole
20 June 2026
in चर्चित
बांग्लादेश में हिंदुओं का शक्ति प्रदर्शन

बांग्लादेश में हिंदुओं का शक्ति प्रदर्शन

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कल शुक्रवार 19 जून को, बांग्लादेश में एक अभूतपूर्व दृश्य देखने मिला। ढाका के नेशनल प्रेस क्लब के सामने, एक विशाल मानव श्रृंखला बनाई गई। फिर दोपहर तक ढाका के विभिन्न विश्वविद्यालयों के छात्र शाहाबाद क्षेत्र में एकत्र हुए। उनकी संख्या इतनी ज्यादा थी, कि समूचा शाहाबाद परिसर ठप्प हो गया। तब तक शाम हो गई थी। इन विद्यार्थियों ने भव्य और प्रभावी मशाल जुलूस निकाला। इस जुलूस को देखकर, मानो महानगर ढाका ठिठक गया..!

ढाका के लिए यह ऐसे दृश्य आम बात हैं। फिर कल 19 जून के इन प्रदर्शनों में ऐसी क्या विशेषता थी, की मात्रा ढाका ही नहीं, तो सारा बांग्लादेश सहम गया..?

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कारण, यह सारे छात्र हिंदू थे। मानव श्रृंखला बनाने वाले सारे कार्यकर्ता हिंदू थे। वह ‘हिंदू महजोट’ (Bangladesh National Hindu Grand Alliance) के अंतर्गत भगवान श्रीराम के अपमान के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे।

फर्क था। बहुत ज्यादा अंतर था। कल तक मार खाने वाला हिंदू, आज आत्मविश्वास से लबालब होकर, अपने आराध्य की विडंबना का विरोध प्रकट कर रहा था। बांग्लादेश की सरकार को अल्टीमेटम दे रहा था।

बांग्लादेश के मानचित्र की, यदि हम एक कुर्ता पहने हुए व्यक्ति के रूप में कल्पना करते हैं, तो उस व्यक्ति के गले के स्थान पर हैं, ‘गायबांधा’ जिला। इस गायबांधा जिले का पलाशबाड़ी गांव, इस समय समूचे बांग्लादेश में छाया हुआ हैं। इस पलाशबाड़ी में, हिंदू समुदाय द्वारा भगवान श्रीराम की 81 फीट की मूर्ति का निर्माण किया जा रहा हैं। श्री श्री राधा गोविंद और काली मंदिर परिसर में निर्माणाधीन इस मूर्ति का 80% काम पूरा हो चुका हैं। राधा गोविंद मंदिर समिति के अध्यक्ष हरिदास चंद्रदास के नेतृत्व में यह कार्य चल रहा हैं।

(गायबांधा के बारे में कहा जाता हैं, कि यहां महाभारत काल में सम्राट विराट राज करते थे। उन्होंने सैकड़ो की संख्या में गायें पाल रखी थी। जहां पर यह शहर हैं, वहां पर गायें बांधी जाती थी। इसलिए इस स्थान को गायबांधा कहते हैं)

विगत कुछ दिनों से इमाम-उलेमा परिषद तथा अन्य कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों के विरोध के कारण इस मूर्ति के निर्माण का कार्य पूरी तरह से रुका हैं। कट्टरपंथियों ने इस मूर्ति को ध्वस्त करने की धमकी दी हैं। इसी कडी में, इस हफ्ते कुछ उपद्रवी लोगों ने, निर्माणाधीन मूर्ति पर जूते – चप्पलों का ढेर लगा दिया। इस धार्मिक विडंबना के विरोध में बांग्लादेश के हिंदू आक्रामक हुए। ढाका के दक्षिणी हिस्से में स्थित, ‘जगन्नाथ विश्वविद्यालय’ के हिंदू विद्यार्थी सर्वप्रथम इस धार्मिक अवमानना के विरोध में सड़कों पर उतर आए। इस आंदोलन से जो चिंगारी सुलगी, उससे बांग्लादेश के हिंदू जागृत हुए। उसी कड़ी में कल ढाका में हिंदू विद्यार्थियों का अभूतपूर्व प्रदर्शन हुआ

