मंगलवार की सुबह विशाखापत्तनम में एक बड़ा जहाज़ बंगाल की खाड़ी में उतरा। वहां खड़े लोगों ने ज़ोरदार जयकारे लगाए। यह नौसेना का पहला फ्लीट सपोर्ट शिप एफएसएस-1 था। इसी शिपयार्ड से 1948 में भी एक जहाज़ पानी में उतरा था। उसका नाम था ‘जल उषा’। वह आज़ाद भारत में बना पहला जहाज़ था। दोनों जहाज़ हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड (एचएसएल) ने बनाए हैं। एक से इस शिपयार्ड की पहचान बनी थी। दूसरा दिखाता है कि शिपयार्ड आज कहां पहुंच गया है।
1941 में शुरुआत, 1948 में पहला जहाज़
एचएसएल की शुरुआत 1941 में हुई थी। सात साल बाद, 1948 में, यहां से ‘जल उषा’ पानी में उतरा। यह सफ़र अब आठ दशक का हो चुका है। आज एचएसएल रक्षा मंत्रालय के तहत काम करने वाली मिनीरत्न कंपनी है। यहां नौसेना के लिए जहाज़ और पनडुब्बियां बनती हैं और उनकी मरम्मत भी होती है।
मंगलवार को क्या हुआ
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह पहली बार एचएसएल आए। उनके हाथों एक ही सुबह में तीन बड़े काम हुए। यह दिन शिपयार्ड के आठ दशक के सफ़र का एक अहम पड़ाव बन गया। पहला काम था एफएसएस-1 को पानी में उतारना। नेवी वाइव्स वेलनेस एसोसिएशन की अध्यक्ष लैला स्वामीनाथन ने रस्में पूरी कीं और जहाज़ को नाम दिया। दूसरा काम था एफएसएस-5 की कील रखना, यानी इसी तरह के पांचवें जहाज़ की नींव रखना। तीसरा काम था बड़े किए गए स्लिपवे-4 और 300 टन की गोलियथ क्रेन का उद्घाटन।
आज का जहाज़ कैसा है
एफएसएस-1 43,500 टन का जहाज़ है। इसका डिज़ाइन एचएसएल ने ख़ुद बनाया है और जहाज़ भी यहीं बना है। स्टील कटने के सिर्फ़ 18 महीने बाद यह पानी में उतर गया। यह जहाज़ बीच समुद्र में नौसेना के जंगी जहाज़ों तक तेल और ज़रूरी सामान पहुंचाएगा। इससे नौसेना के जहाज़ ज़्यादा दिनों तक और घर से ज़्यादा दूर तक समुद्र में रह सकेंगे।
जहाज़ में तेल और सामान रखने की काफ़ी जगह है। मरम्मत के लिए वर्कशॉप, हेलीकॉप्टर के लिए डेक और अपने बचाव का इंतज़ाम भी इसमें है। और यह अकेला जहाज़ नहीं है। नौसेना के लिए ऐसे पांच जहाज़ बन रहे हैं। एफएसएस-5 की कील रखे जाने के साथ एचएसएल इन्हें एक के बाद एक बनाने की तरफ़ बढ़ रहा है।
अब और बड़े जहाज़ों की तैयारी
स्लिपवे वह जगह है जहां जहाज़ बनता है और जहां से उसे पानी में उतारा जाता है। स्लिपवे-4 को पहले से लंबा और मज़बूत किया गया है। अब यहां 45,000 डीडब्ल्यूटी तक के जहाज़ बन सकते हैं। 300 टन की नई गोलियथ क्रेन ‘मेक इन इंडिया’ के तहत बनी है। इसे एलएंडटी जियोस्ट्रक्चर ने कोनक्रेन्स के साथ मिलकर बनाया है। यह क्रेन स्लिपवे-3 और स्लिपवे-4, दोनों के ऊपर फैली है। इससे जहाज़ के भारी हिस्से जल्दी और ज़्यादा सही तरीक़े से उठाए जा सकेंगे।
राजनाथ सिंह ने कहा, “नए स्लिपवे और 300 टन की गोलियथ क्रेन के साथ एचएसएल अब और बड़े और पेचीदा जहाज़ बनाने के लिए तैयार है।” उन्होंने यह भी कहा, “एफएसएस-1 का पानी में उतरना और एफएसएस-5 की कील रखा जाना दिखाता है कि आत्मनिर्भरता इस्पात में ढल रही है। इससे हिंद महासागर में हमारी नौसेना की पहुंच बढ़ रही है।”
देश के लिए भी, दुनिया के लिए भी
एचएसएल के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर रियर एडमिरल सी. रघुराम (रिटायर्ड) ने रक्षा मंत्री के आने को शिपयार्ड के हर सदस्य के लिए गर्व और हौसले की बात बताया। उन्होंने कहा कि आज की कामयाबी कर्मचारियों की लगन, नौसेना के भरोसे और कारोबारी साथियों के साथ को दिखाती है। रघुराम ने कहा कि एचएसएल अब देश के लिए ही नहीं, दुनिया के लिए भी नई पीढ़ी के जहाज़ बनाने को तैयार है।
इस मौक़े पर नौसेना प्रमुख एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन, विशाखापत्तनम के सांसद श्रीभरत मथुकुमिल्ली और रक्षा उत्पादन सचिव संजीव कुमार भी मौजूद थे। पिछले पंद्रह महीने एचएसएल के लिए बहुत अच्छे रहे हैं। इसके बनाए दो जहाज़ नौसेना में शामिल हुए और साल 2025-26 शिपयार्ड का अब तक का सबसे अच्छा साल रहा।
नाम में ही हिंदुस्तान
राजनाथ सिंह ने एचएसएल को भारत की समुद्री ताक़त का स्तंभ बताया। फिर उन्होंने शिपयार्ड के नाम की बात की। उन्होंने कहा कि यहां से निकलने वाला हर जहाज़ अपने साथ सिर्फ़ अपना नाम नहीं, हिंदुस्तान का नाम भी लेकर जाता है। 1948 में ‘जल उषा’ यही नाम लेकर निकला था। 2026 में एफएसएस-1 भी यही नाम लेकर समुद्र में उतरा है।





























