देश में इस समय SIR यानी Special Intensive Revision और Census 2027 को लेकर बहस चल रही है। इसी बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने एक बार फिर पूरे देश में National Register of Citizens यानी NRC लागू करने की मांग उठाई है। RSS के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने 30 सितंबर को दिल्ली में कहा कि यह पहचानना जरूरी है कि कौन भारतीय नागरिक है और कौन नहीं। उनके मुताबिक इससे जनसंख्या असंतुलन, गलत तरीके से मतदाता सूची में शामिल लोगों और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सवालों को संबोधित किया जा सकता है।
लेकिन NRC आखिर है क्या, RSS इसे क्यों जरूरी मानता है और क्या Census के साथ देशभर में NRC लागू होने जा रहा है? इन सवालों को अलग-अलग समझना जरूरी है।
RSS की दलील क्या है?
सुनील आंबेकर की दलील का मुख्य आधार नागरिकों की स्पष्ट पहचान है। उन्होंने कहा कि अगर किसी व्यक्ति का नाम गलत तरीके से मतदाता सूची में शामिल है तो उसकी पहचान होनी चाहिए। इसी तरह पड़ोसी देशों से भारत आए उन लोगों की नागरिकता सुनिश्चित करने की बात उन्होंने कही, जो CAA के तहत पात्र हैं। उनके मुताबिक ऐसे लोगों की पहचान NRC के जरिए की जा सकती है।
RSS इस मुद्दे को केवल मतदाता सूची तक सीमित नहीं रखता। आंबेकर ने इसे देश की एकता, अखंडता और सुरक्षा तथा जनसंख्या के स्वरूप से जोड़कर देखा। उन्होंने भारत के विभाजन और उसके बाद पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों की स्थिति का भी हवाला दिया। यह RSS की राजनीतिक-सामाजिक दृष्टि है और इसे उसी संदर्भ में समझना चाहिए।
NRC आखिर होता क्या है?
NRC यानी National Register of Citizens का उद्देश्य भारतीय नागरिकों का आधिकारिक रजिस्टर तैयार करना है। इसके लिए कानूनी आधार Citizenship Act, 1955 में मौजूद है। कानून की धारा 14A केंद्र सरकार को नागरिकों का अनिवार्य पंजीकरण करने और National Register of Indian Citizens बनाए रखने की शक्ति देती है।
यानी NRC का मूल विचार नया नहीं है। सवाल यह है कि इसे पूरे देश में किस प्रक्रिया, किन दस्तावेजों और किन मानकों के आधार पर लागू किया जाए।
RSS को NRC की जरूरत क्यों लगती है?
RSS की दलील को मोटे तौर पर तीन हिस्सों में समझा जा सकता है। पहला है नागरिकता की स्पष्ट पहचान। संगठन का तर्क है कि देश में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति की नागरिकता की स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।
दूसरा है मतदाता सूची की शुद्धता। आंबेकर ने कहा कि अगर गैर-नागरिक या गलत तरीके से शामिल व्यक्ति मतदाता सूची में हैं तो उनकी पहचान होनी चाहिए। हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है कि NRC और मतदाता सूची की SIR एक ही प्रक्रिया नहीं हैं। SIR चुनाव आयोग की मतदाता सूची की समीक्षा है, जबकि NRC नागरिकता का रजिस्टर है।
तीसरा मुद्दा है अवैध प्रवासन और जनसांख्यिकीय बदलाव। RSS लंबे समय से इस चिंता को उठाता रहा है। 2019 में तत्कालीन RSS महासचिव सुरेश भैयाजी जोशी ने भी NRC को सरकार की जिम्मेदारी बताते हुए नागरिकों और गैर-नागरिकों की पहचान की बात कही थी। 2021 में RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि NRC का उद्देश्य वास्तविक नागरिकों की पहचान करना है और इसे केवल हिंदू-मुस्लिम मुद्दे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
Census और NRC का क्या कनेक्शन है?
