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India GDP DEBATE: जीडीपी की तेज रफ्तार या आंकड़ों का खेल? जानिए सच

सुभाष चंद्र गर्ग ने उठाए GDP ग्रोथ के आंकड़ों पर सवाल, कहा- बेस छोटा कर दिखाया गया ज्यादा विकास

Abhishek Sharma द्वारा Abhishek Sharma
2 September 2026
in अर्थव्यवस्था, चर्चित
India GDP DEBATE Q1 FY 2027
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पूर्व आर्थिक सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने सरकार की जीडीपी गणना को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनका दावा है कि अर्थव्यवस्था की विकास दर को ज्यादा चमकदार दिखाने के लिए पिछले साल के आंकड़ों में बदलाव किया गया और महंगाई तथा मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े कुछ आंकड़ों को लेकर भी तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है।

सुभाष चंद्र गर्ग ने जीडीपी आंकड़ों पर क्या सवाल उठाए?

गर्ग का पहला आरोप है कि चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही की ग्रोथ रेट को बेहतर दिखाने के लिए पिछले वित्त वर्ष 2025-26 की इसी तिमाही में अर्थव्यवस्था के आकार को 86 लाख करोड़ रुपये से घटाकर 80 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया। उनके मुताबिक, अगर पिछले साल का बेस इतना छोटा नहीं किया जाता, तो मौजूदा विकास दर करीब 2.6 प्रतिशत ही रहती।

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पूर्व वित सचिव का दूसरा आरोप था कि जब आम उपभोक्ता के लिए खुदरा महंगाई करीब 4 प्रतिशत थी और थोक महंगाई 9 प्रतिशत के पार पहुंच गई थी, तो जीडीपी की गणना में महंगाई का असर सिर्फ 2.5 प्रतिशत कैसे माना गया।

गर्ग का तीसरा सवाल मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को लेकर है। उनका कहना है कि जब कच्चे माल और तैयार उत्पादों, दोनों की कीमतों में बढ़ोतरी हुई, तो मैन्युफैक्चरिंग का डिफ्लेटर माइनस 1.5 प्रतिशत कैसे हो गया। उनके मुताबिक, इसी वजह से कागजों पर मैन्युफैक्चरिंग की ग्रोथ 7.7 प्रतिशत से बढ़कर 9.2 प्रतिशत दिखाई गई।

सरकार ने पिछले साल की जीडीपी को 86 लाख करोड़ से घटाकर 80 लाख करोड़ क्यों किया?

सरकार का कहना है कि यह कोई आंकड़ों की बाजीगरी या चालाकी नहीं है, बल्कि तराजू यानी आधार वर्ष (Base Year) बदलने की वजह से हुआ है। पहले हमारे देश की अर्थव्यवस्था को 2011-12 के पुराने तराजू से नापा जा रहा था, जिसके हिसाब से पिछले साल की पहली तिमाही 86 लाख करोड़ रुपये की थी। अब सरकार ने नया तराजू 2022-23 लागू कर दिया है, जिसमें देश में खुले नए उद्योग, आधुनिक डेटा और नए तरह के सूचकांक शामिल किए गए हैं। जब पूरे पुराने हिसाब-किताब को नए तराजू में दोबारा तोला गया, तो पिछले साल का वही आंकड़ा संशोधित होकर 80 लाख करोड़ रुपये निकला। अर्थशास्त्र का सीधा नियम है कि आप पुरानी और नई श्रृंखला की सीधी तुलना नहीं कर सकते। इस साल के 88 लाख करोड़ रुपये की तुलना पुराने 86 लाख करोड़ से नहीं, बल्कि नए वाले 80 लाख करोड़ रुपये से ही होगी।

जीडीपी का बेस ईयर (आधार वर्ष) बदलना क्यों जरूरी होता है?

