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Starlink, Jio और OneWeb के लिए भारत में खुलने वाला है बड़ा रास्ता, अब टावर नहीं, आसमान से आएगा इंटरनेट!

Starlink की एंट्री से क्या बदलेगा इंटरनेट का खेल? जानिए स्पेक्ट्रम, कीमत और दूरदराज इलाकों तक पहुंचने की पूरी कहानी

Abhishek Sharma द्वारा Abhishek Sharma
8 September 2026
in चर्चित
starlink,oneweb,jio hyperlink satellite internet
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भारत में सैटेलाइट आधारित इंटरनेट सेवाओं का इंतजार अब एक अहम पड़ाव पर पहुंचता दिख रहा है। Starlink, Eutelsat OneWeb और Jio जैसी कंपनियों के लिए सैटेलाइट स्पेक्ट्रम आवंटन की प्रक्रिया आगे बढ़ने की खबरों के बीच यह सवाल फिर चर्चा में है कि आखिर भारत में सैटेलाइट इंटरनेट कब शुरू होगा और क्या यह आम लोगों के इंटरनेट इस्तेमाल का तरीका बदल देगा?

हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, सैटेलाइट स्पेक्ट्रम के इस्तेमाल की फीस और आवंटन की शर्तों पर सरकार के स्तर पर फैसला आगे बढ़ा है। इससे पहले TRAI ने सैटेलाइट आधारित कमर्शियल कम्युनिकेशन सेवाओं के लिए स्पेक्ट्रम आवंटन से जुड़ी सिफारिशें जारी की थीं। हालांकि, अंतिम नीतिगत और प्रशासनिक प्रक्रियाएं पूरी होना अभी भी जरूरी है। इसलिए इसे सेवाओं के तत्काल शुरू होने की घोषणा नहीं माना जा सकता।

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मामले की अहमियत इसलिए ज्यादा है क्योंकि भारत में इंटरनेट पहुंचाने का यह बिल्कुल अलग मॉडल है। अभी हम ज्यादातर मोबाइल टावरों, ऑप्टिकल फाइबर और केबल नेटवर्क पर निर्भर हैं। सैटेलाइट इंटरनेट में डेटा सीधे अंतरिक्ष में मौजूद उपग्रहों के नेटवर्क के जरिए जमीन पर बने टर्मिनल तक पहुंचता है। इसका सबसे बड़ा फायदा उन इलाकों में हो सकता है जहां पहाड़, घने जंगल, रेगिस्तान या समुद्री दूरी के कारण फाइबर नेटवर्क पहुंचाना मुश्किल और महंगा है।

पांच साल का स्पेक्ट्रम और 5 फीसदी AGR शुल्क

सैटेलाइट स्पेक्ट्रम के लिए प्रस्तावित ढांचे में कंपनियों को सीमित अवधि के लिए स्पेक्ट्रम आवंटित करने और स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क लेने की व्यवस्था पर विचार हुआ है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, शुल्क को कंपनियों के Adjusted Gross Revenue यानी AGR के प्रतिशत से जोड़ने का प्रस्ताव है और दूरदराज या कम सेवा वाले क्षेत्रों के लिए कुछ राहत भी संभव है।

इसका उद्देश्य केवल कंपनियों को भारत के बाजार में प्रवेश देना नहीं है। सरकार के सामने बड़ी चुनौती यह भी है कि एक ओर नई तकनीक को बढ़ावा दिया जाए और दूसरी ओर पारंपरिक टेलीकॉम कंपनियों के साथ नियमों में संतुलन बनाया जाए। यही कारण है कि भारत में सैटेलाइट स्पेक्ट्रम को लेकर बहस काफी लंबी चली।

असली लड़ाई थी स्पेक्ट्रम की, नीलामी हो या प्रशासनिक आवंटन?

भारत में 4G और 5G जैसी मोबाइल सेवाओं के लिए टेलीकॉम कंपनियां स्पेक्ट्रम नीलामी में बड़ी रकम खर्च करती हैं। ऐसे में Reliance Jio और Bharti Airtel जैसे पारंपरिक टेलीकॉम ऑपरेटरों की चिंता रही कि अगर सैटेलाइट कंपनियों को अलग तरीके से स्पेक्ट्रम मिलेगा और वे सीधे आम ग्राहकों को इंटरनेट बेचेंगी, तो प्रतिस्पर्धा के नियमों में अंतर पैदा हो सकता है।

दूसरी तरफ, सैटेलाइट ऑपरेटरों का तर्क रहा है कि सैटेलाइट स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साझा संसाधन के रूप में होता है। अलग-अलग देशों में नीलामी का मॉडल वैश्विक सैटेलाइट नेटवर्क के संचालन को जटिल बना सकता है। भारत ने इस बहस के बीच सैटेलाइट कम्युनिकेशन के लिए प्रशासनिक आवंटन का रास्ता अपनाया। लेकिन प्रशासनिक आवंटन का मतलब मुफ्त स्पेक्ट्रम नहीं है। कंपनियों को तय शर्तों और शुल्क के तहत स्पेक्ट्रम दिया जाएगा।

सुरक्षा मंजूरी सबसे बड़ी शर्त क्यों है?

