हिमालयी क्षेत्र में एक विशाल ग्लेशियर के टूटने से नेपाल और तिब्बत की सीमा पर आई भीषण बाढ़ के बाद अब त्रासदी का दायरा धीरे-धीरे स्पष्ट हो रहा है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इस प्रलयकारी बाढ़ में नेपाल की तरफ शुक्रवार तक 900 के ज्यादा लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 4000 से ज्यादा लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। सीमावर्ती इलाकों में लगातार राहत और बचाव अभियान जारी है, जहां से मलबे के नीचे दबे शवों और विस्थापित परिवारों की दर्दनाक तस्वीरें लगातार सामने आ रही हैं। दूसरी ओर, ठीक उसी सीमावर्ती क्षेत्र में पड़ने वाले तिब्बत में चीन ने आधिकारिक रूप से केवल 16 मौतों की पुष्टि की है। गिरोंग (Gyirong) सीमा चौकी के आसपास हजारों लोगों की घनी आबादी बसती है, फिर भी सीमा के दोनों तरफ के आंकड़ों में इतना बड़ा अंतर कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। यह भारी विसंगति इस बात की ओर स्पष्ट संकेत करती है कि चीन हमेशा की तरह इस प्राकृतिक आपदा के असली नुकसान को बाहरी दुनिया से छिपाने की कोशिश कर रहा है।
नेपाल में तबाही का खुला मंजर और जमीन से सीधी रिपोर्टिंग
नेपाल की भोटेकोशी नदी घाटी और आसपास के तबाही वाले इलाकों में ग्राउंड जीरो से पल-पल की जानकारी सामने आ रही है। आपदा के तुरंत बाद स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय पत्रकार मौके पर पहुंचे और उन्होंने पीड़ितों व बचाव दल के कर्मियों से सीधे बात की। बेघर हुए ग्रामीणों ने खुद मीडिया के सामने आकर बाढ़ के खौफनाक मंजर का ब्योरा दिया कि कैसे पानी का तेज बहाव उनके घरों, मवेशियों और पूरे गांव को बहा ले गया। नेपाल के अस्पतालों में घायलों की स्थिति, राहत शिविरों का हाल और सेना व पुलिस द्वारा मलबे से निकाले जा रहे शवों का वास्तविक ब्योरा पूरी पारदर्शिता के साथ सार्वजनिक हो रहा है। वैज्ञानिकों की टीमें भी मौके पर अध्ययन कर रही हैं कि ग्लेशियर के टूटने की मुख्य वजह क्या थी और आगे कितना खतरा बना हुआ है।
फिर नेपाल ने विदेशी पत्रकारों पर क्यों लगाए सख्त नियम ?
आपदा के शुरुआती दिनों में खुली रिपोर्टिंग के बाद अब नेपाल सरकार ने विदेशी पत्रकारों के लिए नियमों को अचानक कड़ा कर दिया है। ‘काठमांडू पोस्ट’ की रिपोर्ट के अनुसार, अब सीमावर्ती और बाढ़ प्रभावित इलाकों में कवरेज करने वाले विदेशी संवाददाताओं को अपने पासपोर्ट, वीजा, संस्थान द्वारा जारी पहचान पत्र और यहां तक कि अपने वेतन व भत्तों तक का पूरा ब्योरा संबंधित अधिकारियों को सौंपना होगा। जानकारों का मानना है कि नेपाल प्रशासन यह कदम आपदा क्षेत्र में बेलगाम ‘डिजास्टर टूरिज्म’ यानी आपदा पर्यटन को रोकने के लिए उठा रहा है। राहत और बचाव कार्य में किसी तरह की बाधा न पहुंचे और सनसनीखेज रिपोर्टिंग पर नियंत्रण रखा जा सके, इसलिए यह प्रशासनिक सख्ती लागू की गई है, हालांकि इसने स्वतंत्र रिपोर्टिंग को लेकर नई बहस भी छेड़ दी है।
चीन की अभेद्य सेंसरशिप और दुनिया के सामने अधूरी सच्चाई
सीमा के दूसरी तरफ तिब्बत में स्थिति पूरी तरह इसके उलट है। चीन के कड़े नियंत्रण और सेंसरशिप का खामियाजा आज पूरी दुनिया भुगत रही है क्योंकि वहां हुए वास्तविक विनाश का सटीक आकलन करना असंभव हो गया है। चीनी सरकारी मीडिया केवल सीमित फुटेज और वही खबरें दिखा रहा है जिनमें राहत कार्यों और कम्युनिस्ट पार्टी की सक्रियता का बखान किया गया है। सरकारी टीवी चैनलों के एक प्रसारण में यह साफ दिखा कि राहत शिविर में खड़ा रिपोर्टर अपनी बात कहता रहा, लेकिन उसने अपने पीछे बैठे किसी भी स्थानीय प्रभावित व्यक्ति से बात तक नहीं की। हालात का जायजा लेने और राहत पहुंचाने के उद्देश्य से सद्गुरु के ईशा फाउंडेशन जैसी संस्थाओं ने भी प्रभावित तिब्बती क्षेत्र में जाने और मदद करने की आधिकारिक अनुमति मांगी थी, लेकिन बीजिंग प्रशासन की तरफ से अब तक इस पर कोई सकारात्मक अपडेट नहीं दिया गया है। स्वतंत्र शोधकर्ताओं और सहायता एजेंसियों को वहां जाने की कोई इजाजत नहीं है।
तिब्बत पर राष्ट्रीय सुरक्षा का चश्मा और चीन का पुराना ढर्रा
चीन की यह सेंसरशिप कोई नई बात नहीं है, बल्कि 1950 के दशक में तिब्बत पर नियंत्रण करने के बाद से ही इस क्षेत्र को देश का सबसे संवेदनशील इलाका माना जाता रहा है। अपनी स्वायत्तता और धार्मिक स्वतंत्रता की मांग को लेकर तिब्बत में होने वाले विरोध प्रदर्शनों और आत्मदाह की घटनाओं को बीजिंग हमेशा सख्ती से कुचलता आया है। तिब्बतियों को पासपोर्ट की अनुमति नहीं है और उन्हें पत्रकारों से बात करने पर गंभीर सजा दी जाती है।
इस व्यवस्था पर प्रकाश डालते हुए एसओएएस यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के ‘चाइना इंस्टीट्यूट’ के निदेशक स्टीव त्सांग ने कहा, “तिब्बत से जुड़ी हर चीज को राष्ट्रीय सुरक्षा के चश्मे से देखा जाता है। इसलिए कोई भी व्यक्ति तब तक कुछ भी नहीं कहेगा या रिपोर्ट नहीं करेगा, जब तक कि उसे सबसे शीर्ष स्तर से मंजूरी न मिल जाए।” उन्होंने आगे स्पष्ट करते हुए कहा, “जमीन पर मौजूद किसी भी व्यक्ति के लिए, यदि आपने खुद अपनी आंखों से अधिक शव देखे हों, तब भी आप मौतों का बढ़ा हुआ आंकड़ा तब तक नहीं बता सकते जब तक कि आधिकारिक बयान यह न कह दे कि यह आंकड़ा बढ़ गया है।” इस सुनियोजित चुप्पी और सूचना नियंत्रण की वजह से तिब्बत के बाढ़ पीड़ितों का दर्द हिमालय की दुर्गम पहाड़ियों के बीच दफन होकर रह

































