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Tata Sons को शेयर बाजार में सूचीबद्ध कराने की चर्चा के बीच Tata Trusts ने एक ऐसा प्रस्ताव रखा है, जो पूरे मामले की दिशा बदल सकता है। प्रस्ताव है कि Tata Electronics Systems Solutions (TESS) और Tata Consulting Engineers (TCE) का Tata Sons में विलय कर दिया जाए। इसका मकसद केवल दो कंपनियों को Tata Sons में मिलाना नहीं है, बल्कि Tata Sons की आय और संपत्तियों की संरचना बदलना है, ताकि कंपनी भारतीय रिजर्व बैंक यानी RBI की उस नियामकीय श्रेणी से बाहर निकल सके, जिसके कारण उसकी शेयर बाजार में सूचीबद्धता की जरूरत पैदा हुई है।
खास बात यह है कि इन दोनों कंपनियों का कारोबार भी काफी अलग और बड़ा है। एक कंपनी उस iPhone बनाने वाले कारखाने से जुड़ी है, जिसे Tata Electronics ने ताइवान की Wistron से खरीदा था। दूसरी कंपनी इंजीनियरिंग सलाह और परियोजना प्रबंधन का काम करती है और अयोध्या के राम मंदिर से लेकर मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना तक से जुड़ी रही है।
अब सवाल है कि इन दोनों कंपनियों में ऐसा क्या है, जिससे Tata Sons की शेयर बाजार में सूचीबद्धता का रास्ता बदल सकता है?
क्या है Tata Sons की लिस्टिंग का पूरा मामला
Tata Sons को आसान भाषा में समझें तो यह Tata Group की प्रमुख नियंत्रक कंपनी है। Tata Group की कई बड़ी कंपनियों में इसकी हिस्सेदारी है। इसी वजह से Tata Sons की कमाई और संपत्ति का बड़ा हिस्सा दूसरी Tata कंपनियों में किए गए निवेश से आता है।
RBI ने Tata Sons को Upper-Layer NBFC यानी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी की ऊपरी श्रेणी में रखा है। इसके साथ कुछ नियामकीय शर्तें जुड़ी हैं, जिनमें शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने की जरूरत भी शामिल है। Tata Sons इस स्थिति से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है, लेकिन RBI की ओर से पंजीकरण की स्थिति बदलने का रास्ता साफ नहीं हुआ। ऐसे में सूचीबद्धता का सवाल महत्वपूर्ण बन गया।
अब Tata Trusts ने नया रास्ता सुझाया है। उसका प्रस्ताव है कि TESS और TCE जैसी बड़ी कामकाजी कंपनियों को Tata Sons में मिला दिया जाए। Trusts का तर्क है कि इससे Tata Sons केवल दूसरी कंपनियों में पैसा लगाने वाली कंपनी नहीं रहेगी, बल्कि उसके पास अपना बड़ा परिचालन कारोबार भी होगा।
असली खेल आय और संपत्ति के आंकड़ों का है
Tata Trusts के प्रस्ताव को समझने के लिए कुछ आंकड़े महत्वपूर्ण हैं। Trusts के मुताबिक, अगर दोनों कंपनियों का विलय FY26 में हो गया होता तो Tata Sons की परिचालन आय करीब 1,05,043 करोड़ रुपये होती। यह उसकी कुल आय का लगभग 64.3 प्रतिशत होती।
दूसरी तरफ Tata Sons की कुल शुद्ध संपत्ति करीब 2,00,158 करोड़ रुपये बताई गई है। इसमें समूह की दूसरी कंपनियों में किया गया निवेश करीब 1,77,120 करोड़ रुपये है, यानी लगभग 88.5 प्रतिशत।
यहां 90 प्रतिशत का आंकड़ा अहम है। केंद्रीय बैंक के नियमों के तहत Core Investment Company यानी CIC की पहचान में समूह की कंपनियों में निवेश का अनुपात महत्वपूर्ण होता है। Tata Trusts का कहना है कि प्रस्तावित विलय के बाद यह अनुपात 90 प्रतिशत से नीचे रहेगा। इससे Tata Sons की मौजूदा नियामकीय स्थिति बदल सकती है।
सीधी भाषा में कहें तो Tata Sons की पहचान को एक ऐसी कंपनी के रूप में बदलने की कोशिश है, जिसका काम सिर्फ Tata Group की कंपनियों में निवेश करना नहीं, बल्कि खुद भी बड़े पैमाने पर कारोबार करना हो। हालांकि यह अभी केवल प्रस्ताव है। इसे पहले Tata Sons के निदेशक मंडल की मंजूरी और उसके बाद RBI की मंजूरी की जरूरत होगी।
TESS: वही iPhone कारखाना जिसने Tata को Apple की आपूर्ति श्रृंखला में पहुंचाया
