नई दिल्ली में हुए 18वें BRICS शिखर सम्मेलन ने शनिवार को जो घोषणापत्र जारी किया, उसमें एक लाइन ऐसी है जिस पर भारत ने महीनों मेहनत की थी — पहलगाम हमले की निंदा। 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए इस हमले में 26 लोग मारे गए थे। अब यह घटना दुनिया के पांच बड़े देशों के साझा दस्तावेज में दर्ज हो गई है। लेकिन इसमें एक पेच भी है, जिसे समझना जरूरी है।
घोषणापत्र में लिखा क्या है?
‘नई दिल्ली घोषणापत्र 2026’ में पहलगाम हमले का सीधा जिक्र है — मारे गए 26 लोगों की संख्या के साथ। इसके अलावा आतंकवाद से जुड़े कई मुद्दों को एक साथ रखा गया है: सीमा पार आतंकियों की आवाजाही, आतंकवाद की फंडिंग, आतंकियों के सुरक्षित ठिकाने, कट्टरपंथ, और इंटरनेट के जरिए फैलाया जाने वाला आतंकवाद।
एक और अहम बात — घोषणापत्र में साफ लिखा है कि आतंकवाद को किसी धर्म, राष्ट्रीयता या जातीय समूह से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। साथ ही यह भी कहा गया कि आतंकी गतिविधियों में शामिल लोगों और उनका समर्थन करने वालों को कानून के दायरे में लाया जाए।
पेच कहां है?
घोषणापत्र में किसी देश का नाम लेकर हमले की जिम्मेदारी तय नहीं की गई। यानी पाकिस्तान का सीधा जिक्र नहीं है। भारत लंबे समय से पाकिस्तान पर सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाता रहा है, लेकिन BRICS जैसे मंच पर, जहां कई देशों के अलग-अलग हित जुड़े होते हैं, किसी एक देश को सीधे कठघरे में खड़ा करना मुश्किल होता है। इसलिए भाषा सामान्य रखी गई — कि आतंकवाद किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं, चाहे वजह या मकसद कुछ भी हो।
दस्तावेज तैयार करने में भी आसानी नहीं रही। बातचीत शनिवार तड़के करीब 4 बजे तक चली, क्योंकि कई मुद्दों पर सदस्य देशों की राय अलग थी। इसके बावजूद पहलगाम पर सहमति बन पाना भारत के लिए राहत की बात मानी जा रही है।
हर जगह सहमति नहीं बनी
BRICS के भीतर सब कुछ आसान नहीं रहा। मई में हुई विदेश मंत्रियों की बैठक में संयुक्त बयान तक जारी नहीं हो सका था। सुरक्षा सलाहकारों की बैठक में ईरान और UAE के बीच तीखी बहस भी हुई — ईरान चाहता था कि आतंकवाद की निंदा में अमेरिका और इजरायल के खिलाफ “स्टेट टेररिज्म” का जिक्र भी जोड़ा जाए, जिस पर बाकी देश तैयार नहीं हुए। इन तनावों को देखते हुए ही नई दिल्ली घोषणापत्र में पहलगाम पर बनी सहमति को बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
भारत के लिए मायने क्या?
भारत के लिए यह सिर्फ एक लाइन की जीत नहीं है। आतंकवाद की फंडिंग, सीमा पार आवाजाही और सुरक्षित पनाहगाहों को एक साथ एजेंडे में लाना उस मांग की तस्दीक करता है जो भारत सालों से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा है — कि आतंकियों तक पैसा, पनाह और हथियार पहुंचाने वाले पूरे तंत्र पर कार्रवाई हो, सिर्फ हमलावरों पर नहीं। किसी देश का नाम न लिए जाने के बावजूद, घोषणापत्र की भाषा भारत की उसी सोच के करीब है।




