सैटेलाइट इंटरनेट सिर्फ तकनीक या स्पेक्ट्रम का मामला नहीं है। भारत के लिए यह राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा मुद्दा है। सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि भारत से आने-जाने वाला कम्युनिकेशन भारतीय कानूनों और सुरक्षा नियमों के दायरे में रहे। दूरसंचार विभाग के GMPCS नियमों के अनुसार, सुरक्षा शर्तों में भारतीय ट्रैफिक की रूटिंग, देश में गेटवे, कानूनी इंटरसेप्शन और अन्य सुरक्षा मानकों का पालन शामिल है। यही वजह है कि विदेशी सैटेलाइट ऑपरेटरों के लिए केवल लाइसेंस मिलना ही काफी नहीं, बल्कि सुरक्षा से जुड़ी मंजूरियां भी उतनी ही अहम हैं।

Starlink के भारत में सफर का एक पुराना विवाद भी इसका उदाहरण है। 2021 में कंपनी ने भारत में प्री-ऑर्डर लेना शुरू किया था। इसके बाद दूरसंचार विभाग ने बिना जरूरी लाइसेंस के ऐसी सेवाओं की बुकिंग पर रोक लगाने को कहा था। इसके बाद भारत में सैटेलाइट इंटरनेट लॉन्च करने की प्रक्रिया नियमों और मंजूरियों के रास्ते से आगे बढ़ी।

क्या सैटेलाइट इंटरनेट सस्ता होगा?

इसका सीधा जवाब है—शायद नहीं। कम से कम शुरुआती दौर में सैटेलाइट इंटरनेट के Jio या Airtel के सामान्य मोबाइल डेटा प्लान से सस्ता होने की उम्मीद नहीं है।

सैटेलाइट कनेक्शन के लिए एक विशेष टर्मिनल या एंटीना की जरूरत होती है। इसके अलावा मासिक सेवा शुल्क भी होता है। भारत में कीमतें कंपनियों के अंतिम कमर्शियल प्लान आने के बाद ही साफ होंगी। इसलिए अभी Starlink या किसी दूसरी कंपनी के भारत में संभावित प्लान और कीमतों को अंतिम मान लेना जल्दबाजी होगी। दरअसल सैटेलाइट इंटरनेट का असली लक्ष्य सस्ता डेटा देना नहीं, बल्कि वहां कनेक्टिविटी पहुंचाना है जहां सामान्य नेटवर्क नहीं पहुंच पाता।

फिर सबसे ज्यादा फायदा किसे होगा?

हिमालय के दुर्गम इलाके, उत्तर-पूर्व के दूरदराज क्षेत्र, रेगिस्तानी इलाकों और अंडमान-निकोबार तथा लक्षद्वीप जैसे द्वीपीय क्षेत्रों में इसकी उपयोगिता सबसे ज्यादा हो सकती है।

प्राकृतिक आपदाओं के दौरान भी यह तकनीक अहम साबित हो सकती है। बाढ़, भूस्खलन, चक्रवात या भूकंप में जब मोबाइल टावर और फाइबर नेटवर्क प्रभावित हो जाते हैं, तब सैटेलाइट कनेक्टिविटी राहत और बचाव एजेंसियों के लिए वैकल्पिक संचार माध्यम बन सकती है।

इसका इस्तेमाल समुद्री जहाजों, विमानन सेवाओं, दूरदराज संस्थानों और सीमावर्ती क्षेत्रों में भी बढ़ सकता है। हालांकि हर उपयोग के लिए एक ही लाइसेंस या सेवा श्रेणी लागू नहीं होती और अलग-अलग नियामकीय शर्तें हो सकती हैं।

कुल मिलाकर, भारत में सैटेलाइट इंटरनेट की कहानी अभी शहरों में मौजूदा फाइबर ब्रॉडबैंड को बदलने की नहीं है। इसकी असली ताकत उस जगह इंटरनेट पहुंचाने में है जहां आज भी नेटवर्क की पहुंच सीमित है। Starlink, OneWeb और दूसरी कंपनियों के लिए नियामकीय रास्ता जितना साफ होगा, उतना ही भारत का डिजिटल नक्शा जमीन से निकलकर अंतरिक्ष की ओर बढ़ता दिखाई देगा।

Tags: Eutelsat OneWebIndia TelecomInternet ConnectivityReliance JioSatcom IndiaSatellite BroadbandSatellite InternetSatellite SpectrumSpaceX StarlinkStarlink IndiaTRAI
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