भोजपुरी या लोक-गीतों में रुचि रखने वालों के लिए इसके कारणों का अनुमान लगाना भी कोई कठिन नहीं। शारदा सिन्हा स्वयं भी बताती हैं कि गीत भी स्तरीय नहीं थे और कुछ निर्माता कंपनियों के ताम-झाम ऐसे रहे कि दस वर्षों की दूरी हो गई।
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सुपवो न मिले माई… छठी मैया के श्रीचरणों में विलीन हुईं उनकी प्यारी बेटी, लोकगायिका शारदा सिन्हा का निधन

चले जाइए बिहार में, चले जाइए वहाँ जहाँ-जहाँ छठ महापर्व हो रहा हो - “सुपवो न मिले माई…” या “पहिले-पहिल छठी मैया…” - आपको महिलाएँ इन गीतों को गुनगुनाती हुई दिख जाएँगी।

TFI Desk द्वारा TFI Desk
5 November 2024
in Uncategorized
लोकगायिका शारदा सिन्हा, छठ

लोकगायिका शारदा सिन्हा का निधन, छठ पर घर-घर में गूँजती है उनकी आवाज़

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छठी मैया की बेटी, छठी मैया के चरणों में हमेशा के लिए लीन हो गई! दुखवा मिटाईं छठी मईया… जब तक छठ महापर्व जीवित रहेगा, जब तक बिहार की संस्कृति जीवित रहेगी, और जब तक लोग अपनी जड़ों से ज़रा सा भी जुड़े रहेंगे – तब तक शारदा सिन्हा की सुरीली आवाज़ हर घर में गूँजती रहेगी। आखिर वही तो हैं, जिनकी आवाज़ बिहार में ‘जंगलराज’ और पलायन के दौर में भी बाहर रह रहे मजदूरों को भी लगातार अपने मूल का एहसास कराती रही, उनकी मिट्टी की याद दिलाती रही।

लोकगायिका शारदा सिन्हा का निधन

उन्होंने अश्लीलता के दौर में भोजपुरी-मगही-मैथिलि में गायन की शुचिता बनाए रखी, उन्होंने बॉलीवुड में भी गाया लेकिन संगीत की प्रतिष्ठा पर आँच नहीं आने दिया। चाहे वो 1989 में ‘मैंने प्यार किया’ का ‘कहे तोसे सजना’ हो या फिर ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर 2’ का ‘तार बिजली से पतले हमारे पिया’, आखिर कौन सा ऐसा मंच था जहाँ उन्होंने अपनी अमिट छाप नहीं छोड़ी। चले जाइए बिहार में, चले जाइए वहाँ जहाँ-जहाँ छठ महापर्व हो रहा हो – “सुपवो न मिले माई…” या “पहिले-पहिल छठी मैया…” – आपको महिलाएँ इन गीतों को गुनगुनाती हुई दिख जाएँगी।

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दुखवा मिटाईं छठी मईया… बिहार के प्रवासियों को संस्कृति से जोड़ती रही शारदा सिन्हा की आवाज़

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यही शारदा सिन्हा को श्रद्धांजलि है, यही उनके जीवन के अस्तित्व की सफलता और यही भारत की देहाती संस्कृति। तब के सहरसा और अब के सुपौल कहलाने वाले जिले में 1952 में जन्मी शारदा सिन्हा ने गायन की शुरुआत मैथिली गीतों से ही की थी। फिर उन्होंने बिहार की हर लोकभाषा में गीत गाए। शारदा सिन्हा को TFI परिवार एवं संपूर्ण भारत राष्ट्र की तरफ से श्रद्धांजलि, सनातन धर्म की अनंतकालीन यात्रा में आपका योगदान चिरस्मरणीय रहेगा। अब उनका 72 वर्ष की आयु में मंगलवार (5 नवंबर, 2024) को निधन हो गया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके निधन पर दुःख जताते हुए कहा, “सुप्रसिद्ध लोक गायिका शारदा सिन्हा जी के निधन से अत्यंत दुख हुआ है। उनके गाए मैथिली और भोजपुरी के लोकगीत पिछले कई दशकों से बेहद लोकप्रिय रहे हैं। आस्था के महापर्व छठ से जुड़े उनके सुमधुर गीतों की गूँज भी सदैव बनी रहेगी। उनका जाना संगीत जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। शोक की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएँ उनके परिजनों और प्रशंसकों के साथ हैं। ॐ शांति!” बता दें कि पीएम मोदी लगातार उनके परिवार से शारदा सिन्हा के स्वास्थ्य का हालचाल ले रहे थे और उन्होंने AIIMS के निदेशक से भी इस बाबत बात की थी। शारदा सिन्हा कुछ दिनों से वेंटिलेटर पर ICU में थीं।

