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अब अरुणाचल प्रदेश में इंफ्रास्ट्रक्चर को ‘बूस्ट’ करेगी मोदी सरकार!

अरुणाचल की आधारभूत संरचना से निर्मित होगा अजेय भारत!

Aniket Raj द्वारा Aniket Raj
25 October 2021
in चर्चित
अरुणाचल प्रदेश विकास

Source- Google

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जब से नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, वो पूर्वोत्तर के विकास पर जोर दे रहे हैं जो काफी समय से लंबित था। उनकी ‘एक्ट ईस्ट’ नीति फल दे रही है और पूर्वोत्तर के लोगों द्वारा इसकी काफी प्रशंसा भी की जा रही है। सड़कों, पुलों और हवाई अड्डों ने पूर्वोत्तर के राज्यों को शेष भारत और राजधानी दिल्ली से काफी अच्छी तरह से जोड़ा है। हालांकि, अजीब बात यह है कि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी इन परिवर्तनों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं, और मंगलवार को अरुणाचल प्रदेश के ईटानगर में एक रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने पूर्वोत्तर में मोदी सरकार द्वारा शुरू की गई इन विकास परियोजनाओं को छोटा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

दरअसल, देश का पूर्वी राज्य अरुणाचल प्रदेश, चीन के साथ अपनी सबसे लंबी सीमा साझा करता है, उसके बाद म्यांमार और भूटान का स्थान आता है। केंद्र सरकार ने अरुणाचल प्रदेश में 1,100 करोड़ रुपये से अधिक की अनुमानित लागत से महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे के विकास को मंजूरी दी है। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने बताया कि इसमें 598 किलोमीटर लंबी सड़कें और 18 फुट के ट्रैक का निर्माण शामिल है। अधिकारी ने कहा कि ज्यादातर परियोजनाएं अरुणाचल के उत्तर और पूर्वोत्तर हिस्से में चीन की सीमा से लगे क्षेत्रों में निर्धारित की गई है।

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विकास की गति 

वहीं, अरुणाचल प्रदेश के सांसद और केंद्रीय खेल मंत्री किरेन रिजिजू का कहना है कि, “चीन सीमा पर विकास की गति 2014 के बाद तेज हुई थी। पहले, सरकार एक प्रतिबंधात्मक नीति का पालन करती थी और चीन सीमा के साथ के क्षेत्रों को ज्यादा विकसित नहीं किया गया था। लेकिन अब चीन सीमा पर अब कई परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है और निर्माण तेज गति से हो रहा है। इस परियोजना में मोटर योग्य सड़क, खच्चर ट्रैक और कुलियों के लिए सुविधाएं शामिल हैं।”

गौरतलब है कि दिसंबर 2020, में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) ने अरुणाचल प्रदेश में 1162.19 करोड़ की लागत से महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे के विकास के प्रस्ताव को मंजूरी दी, क्योंकि चीन ने भी अरूणाचल के सीमावर्ती क्षेत्रों में नए गांवों की स्थापना और राजमार्गों सहित सड़क नेटवर्क की भूल भुलैया में तेजी से प्रगति की है।

आप स्वयं समझिए कि भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के जवानों को सड़क और पैदल मार्ग की कमी के कारण अरुणाचल-चीन सीमा पर अंतिम गश्ती बिंदु तक पैदल मार्च करने में लगभग 21 दिन लगते थे। ऐसे में सरकार द्वारा यह कदम उठाना कितना ज्यादा जरुरी था।

और पढ़ें: अरुणाचल प्रदेश ने चीन से आ रहे अवैध प्रवासियों पर नकेल कसना शुरू कर दिया है

सीमावर्ती इलाकों में जारी है निर्माण

भारत और चीन हाल ही में पूर्वी लद्दाख में पैंगोंग त्सो झील के उत्तरी-दक्षिणी किनारे और गलवान क्षेत्र में 10 महीने तक आमने-सामने थे। लद्दाख के अन्य क्षेत्रों- देपसांग, डेमचोक, गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स और गलवान घाटी में बिल्ड-अप जारी है, जहां वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर चीनी सैनिकों को अवरूद्ध किया गया है। लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में ₹12,434.90 करोड़ की राशि से 638.12 किमी सड़कें बनाई जानी हैं। गृह मंत्रालय (एमएचए) 912 करोड़ की अनुमानित लागत पर चीन के क्षेत्रों के साथ कुल 608 किलोमीटर की 27 प्राथमिकता वाली सड़कों का निर्माण करेगा और अन्य 14 सड़कों का निर्माण सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) के एजेंसियों द्वारा किया जाएगा।