यहीं से मौजूदा बहस और महत्वपूर्ण हो जाती है। देश में Census 2027 की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इसके लिए केंद्र सरकार ने आधिकारिक अधिसूचना जारी की है। Census में आबादी से जुड़ी जानकारी जुटाई जाती है, जबकि NRC का मकसद नागरिकों का रजिस्टर तैयार करना है। दोनों को एक ही प्रक्रिया समझना सही नहीं होगा।
हालांकि Citizenship Rules में Population Register के सत्यापन के आधार पर नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर की दिशा में आगे बढ़ने का कानूनी ढांचा मौजूद है। यही वजह है कि Census के समय NRC की चर्चा फिर तेज हुई है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अभी पूरे देश में NRC लागू करने की कोई अलग सरकारी घोषणा नहीं हुई है। इसलिए Census 2027 को अपने आप Nationwide NRC की शुरुआत मानना सही नहीं होगा।
SIR और NRC में सबसे बड़ा अंतर
SIR का संबंध मतदाता सूची से है। इसका उद्देश्य यह देखना है कि कौन व्यक्ति उस निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में शामिल होने का पात्र है। NRC का सवाल इससे व्यापक है कि कौन भारतीय नागरिक है?
यही कारण है कि SIR के दौरान नागरिकता से जुड़े दस्तावेजों और पहचान पर होने वाली बहस को NRC की संभावित प्रक्रिया से जोड़कर देखा जा रहा है। विपक्ष के कुछ नेता SIR को NRC की ओर बढ़ने का रास्ता बताते रहे हैं, जबकि चुनाव आयोग SIR को मतदाता सूची की समीक्षा की प्रक्रिया के रूप में देखता है। इस अंतर को समझना जरूरी है।
Assam NRC से क्यों होती है तुलना?
Nationwide NRC की चर्चा होते ही असम NRC का उदाहरण सामने आता है। असम में NRC की प्रक्रिया राज्य के विशेष ऐतिहासिक और राजनीतिक संदर्भ में हुई थी। वहां नागरिकता के लिए 24 मार्च 1971 की मध्यरात्रि से पहले राज्य में मौजूदगी या पूर्वज की मौजूदगी से जुड़े दस्तावेजों को महत्वपूर्ण आधार बनाया गया था।
लेकिन पूरे देश के लिए वैसी ही कटऑफ तारीख या दस्तावेजों की सूची अपने आप लागू नहीं हो जाती। Nationwide NRC होने की स्थिति में सरकार को अलग प्रक्रिया और नियम तय करने होंगे।
असली बहस अब किस बात पर है?
NRC पर बहस केवल इस सवाल की नहीं है कि “नागरिकों की पहचान होनी चाहिए या नहीं”। असली सवाल यह है कि पहचान कैसे होगी, कौन से दस्तावेज स्वीकार होंगे, जिनके पास दस्तावेज नहीं हैं उनके लिए क्या व्यवस्था होगी और किसी व्यक्ति की नागरिकता पर संदेह होने पर उसे अपना पक्ष रखने का कितना अवसर मिलेगा।
RSS का कहना है कि कानूनी और न्यायिक रास्तों के जरिए आपत्तियों का समाधान किया जा सकता है। दूसरी ओर, NRC के आलोचक असम के अनुभव और दस्तावेजी प्रक्रिया से बाहर रह जाने के जोखिम को लेकर सवाल उठाते हैं। यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि देशभर में NRC लागू करने का फैसला अभी सरकार ने घोषित नहीं किया है।
इसलिए फिलहाल तस्वीर इतनी है कि RSS ने Nationwide NRC की मांग फिर जोर से उठाई है, Census 2027 चल रहा है और SIR ने नागरिकता तथा मतदाता पहचान की बहस को और तेज कर दिया है। लेकिन Census अपने आप NRC नहीं है और अभी पूरे देश के लिए NRC लागू करने की कोई आधिकारिक अधिसूचना सामने नहीं आई है।






























