रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भारत दौरे के दौरान BRICS को लेकर उनका बयान एक पुरानी लेकिन बेहद महत्वपूर्ण बहस को फिर सामने ले आया—क्या BRICS अब G7 से ज्यादा ताकतवर हो चुका है? क्या दुनिया की आर्थिक शक्ति पश्चिम से निकलकर एशिया, अफ्रीका और ग्लोबल साउथ की ओर जा रही है? और क्या आने वाले वर्षों में BRICS, G7 के सामने एक वास्तविक वैकल्पिक शक्ति बन सकता है?
इसका जवाब सीधे हां या ना में देना मुश्किल है। वजह यह है कि आर्थिक ताकत को मापने के अलग-अलग पैमानों पर तस्वीर अलग दिखाई देती है। BRICS के पास विशाल आबादी, बड़े बाजार और तेज आर्थिक वृद्धि है, जबकि G7 के पास प्रति व्यक्ति संपत्ति, डॉलर, वित्तीय संस्थाओं और वैश्विक नियमों पर ज्यादा प्रभाव है। यही वजह है कि BRICS को G7 से आगे निकल चुका बताना जल्दबाजी होगी, लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि शक्ति संतुलन में बदलाव नहीं हो रहा।
पहले समझिए BRICS और G7 हैं क्या?
G7 में अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली और जापान शामिल हैं। यूरोपीय संघ भी इसकी बैठकों में प्रतिनिधित्व करता है। G7 कोई औपचारिक अंतरराष्ट्रीय संगठन नहीं बल्कि प्रमुख विकसित अर्थव्यवस्थाओं का एक राजनीतिक-आर्थिक मंच है।
BRICS की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत और चीन से हुई थी और 2011 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद यह BRICS बना। इसके बाद समूह का तेजी से विस्तार हुआ। आज इसमें 11 सदस्य हैं—ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, यूएई और इंडोनेशिया। इसके अलावा कई Partner Countries भी हैं। यानी BRICS अब सिर्फ पांच देशों का समूह नहीं है। इसका भौगोलिक विस्तार एशिया, अफ्रीका, मध्य-पूर्व और लैटिन अमेरिका तक हो चुका है।
सबसे बड़ा सवाल—किसकी अर्थव्यवस्था बड़ी है?
यहीं से असली पेच शुरू होता है।अगर Purchasing Power Parity यानी PPP को आधार बनाया जाए तो BRICS की संयुक्त अर्थव्यवस्था लगभग 77 ट्रिलियन डॉलर और G7 की लगभग 57 ट्रिलियन डॉलर बताई जाती है। यानी PPP के हिसाब से BRICS करीब 20 ट्रिलियन डॉलर आगे दिखाई देता है।
लेकिन PPP को समझना जरूरी है। इसका मतलब यह है कि किसी देश में स्थानीय कीमतों के हिसाब से उसकी अर्थव्यवस्था कितनी वास्तविक खरीद क्षमता पैदा कर रही है। उदाहरण के लिए, 1 डॉलर से अमेरिका और भारत में समान मात्रा में सामान और सेवाएं नहीं खरीदी जा सकतीं। इसलिए भारत या चीन जैसी कम लागत वाली अर्थव्यवस्थाओं का आकार PPP में डॉलर के मौजूदा बाजार भाव से निकाली गई GDP की तुलना में बड़ा दिखाई देता है। IMF भी GDP के लिए PPP और current-dollar GDP को अलग-अलग मापता है।
फिर Nominal GDP में कौन आगे है?
यही वह जगह है जहां G7 की तस्वीर मजबूत हो जाती है। Nominal GDP में किसी देश की अर्थव्यवस्था को मौजूदा बाजार विनिमय दरों पर अमेरिकी डॉलर में मापा जाता है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, डॉलर में कर्ज, विदेशी निवेश और वैश्विक वित्तीय बाजारों में यह पैमाना बहुत महत्वपूर्ण है। उपलब्ध तुलना के अनुसार G7 की संयुक्त Nominal GDP लगभग 46 ट्रिलियन डॉलर है, जबकि BRICS की करीब 28 ट्रिलियन डॉलर। यानी इस पैमाने पर G7 अभी काफी आगे है।
लेकिन क्या बड़ी GDP का मतलब ज्यादा अमीर लोग हैं?
बिल्कुल नहीं। कुल GDP किसी देश या समूह की आर्थिक क्षमता बताती है, लेकिन आम नागरिक कितना समृद्ध है, यह समझने के लिए Per Capita Income देखनी पड़ती है। उपलब्ध तुलना में G7 की औसत प्रति व्यक्ति आय 53,000 डॉलर से ज्यादा, जबकि BRICS में यह 9,500 डॉलर से कम बताई गई है। BRICS की आबादी G7 से लगभग पांच गुना है। इसलिए BRICS का कुल आर्थिक आकार बहुत बड़ा हो सकता है, लेकिन औसत नागरिक की आय के मामले में G7 अभी बहुत आगे है। यही अंतर बताता है कि सिर्फ GDP देखकर यह कहना कि BRICS के लोग G7 से ज्यादा समृद्ध हो चुके हैं, गलत होगा।
फिर BRICS की सबसे बड़ी ताकत क्या है?