अर्थव्यवस्था समय के साथ तेजी से बदलती है, लेकिन अगर पैमाना पुराना रहे तो विकास की सही तस्वीर कभी सामने नहीं आ सकती। इसे एक साधारण उदाहरण से समझें—यदि आज से 15 साल पहले की आपकी किराने की लिस्ट देखी जाए, तो उसमें शायद स्मार्टफोन का रिचार्ज, ओटीटी सब्सक्रिप्शन, इलेक्ट्रिक गाड़ियां, सोलर पैनल या ऑनलाइन डिलीवरी का खर्च शामिल नहीं था। तब लोग कीपैड फोन, डीवीडी कैसेट और एसटीडी बूथ पर खर्च करते थे। अगर सरकार आज भी 2011-12 के पुराने चश्मे से देश के कारोबार को देखेगी, तो कई नए उद्योग गिनती में ही नहीं आएंगे और जो उद्योग बंद हो चुके हैं, वे बेवजह आंकड़ों में जगह घेरे रहेंगे। इसीलिए हर कुछ सालों में बेस ईयर बदलकर अर्थव्यवस्था की मौजूदा हकीकत, लोगों के नए खर्च करने के तौर-तरीके और आज के उद्योगों को बहीखाते में शामिल करना अनिवार्य हो जाता है।

नए बेस वर्ष 2022-23 में क्या-क्या नया जोड़ा और बदला गया है?

नए बेस वर्ष में पुराने 2011-12 के मुकाबले कई बड़े सांख्यिकीय और तकनीकी सुधार किए गए हैं। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि इसमें आधुनिक उद्योगों और सेवाओं को उचित जगह दी गई है, जिसमें डिजिटल प्लेटफॉर्म, सौर ऊर्जा, सेमीकंडक्टर और आधुनिक लॉजिस्टिक्स जैसे उभरते सेक्टर शामिल हैं। इसके अलावा पुरानी प्रणाली में इस्तेमाल होने वाले थोक मूल्य सूचकांक (WPI) की जगह आधुनिक उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) और बैंकिंग सेवा मूल्य सूचकांक (BKPSI) जैसी नई श्रृंखलाओं को लागू किया गया है, जो सेवाओं और विनिर्माण की महंगाई को कहीं अधिक सटीक रूप से पकड़ते हैं।

साथ ही, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य ‘दोहरी अपस्फीति’ (Double Deflation) पद्धति को पूरी तरह अपनाया गया है, जिससे कंपनियों के तैयार माल और उनके कच्चे माल की महंगाई का अलग-अलग मूल्यांकन होता है। इस नई व्यवस्था में जीएसटी नेटवर्क, एमसीए-21 और सीधे प्रशासनिक डेटाबेस से सीधे आंकड़े जुटाए जा रहे हैं, जिससे पुराने अनुमान आधारित सर्वे की जगह वास्तविक समय का पुख्ता डेटा जीडीपी का आधार बन गया है।

जब फैक्ट्रियों में सामान महंगा हुआ तो ‘नकारात्मक महंगाई’ (-1.5%) कैसे आ गई?

इसे समझने के लिए सरकार ने ‘डबल डिफ्लेशन’ (Double Deflation) का तरीका समझाया है। आसान शब्दों में, पहले सिर्फ बनी हुई चीज की महंगाई देखी जाती थी, लेकिन अब कारखाने के तैयार माल और उसमें लगने वाले कच्चे माल दोनों की महंगाई को अलग-अलग नापा जाता है। मान लीजिए किसी फैक्ट्री में तैयार माल के दाम 10 प्रतिशत बढ़े, लेकिन उसके कच्चे माल (जैसे लोहा, कपड़ा या प्लास्टिक) के दाम 14 प्रतिशत बढ़ गए। जब लागत ज्यादा तेजी से बढ़ती है, तो गणितीय फॉर्मूले में कंपनी का वास्तविक मुनाफा और वैल्यू स्थिर कीमतों पर ज्यादा दिखने लगती है। इसी वजह से मैन्युफैक्चरिंग की नॉमिनल ग्रोथ 7.7 प्रतिशत थी, लेकिन असली (रियल) ग्रोथ 9.2 प्रतिशत दिखाई दी और दोनों के बीच का यह अंतर कागजों पर -1.5 प्रतिशत दर्ज हुआ। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि फैक्ट्रियों ने अपना सामान सस्ता कर दिया है, बल्कि यह सिर्फ कच्चे माल की बेतहाशा महंगाई का गणितीय असर है।

बाजार में महंगाई ऊंची होने के बाद भी जीडीपी की महंगाई सिर्फ 2.5 प्रतिशत कैसे रही?