बांग्लादेश में इस समय मात्र 9% से 10% हिंदू बचा हुआ हैं। गायबांधा में तो मात्र 7% हिंदू हैं। इससे पहले भी, इसी प्रकार का हिंदुओं का दमन होते आया हैं। बांग्लादेश में अनेकों बार हिंदुओं के मंदिर तोड़े गए। आराध्या देवताओं के विग्रह ध्वस्त किए गए। कभी हिंदुओं ने छुटपुट विरोध किया, तो अधिकतम समय, मन मसोस कर रह गए।

तो फिर इस बार बांग्लादेश के हिंदुओं में यह साहस कहां से आया..?

इसका उत्तर हैं, पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम !

जी, हां। पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम से निकली हिंदुत्व की लहर से बांग्लादेश के हिंदुओं को हिम्मत मिली। साहस मिला।  उनका आत्मविश्वास जागृत हुआ, और कल का अभूतपूर्व आंदोलन संपन्न हुआ।

हम हमेशा यह समाचार सुनते आए हैं, कि पाकिस्तान में हिंदुओं पर दुर्दांत अत्याचार हुए। उनका बलात धर्म परिवर्तन कराया गया। अनेक हिंदू लड़कियों को भगाया गया… आदि। ऐसे ही समाचार बांग्लादेश से भी आते हैं। 1947 से 1975 तक पूर्व पाकिस्तान में, और 1975 से आज तक बांग्लादेश में, अनेक हिंदू मंदिर समय-समय पर तोड़े गए। 1975 में पश्चिमी पाकिस्तानी सेना ने बांग्लादेश के हिंदुओं का नरसंहार (genocide) किया। 2024 के अराजक वातावरण में पुनः यही हुआ। सैकड़ो हिंदू मारे गए। भीड के द्वारा पीट – पीट कर (Mob Lynching) तो अनेकों बार हिंदुओं की हत्या की गई।

इन सभी अवसरों पर, ह्यूमन राइट्स की बातें करने वाले, मानवता का उपदेश देने वाले, सेकुलरिज्म का पाठ पढ़ने वाले हमेशा खामोश रहे। चुप्पी साध कर बैठे रहे।

ऐसा क्यों..?

भारत में भी लगभग 10% से 12% मुसलमान हैं। किंतु यहां अपवाद स्वरुप एक छोटी भी घटना हो जाती हैं, तो यह तमाम मानवाधिकार के पैरोकार, दुनिया में शोर मचाते हैं। अनेकों बार कुछ हुआ नहीं तो भी, ‘भारत में मुसलमान असुरक्षित’ का नारा घुमता हैं; जैसे कोरोना के समय गुंजा था।

फिर वही प्रश्न। बांग्लादेश और पाकिस्तान में हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों की कोई बराबरी ही नहीं हैं। फिर भी, भारत में छोटी-मोटी घटना होने या ना होने पर भी, विश्व के माध्यम जगत में वह बड़ा समाचार बनता हैं, किंतु बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदू नरसंहार का सादा समाचार भी प्रमुखता से नहीं छपता।

ऐसा क्यों..?

इसका कारण हैं – संगठन। भारत का मुस्लिम समुदाय संगठित हैं, भले ही अलग-अलग टुकड़ों में, या संगठनों में हो, किंतु संगठित हैं।

दुर्भाग्य से पाकिस्तान और बांग्लादेश के हिंदुओं के बारे में ऐसा नहीं कह सकते। 1947 के पहले मुसलमानों का राजनीतिक दल था, ‘मुस्लिम लीग’। विभाजन के पश्चात भारत में मुस्लिम लीग की कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई। किंतु फिर भी मुस्लिम लीग जिंदा रही। उसने ‘इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग’ यह नया नामकरण कर लिया। केरलम में अपनी शक्ति बढ़ाते गए। उनके संसद सदस्य चुनकर आते गए। यूपीए का वह एक हिस्सा रहे। यूपीए के 10 वर्षों के शासनकाल में, उनका मंत्री, कांग्रेस के साथ मंत्रिमंडल का सदस्य था। आज भी केरलम में कांग्रेस का मुख्यमंत्री, इस मुस्लिम लीग की सहमति से और उसकी दम पर ही टिका हैं। एमआईएम जैसे अन्य मुस्लिम संगठन भी मुस्लिम राजनीति दमखम के साथ करते हैं।