BRICS की सबसे बड़ी ताकत Growth है। BRICS की अर्थव्यवस्थाएं औसतन लगभग 4% की दर से बढ़ रही हैं, जबकि G7 की औसत वृद्धि करीब 1% के आसपास बताई गई है। खासकर यूरोप की धीमी वृद्धि ने G7 की औसत रफ्तार को प्रभावित किया है। यानी आज की तस्वीर से ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि अगले 10-20 साल में कौन तेजी से बढ़ेगा? भारत और चीन जैसे बड़े बाजार, युवा आबादी, औद्योगिकीकरण और बढ़ती घरेलू खपत BRICS की ताकत बढ़ाते हैं। अगर यह वृद्धि लंबे समय तक बनी रहती है तो BRICS का वैश्विक आर्थिक प्रभाव भी बढ़ना तय है।
क्या NDB ने World Bank और IMF को पीछे छोड़ दिया?
2015 में BRICS देशों ने New Development Bank यानी NDB बनाया। इसका उद्देश्य विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में infrastructure और sustainable development projects के लिए वित्त उपलब्ध कराना है।
जून 2026 तक NDB ने 141 परियोजनाओं के लिए करीब 44 अरब डॉलर की cumulative financing मंजूर की थी और लगभग 25 अरब डॉलर disburse किए थे। भारत NDB का दूसरा सबसे बड़ा recipient है—35 approved infrastructure projects के लिए करीब 10.5 अरब डॉलर की financing मंजूर हुई थी।
पर अभी भी World Bank और IMF की वैश्विक पहुंच, वित्तीय क्षमता और संस्थागत प्रभाव अभी कहीं बड़ा है। लेकिन NDB का महत्व इस बात में है कि विकासशील देशों के पास अब एक अतिरिक्त वित्तीय विकल्प है।
क्या BRICS डॉलर को खत्म कर सकता है?
BRICS देशों में de-dollarisation यानी डॉलर पर निर्भरता कम करने की चर्चा जरूर बढ़ी है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और cross-border payments को बढ़ावा देने पर काम भी चल रहा है। BRICS ने cross-border payments और payment-system interoperability पर चर्चा आगे बढ़ाई है। लेकिन अभी डॉलर का विकल्प तैयार नहीं हुआ है। IMF के अनुसार 2026 की पहली तिमाही में दुनिया के official foreign-exchange reserves में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी 57.13% थी, जबकि चीनी RMB की हिस्सेदारी सिर्फ 1.99% थी।
क्या BRICS देशों की अपनी currency बन सकती है?
सैद्धांतिक चर्चा जरूर होती है, लेकिन यह बेहद मुश्किल काम है। एक साझा currency के लिए सिर्फ बड़ी GDP पर्याप्त नहीं है। देशों को अपनी monetary policy, inflation, capital flows, exchange rates और financial systems के बीच भारी स्तर का coordination करना होगा।
इसके अलावा BRICS देशों के राजनीतिक और आर्थिक हित हमेशा समान नहीं हैं। भारत और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है। भारत पश्चिमी देशों के साथ भी गहरे व्यापारिक और रणनीतिक संबंध रखता है। रूस, चीन, ईरान और अन्य सदस्य देशों की अपनी अलग प्राथमिकताएं हैं। इसलिए एक साझा BRICS currency फिलहाल दूर की संभावना है।
तो G7 की सबसे बड़ी ताकत क्या है?
G7 की ताकत सिर्फ GDP नहीं है। असली ताकत financial system, technology, capital markets और institutions पर प्रभाव है। अमेरिकी डॉलर की reserve-currency position, वैश्विक वित्तीय बाजारों में अमेरिकी भूमिका और IMF, World Bank जैसी संस्थाओं में पश्चिमी देशों का प्रभाव G7 को ऐसी ताकत देता है जो केवल GDP से नहीं मापी जा सकती। इसलिए BRICS के पास बड़ा बाजार और तेज growth है, लेकिन G7 के पास अभी भी वैश्विक आर्थिक सिस्टम के infrastructure पर ज्यादा पकड़ है।
क्या BRICS G7 को पीछे छोड़ चुका है?
PPP में BRICS की ताकत बड़ी दिखाई देती है। आबादी, प्राकृतिक संसाधन, ऊर्जा, बाजार और growth भी उसके पक्ष में हैं। लेकिन Nominal GDP, प्रति व्यक्ति आय, डॉलर, global finance और स्थापित संस्थागत प्रभाव में G7 की बढ़त अभी कायम है। इसलिए इसे “BRICS ने G7 को हरा दिया” कहना सही तस्वीर नहीं होगी। ज्यादा सटीक बात यह है कि दुनिया की आर्थिक शक्ति अब पहले की तरह सिर्फ पश्चिमी देशों में केंद्रित नहीं रही।
इसलिए BRICS बनाम G7 की कहानी किसी एक दिन का power shift नहीं है। यह एक लंबी प्रक्रिया है—जहां BRICS आर्थिक वजन बढ़ाकर दुनिया में ज्यादा जगह मांग रहा है और G7 अपनी मौजूदा वित्तीय, तकनीकी और संस्थागत बढ़त बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।




