बाजार में हम जो महंगाई देखते हैं और जीडीपी की जो महंगाई होती है, उन दोनों की दुनिया अलग-अलग है। खुदरा महंगाई (CPI) सिर्फ उस दाल, चावल, तेल और किराए को नापती है जो एक आम परिवार अपनी जेब से खर्च करता है। थोक महंगाई (WPI) सिर्फ थोक मंडियों के कच्चे माल को देखती है और उसमें डॉक्टरों, वकीलों या शिक्षकों जैसी सेवाएं शामिल नहीं होतीं। दूसरी तरफ जीडीपी डिफ्लेटर पूरे देश का बहीखाता है, जिसमें सरकारी पुल-सड़कें, फैक्ट्रियों की मशीनें, विदेशों में बिकने वाला सामान और बैंकिंग, आईटी व रियल एस्टेट जैसी विशाल सेवाएं सब शामिल होती हैं। इस दौरान आईटी, बैंकिंग और कई बड़ी सेवाओं की कीमतें बहुत ज्यादा नहीं बढ़ीं, जिसने थोक बाजार की महंगाई को संतुलित कर दिया और पूरे देश की मिली-जुली महंगाई सिमटकर सिर्फ 2.5 प्रतिशत रह गई।

माइनिंग के आंकड़ों में इतना अंतर क्यों दिखा?

खनन क्षेत्र में जमीन से निकलने वाले माल की असली मात्रा में -2.4 प्रतिशत की गिरावट आई, यानी कम कोयला और तेल निकला, लेकिन पैसों के मामले में यह क्षेत्र 22.3 प्रतिशत बढ़ता हुआ दिखा। इसे ऐसे समझें कि अगर एक किसान ने पिछले साल 10 बोरी गेहूं बेचा था और इस साल केवल 8 बोरी बेच पाया, लेकिन गेहूं का भाव बाजार में दोगुना हो गया, तो पैदावार घटने के बावजूद उसके पास पैसे ज्यादा आ गए। यही खदानों के साथ हुआ। औद्योगिक उत्पादन (IIP) के मुताबिक खनिजों की कुल मात्रा कम निकली, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल, गैस और धातुओं के दाम 25 से 70 प्रतिशत तक चढ़ गए, जिससे कुल बिक्री की रकम अचानक बहुत बड़ी नजर आने लगी।

क्या इस आंकड़ों के अंतर कब खत्म होगा ?

जीडीपी निकालने के दो रास्ते होते हैं—एक यह देखना कि देश में कुल कितना सामान बना (उत्पादन), और दूसरा यह कि लोगों ने कुल कितना पैसा खर्च किया (खर्च)। जब दोनों रास्तों के आंकड़ों को मिलाया जाता है, तो शुरुआती दौर में थोड़ा अंतर रह जाता है जिसे सांख्यिकी की भाषा में ‘विसंगति’ (Discrepancy) कहते हैं। पहली तिमाही का डेटा शुरुआती जानकारियों पर आधारित होता है, इसलिए यह अंतर दिखना सामान्य बात है और इसका मतलब यह नहीं कि पूरा आंकड़ा गलत है। जैसे-जैसे साल आगे बढ़ेगा और सभी कंपनियों व सरकारी विभागों की पक्की बैलेंस शीट सामने आएगी, वैसे-वैसे यह दोनों रास्ते एक-दूसरे से मिल जाएंगे और यह सांख्यिकीय अंतर लगभग खत्म हो जाएगा। और ये एक सामान्य प्रकिया है।

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