सुप्रसिद्ध लोक गायिका शारदा सिन्हा जी के निधन से अत्यंत दुख हुआ है। उनके गाए मैथिली और भोजपुरी के लोकगीत पिछले कई दशकों से बेहद लोकप्रिय रहे हैं। आस्था के महापर्व छठ से जुड़े उनके सुमधुर गीतों की गूंज भी सदैव बनी रहेगी। उनका जाना संगीत जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। शोक की इस… pic.twitter.com/sOaLvUOnrW

— Narendra Modi (@narendramodi) November 5, 2024

लोकगीतों के इतिहास में अमर शारदा सिन्हा का नाम

ऐसा नहीं है कि ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर 2’ के बाद के दौर में उन्होंने दूसरी किन्ही फिल्मों में गाया नहीं था। एक गुमनाम रह गई फिल्म थी “चार फुटिया छोकरे” जो कि बिहार के ही मुद्दे पर आधारित थी, उसमें शारदा सिन्हा की आवाज सुनाई दी थी। विदेशों से बिहार के गाँव में एक स्कूल खोलने आई युवती की कहानी पर आधारित ये फिल्म 2014 में आई थी। इसमें मालिनी अवस्थी के एक गीत के अलावा, भिखारी ठाकुर की एक रचना “कौन सी नगरिया” पर आधारित एक गीत को शारदा सिन्हा ने स्वर दिया था। एक और भी छोटे से गाने में उनकी आवाज थी। हाँ अगर गीतों के पूरे एल्बम की बात करें तो ये अवश्य था कि 2006 में आये उनके एल्बम के बाद दूसरा एल्बम 2016 में, दस वर्षों बाद आया था।

भोजपुरी या लोक-गीतों में रुचि रखने वालों के लिए इसके कारणों का अनुमान लगाना भी कोई कठिन नहीं। शारदा सिन्हा स्वयं भी बताती हैं कि गीत भी स्तरीय नहीं थे और कुछ निर्माता कंपनियों के ताम-झाम ऐसे रहे कि दस वर्षों की दूरी हो गई। भारत सरकार ने शारदा सिन्हा को 1991 में ही पद्म श्री दिया था और बाद में उन्हें (2018 में) पद्मभूषण भी मिला। इस पूरे नब्बे से लेकर अबतक के पैंतीस के करीब वर्षों में बिहार से जुड़ा शायद ही कोई ऐसा महोत्सव था, जहाँ शारदा सिन्हा की उपस्थिति न रही हो। प्रयाग संगीत समिति का प्रयागराज में किया हुआ संगीत उत्सव हो या दिल्ली के प्रगति मैदान का बिहार उत्सव (2009), सभी में शारदा सिन्हा ने प्रस्तुतियाँ दीं। बिहार और आसपास के इलाकों में उनकी प्रसिद्धि की एक बड़ी वजह उनका छठ के गीतों से जुड़ा होना था।

इस पूरे दौर में बिहार की स्थिति “जंगलराज” की थी, जिसके कारण फिल्म या संगीत जैसे उद्योग बिहार में पनप भी नहीं रहे थे। अब कहीं जाकर बिहार ने अपनी एक फिल्म नीति घोषित की है। हाँ, बिहार की फिल्म इंडस्ट्री को बनाने और आगे बढ़ाने के लिए इसी दौर में नीतू चंद्रा और नितिन नीरा चंद्रा जैसे कुछ लोग भी जुटे थे। मैथिली जैसी भाषाओं में उन्होंने हाल ही में पुनः फिल्में बनानी भी शुरू कर दी हैं। जो 2016 में शारदा सिन्हा का एल्बम आया था उसे भी नीतू चंद्रा, नितिन नीरा चंद्रा और अंशुमन सिन्हा (शारदा सिन्हा के पुत्र) ने ही निर्माता के रूप में सामने रखा था। इसके लिए स्वर शारदा (शारदा सिन्हा म्यूजिक फाउंडेशन), चंपारण टॉकीज और नीओ बिहार का बैनर प्रयुक्त हुआ। नितिन नीरा चंद्रा की आने वाली फिल्म “देसवा” के लिए भी शारदा सिन्हा ने स्वर दिया है।

स्रोत: शारदा सिन्हा, Sharda Sinha, निधन, Demise, मृत्यु, Death, लोकगायिका, Folk Singer, छठ, Chhath
Tags: ChhathdemiseSharda Sinhaछठनिधनशारदा सिन्हा
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