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“रामलीला में कांटा लगा” और जगराते में रीमिक्स भजन- ऐसी अश्लीलता को रोकना होगा

सनातनियों को समझना होगा कि फूहड़ता हमारी संस्कृति नहीं है।

Prashant Srivastava द्वारा Prashant Srivastava
6 October 2022
in चर्चित, मत
kaanta laga ramleela
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रामलीला से तो आप भलीभांति परिचित होंगे, पूरे भारत विशेषकर उत्तर भारत में रामलीला का मंचन इतना लोकप्रिय है कि आज भी शारदीय नवरात्रि के समय शहरी एवं ग्रामीण दोनों परिवेश में इसका बड़े ही धूमधाम से मंचन किया जाता है। पहले जब रामलीला का आयोजन होता था तो फिल्मी गानों पर लड़कियों द्वारा नृत्य नहीं करवाया जाता था, किंतु समय के साथ-साथ फूहड़ गानों पर लड़कियों से नृत्य करवाने का प्रचलन शुरू हुआ। अब जब तक यह रामलीला के शुरुआत या अंत के समय तक होता था तब तक तो अधिक आपत्ति नहीं थी किंतु अब तो यह फूहड़ता रामलीला के बीच में भी होने लगी है। सोचिए कि मंच पर राम और सीता जी का मंचन करने वाले कलाकार उनके चरित्र को निभाते हैं और फिर उन्हीं के सामने फूहड़ता भरा नृत्य होता है। ऐसा कृत्य कर हम उनके धीरोदात्तचरित्र का उपहास स्वयं ही उड़ा रहे हैं। इस प्रकार की घटनाएं पहले कम ही देखने को मिलती थी किंतु अब यह फूहड़ता समय के साथ बढ़ती ही जा रही है।

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रामलीला का मंचन

अभी हाल ही की घटना यूपी के संभल जिले की है जहां मंच पर श्रीराम का दरबार सजा था, सारे महापुरुष मंच पर बैठे हुए थे और उन्हीं के सामने कांटा लगा गाने पर एक लड़की फूहड़ कपड़े पहने अश्लील नृत्य कर रही थी। साथ ही जो लोग दर्शक दीर्घा में थे वो भी इसका आनंद लेने से नहीं चूक रहे थे।

https://twitter.com/sachingupta787/status/1576945221446692864?s=20&t=QHY935itJwwlyRVgfZzmJA

यह किसी एक जगह की बात नहीं है। इस प्रकार बीच रामलीला में नृत्य के आयोजन का प्रचलन लगभग लगभग पूरे भारत विशेषकर यूपी बिहार में बढ़ रहा है। यूपी, जहां राम की नगरी अयोध्या स्थित हैं उसी प्रदेश में इस प्रकार के कृत्य राम समेत पूरी रामलीला की मर्यादा को भंग करने के कार्य हो रहे हैं। ऐसे में हम सभी का यह दायित्व बनता है कि हम सब अपने संस्कृति के मर्यादा की रक्षा स्वयं करें। जहां कही भी रामलीला का मंचन हो रहा हो वहां पर इस प्रकार के फिल्मी गानों पर अश्लील नृत्य का विरोध करें, साथ ही इस प्रकार के फूहड़ आयोजन के बिना रामलीला का मंचन हो और जिन लोगों को लगता है कि फ़िल्मी गानों पर नृत्य के बिना रामलीला का मंचन नहीं हो सकता उन्हें रामलीला करने की अनुमति ही नहीं देनी चाहिए। रामलीला हिंदुओं की भक्ति की एक पवित्र विधा है इस प्रकार से इसकी पवित्रता को धूमिल करके राम का अपमान किया जाता है, और राम का अपमान मतलब सम्पूर्ण सनातन का अपमान।

कहते हैं कि रामलीला का मंचन देखने से मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है सही एवं गलत का बोध होता है। हमारी विशाल संस्कृति में रामलीला का बहुत महत्व है, इसके इसी महत्व को यूनेस्को ने भी सराहा है। रामलीला का आयोजन दशहरा के समय पूरे उत्तर भारत में किया जाता है।  इसका सबसे अधिक प्रतिनिधि अयोध्या, रामनगर, बनारस, वृंदावन, अल्मोड़ा, सतना और मधुबनी में देखने को मिलता है।

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रामलीला को विदेशों में सम्मान मिल रहा है