कैबिनेट ने दिसंबर 2020 तक सड़कों के निर्माण को पूरा करने के लिए ₹3482.52 करोड़ मंजूर किए। एक संसदीय स्थायी समिति की दिसंबर 2019 की रिपोर्ट के अनुसार, सभी 137 सड़कों को चीन की सीमा के साथ तीन चरणों में बनाया जाना है जिसमे पहले चरण में 41, दूसरे चरण के तहत 46 और तीसरे चरण में 50 सड़क बनेगी।

और पढ़े- चीन से अरुणाचल की ओर भारतीय सेना ने शुरू की मार्चिंग, मकसद बिलकुल स्पष्ट है भारतीय सीमावर्ती क्षेत्रों को चीन से मुक्त करवाना

रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है पुल, सड़क और हवाईअड्डों का निर्माण

बताते चलें कि 9.15 किलोमीटर लंबा ढोला सादिया पुल, या भूपेन हजारिका सेतु, यह भारत का सबसे लंबा पुल है, जो असम और अरुणाचल प्रदेश को जोड़ता है, मोदी शासन के दौरान ही पूरा हुआ। पिछली सरकारों द्वारा इन योजनाओं में देरी और लागत में वृद्धि देखी गई थी। वहीं, अरुणाचल प्रदेश पर चीन के नाजायज दावों और भारत के साथ लगातार सीमा तनाव को देखते हुए, पुल भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक संपत्ति है। ढोला सादिया पुल भारत के अर्जुन और टी-72 मुख्य युद्धक टैंक जैसे 60 टन के टैंक को संभाल सकता है। यह चीनी घुसपैठ या हमले के मामले में अरुणाचल सीमा पर बलों की तेजी से तैनाती में मदद करेगा।

भारत का सबसे लंबा रेल-सह-सड़क पुल बोगीबिल पुल है, जो असम में ब्रह्मपुत्र नदी के ऊपर बना है। इसकी लंबाई 4.94 किलोमीटर है। पिछले साल 25 दिसंबर को पीएम मोदी ने इसका उद्घाटन किया था।यह पुल असम में डिब्रूगढ़ और धेमाजी को जोड़ता है। यह असम-अरुणाचल सीमा से लगभग 20 किमी दूर स्थित है। यह अत्यधिक सामरिक है और सैन्य महत्व के काम भी आ सकता है।

बताते चलें कि 32,000 करोड़ रुपये के निवेश से 4,000 किलोमीटर से अधिक राष्ट्रीय राजमार्गों को मंजूरी दी गई है और इस क्षेत्र में लगभग 1,200 किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया गया है। केंद्र ने क्षेत्र में विशेष त्वरित सड़क विकास कार्यक्रम के तहत 60,000 करोड़ रुपये का निवेश भी किया है। मोदी सरकार ने 900 किलोमीटर लंबी पटरियों को ब्रॉडगेज में बदला है, त्रिपुरा को पहली राजधानी एक्सप्रेस मिली है। अरुणाचल प्रदेश और असम को अपनी पहली शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेन मिल गई है। सिक्किम को अपना पहला हवाई अड्डा, पाकयोंग हवाई अड्डा पिछले साल सितंबर में मिला। महत्वपूर्ण रूप से यह हवाई अड्डा भारत-चीन सीमा से मात्र 60 किमी दूर स्थित है।

और पढ़ें: “1962 vs 2020”, भारत के घातक SFF और इंडो-तिब्बत सैनिकों ने चीन से वापस छीनी Reqin पोस्ट

निष्कर्ष

गौरतलब है कि युद्ध की अवस्था में तीव्रता का बड़ा महत्व है। अगर आप तेज है तो आप शत्रु पर भारी पड़ेंगे ये निश्चित है। 1962 के युद्ध के हार का भी मुख्य कारण यही था। अगर आपके सेना के पास सैन्य संसाधन रसद और सुगम व्यवस्था ना हो तो पराजय अपरिहार्य हो जाती है। भारतीय सेना को अगर गुणवत्ता पूर्ण संसाधन मिले तो यह सेना दुनिया की किसी महाशक्ति को पराजित कर भारतीय हितों की सुरक्षा करने में समर्थ है। मोदी सरकार ने इस चीज के पहचान लिया है और तीव्रता से इसके निराकरण की ओर बढ़ रही है। राष्ट्रहित के इस पुनीत कार्य में सरकार की अप्रत्याशित प्रगति प्रशंसनीय है।

Tags: पूर्वोत्तर राज्यमोदी सरकार
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