इस योजना में सबसे बड़ी भूमिका Tata Electronics Systems Solutions यानी TESS की दिखाई देती है। इसका संबंध कर्नाटक के नरसापुरा स्थित उस कारखाने से है, जहां iPhone की असेंबली होती है।
यह कारखाना पहले ताइवान की कंपनी Wistron के पास था। दिसंबर 2020 में मजदूरी के भुगतान को लेकर कर्मचारियों और कंपनी के बीच विवाद हुआ था। इसके बाद कारखाने में तोड़फोड़ हुई और उत्पादन प्रभावित हुआ। Apple ने भी मामले की जांच की और अपने आपूर्तिकर्ता नियमों के उल्लंघन की बात सामने आई थी।
Wistron ने बाद में भारत में कम मुनाफे वाले iPhone असेंबली कारोबार से निकलने का फैसला किया। इसके बाद Tata Electronics ने 2023 में Wistron की भारतीय इकाई को खरीद लिया। सौदे की कीमत करीब 12.5 से 13 करोड़ डॉलर बताई गई थी।
यानी एक समय विवादों में रहा वही कारखाना अब Tata Group की इलेक्ट्रॉनिक्स और iPhone निर्माण की महत्वाकांक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। और अब यही कारोबार Tata Sons की प्रस्तावित पुनर्गठन योजना में सबसे बड़ा योगदान देने वाला है।
TCE: राम मंदिर और बुलेट ट्रेन से जुड़ी इंजीनियरिंग कंपनी
दूसरी कंपनी है Tata Consulting Engineers यानी TCE। इसका काम सीधे इमारतें या रेल लाइन बनाना नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग सलाह, डिजाइन की समीक्षा और परियोजना प्रबंधन जैसी सेवाएं देना है।
अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर परियोजना में TCE को डिजाइन की समीक्षा, इंजीनियरिंग और परियोजना प्रबंधन सलाहकार की भूमिका मिली थी। यानी राम मंदिर के निर्माण से उसका जुड़ाव निर्माण ठेकेदार के रूप में नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग सलाहकार के रूप में था।
इसी तरह TCE का नाम मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल परियोजना, यानी बुलेट ट्रेन परियोजना से भी जुड़ा है। कंपनी ने इस परियोजना में परियोजना प्रबंधन और विस्तृत डिजाइन से जुड़े सलाहकारी काम किए हैं।
यानी TCE Tata Group के उस हिस्से का प्रतिनिधित्व करती है जो बड़े बुनियादी ढांचे और इंजीनियरिंग परियोजनाओं से जुड़ा है।
Tata Trusts को आखिर यही दो कंपनियां क्यों चाहिए?
यही इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। Tata Sons की मौजूदा स्थिति में उसकी संपत्ति का बहुत बड़ा हिस्सा दूसरी Tata कंपनियों में हिस्सेदारी के रूप में है। अगर TESS और TCE जैसी बड़ी परिचालन कंपनियां Tata Sons में आ जाती हैं तो उसकी अपनी आय और कारोबारी गतिविधियों का आकार काफी बढ़ जाएगा।
Tata Trusts का हिसाब है कि इससे Tata Sons की परिचालन आय कुल आय का बड़ा हिस्सा बन जाएगी, जबकि दूसरी Tata कंपनियों में निवेश का अनुपात 90 प्रतिशत की सीमा से नीचे रहेगा।
यानी प्रस्ताव का मूल उद्देश्य यह है कि Tata Sons की वित्तीय संरचना ऐसी हो जाए कि वह केवल एक निवेश रखने वाली कंपनी न दिखे और उसकी नियामकीय श्रेणी बदल सके।
क्या इससे Tata Sons की लिस्टिंग रुक जाएगी?
अभी इसका जवाब पक्का हां नहीं है। Tata Trusts ने रास्ता जरूर सुझाया है, लेकिन प्रस्ताव को कई चरणों से गुजरना होगा। पहले Tata Sons के निदेशक मंडल की मंजूरी जरूरी है। उसके बाद RBI की मंजूरी और नियामकीय जांच होगी। अंतिम फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि RBI प्रस्तावित नई संरचना को किस तरह देखता है।
इसलिए इसे लिस्टिंग रोकने का तय रास्ता कहना अभी सही नहीं होगा। फिलहाल यह Tata Trusts की ओर से लिस्टिंग की जरूरत को खत्म करने के लिए पेश किया गया पुनर्गठन प्रस्ताव है। अगर यह प्रस्ताव Tata Sons के निदेशक मंडल और RBI की मंजूरी हासिल कर लेता है और नई संरचना नियामकीय कसौटियों पर खरी उतरती है, तो Tata Sons की सूचीबद्धता का सवाल पूरी तरह नए सिरे से खड़ा होगा।






