रामलीला राम और रावण के बीच हुए युद्ध का स्मरण कराती है और इसमें देवताओं एवं ऋषियों के मध्य संवादों की एक श्रृंखला भी शामिल है। कहते हैं रामलीला की नाटकीय शक्ति प्रत्येक दृश्य के चरमोत्कर्ष का प्रतिनिधित्व करने वाले चिह्नों के उत्तराधिकार से उपजी है। अर्थात् इसके मंचन में इतनी भव्यता होती है कि मानो प्रत्येक चरित्र जीवंत हो उठते हैं। किंतु यूनेस्को के इनटेंजिबल हेरिटेज तक में स्थान प्राप्त करने वाली रामलीला को जहां विदेशों में सम्मान मिल रहा है वहीं कुछ अपने ही भ्रष्ट सनातनी लोग इसकी मर्यादा को फूहड़ता से तार-तार करने में लगे हुए हैं। रामलीला का उपहास बॉलीवुड के फिल्मों में भी देखा जा सकता है। आपको ऐसी कई बॉलीवुड फिल्में देखने को  मिल जाएंगी जहां पर सम्पूर्ण रामलीला समेत उनके कई चरित्रों का जमकर उपहास उड़ाया गया है। इससे जमकर पैसे भी कमाए गए हैं, ऐसे प्रकरण पर भ्रमित की गयी जनता भी जमकर ठहाके लगाती है। आज जो अश्लीलता हमें रामलीला के मंचों पर दिखायी देती है उसमें बहुत बड़ी भूमिका बॉलीवुड ने भी निभाई है।

यह तो रही बात रामलीला में अश्लीलता परोसने की, एक और विधा भी है जहां गायन के माध्यम से फूहड़ता परोसी जा रही है। ध्यान देना होगा कि हिंदू धर्म में भक्ति को आत्मा से परमात्मा के मिलन का एक साधन माना गया है और भक्ति के क्रम में भजन एवं गायन का एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है। भजन के माध्यम से एक सनातनी व्यक्ति अपने ईष्ट की आराधना करता है, उसकी वंदना करता है, किंतु अब तो इसमें भी फूहड़ता वास कर गई है।

अभी नवरात्रि गयी है, इस दौरान देखा होगा आपने कि कैसे कई जगह भजन कीर्तन का आयोजन हुआ, भजन कीर्तन से वातावरण सकारात्मक होता है, चित्त प्रसन्न रहता है और प्रभु की वंदना भी हो जाती है किंतु आजकल इसमें भी रीमिक्स और फिल्मी गानों की धुन पीछा नहीं छोड़ रही है। एक समय हुआ करता था जब जगराते में मां शेरावालिए तेरा शेर आ गया, कुमार वीशु के भजन के माध्यम से शिववंदना इत्यादि भजन सुनने को मिलते थे, जिनके सुर,ताल,धुन सब नई होती थी। वह भगवान की वंदना के लिए ही लिखे और गाए जाते थे। किंतु अब उनका स्थान ऐसे भजनों ने ले लिया है जिनकी सुर ताल सब फिल्मी गानों के होते हैं।

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फिल्मी गानों की धुन पर भजन

उदाहरण के रूप में देखें तो एक बड़ा ही विख्यात भजन है “अरे द्वारपालों कन्हैया से कह दो” इसकी धुन भी फिल्मी गाने ये माना मेरी जां मोहब्बत सजा है से लिया गया है। कुछ लोग अधिक से अधिक धन कमाने की चाह रखते हुए बॉलीवुड गीतों के धुन से ही भजन बना देते हैं। ऐसे में उस बॉलीवुड गीत की फूहड़ता से भजन भी दूषित प्रतीत होता है।। कुछ भजन तो सीधे-सीधे फिल्मी गानो से लिए गए हैं जैसे मेला लगा- कांटा लगा से, मैय्या मैय्या रे- दैय्या दैय्या रे से।

यह पूरा प्रकरण इतने तक ही सीमित नहीं है ऐसे धार्मिक आयोजनों पर भजन हटाओ सीधे-सीधे फिल्मी गानों को ही बजाया जाता है, अर्थात आस्था के साथ इस प्रकार खिलवाड़ किया जाता है कि जैसे बर्थ डे सेलिब्रेशन हो रहा हो। हाल ही में जो नवरात्रि के पर्व संपन्न हुआ है इस दौरान आप पंडालों में गए होंगे जहां आपने अवश्य ही फिल्मी गाने जैसे तेरी झलक अशर्फ़ी इत्यादि सुने ही होंगे।

अब इन सबका समग्र परिणाम यह हो रहा है कि इन पर्वों का आयोजन ही अपने मूल कारणों से पृथक होता जा रहा है। इन पर्वों का आयोजन मानवों में सद्भावना, बंधुत्व, एक चरित्रवान समाज की स्थापना के साथ-साथ ईश्वर की भक्ति में स्वयं को लीन कर लेने के उद्देश्य से किया जाता है। कुछ समय के लिए मानव अपने सारे दुखों को भूलकर भगवान की शरण में स्वयं को समर्पित कर देता है और तब उसे आनंद की अनुभूति होती है, किंतु वर्तमान परिदृश्य में भक्ति एवं भजन का स्वरूप जिस प्रकार से बदल रहा है उससे मनुष्य उन लक्ष्यों की प्राप्ति तो कदापि नहीं कर सकता है जो इन त्योहारों के मूल में है।

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