विभाजन के पहले हिंदुओं का एकमात्र राजनीतिक दल था, ‘हिंदू महासभा’। दुर्भाग्य से, हिंदुस्तान के हिंदू उसे अपना दल नहीं मानते थे। अंग्रेज और मुसलमान, कांग्रेस को हिंदुओं की पार्टी समझते थे। जबकि कांग्रेस अपने आप को हिंदुओं की पार्टी नहीं मानती थी। कांग्रेस की सारी नीतियां मुस्लिम परस्त थी।

विभाजन के बाद क्या हुआ? पश्चिम पाकिस्तान में हिंदू महासभा का थोड़ा बहुत कार्य था। उसके अनेक कार्यकर्ता भारत आ गए। जो वहीं पर डटे रहे, उनका भी मनोबल टूटा हुआ था। इसलिए 1950 के आते-आते, पश्चिम पाकिस्तान से हिंदू महासभा का अस्तित्व समाप्त हो गया था।

तुलना में पूर्व पाकिस्तान में हिंदू महासभा की कुछ ताकत थी। अविभाजित बंगाल में डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी और निर्मल चंद्र चटर्जी जैसे ताकतवर नेता, हिंदू महासभा के पास थे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी के कारण ही बंगाल का विभाजन होकर, पश्चिम बंगाल भारत में आ सका। अन्यथा पूरा बंगाल पाकिस्तान में मिलाने की बात हो रही थी।

किंतु पूर्वी पाकिस्तान बनने के बाद, वहां पर हिंदू महासभा का कोई खास अस्तित्व नहीं रहा। 1950 में ढाका, बारिसाल, खुलना और अन्य क्षेत्रों में हिंदू विरोधी दंगे हुए। इन दंगों के कारण, या तो हिंदू समाज ने पलायन किया, या वह दबकर रह गया।

अर्थात, पूर्व और पश्चिम पाकिस्तान, दोनों में अच्छी खासी संख्या होने के बावजूद भी हिंदू समाज राजनीतिक ताकत के रूप में सामने नहीं आया। दुनिया में शक्ति को ही सब प्रणाम करते हैं। हिंदू यह राजनीतिक या सामाजिक शक्ति के रूप में नहीं रहा, तो स्वाभाविक था, उन पर अत्याचार बढ़ते गए।

आज बांग्लादेश में हिंदुओं के कुछ सामाजिक संगठन है। सन 2006 में कुछ हिंदू संगठनों ने मिलकर, ‘हिंदू महजोट’ बनाया। किंतु इसकी गतिविधियां सीमित थी। राजनीतिक शक्ति नहीं थी। अधिकतम हिंदू, शेख हसीना सरकार की अवामी लीग को समर्थन देते थे। 2024 में अवामी लीग का तख्तापलट होने के बाद, हिंदुओं पर जबरदस्त अत्याचार हुए। किंतु ‘हिंदू महजोट’ ने प्रारंभ में उन्हें राजनीतिक प्रतिशोध माना। इसलिए हिंदू समाज से अपेक्षित प्रतिकार नहीं खड़ा हुआ।

किंतु कल का आंदोलन अपवाद था। बांग्लादेश का हिंदू अब जाग गया हैं, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण था।

पश्चिम बंगाल के चुनाव ने बहुत कुछ बदला हैं। अब बांग्लादेश के हिंदू आत्मविश्वास के साथ, संगठित शक्ति का हुंकार भर रहे हैं। यह हिंदुओं के लिए अत्यंत सकारात्मक दृश्य हैं।

Tags: BangladeshBangladesh Hindu protestsDhaka religious unresthindu sangathanjai shree ramLord Ram insult Bangladeshपूर्वी पाकिस्तानबांग्लादेशश्रीराम के नारेहिंदुओं का शक्ति प्रदर्शनहिंदू संगठन
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