ऑरोविले के अन्नपूर्णा फार्म को लेकर चल रहा विवाद अब नए चरण में पहुंच गया है। फार्म से जुड़े निवासियों ने ऑरोविले फाउंडेशन की ओर से जारी अंतिम स्थानांतरण नोटिस को चुनौती दी है। दोनों पक्षों की ओर से जमीन खाली करने की समयसीमा, वैकल्पिक जगह और जमीन के भविष्य में इस्तेमाल को लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं।
अन्नपूर्णा फार्म के समर्थकों का कहना है कि उन्हें अचानक हटाया जा रहा है। वहीं, ऑरोविले फाउंडेशन का कहना है कि यह फैसला अचानक नहीं लिया गया, बल्कि एक साल से ज्यादा समय तक बातचीत और वैकल्पिक व्यवस्था की कोशिश के बाद यह कदम उठाया गया है।
IIT मद्रास के साथ मिलकर बनना है सस्टेनेबिलिटी कैंपस
विवाद करीब 100 एकड़ जमीन को लेकर है। इस जमीन पर IIT मद्रास के सहयोग से एक सस्टेनेबिलिटी कैंपस विकसित किया जाना है।
जुलाई 2025 में ऑरोविले फाउंडेशन और IIT मद्रास के बीच इस परियोजना को लेकर समझौता हुआ था। बाद में शिक्षा मंत्रालय ने भी इसे मंजूरी दी। दिसंबर 2025 में इस जमीन के लिए 33 साल की लीज भी की गई।
10 दिन में जगह खाली करने का नोटिस
विवाद तब बढ़ा जब 5 सितंबर 2026 को अन्नपूर्णा के निवासियों को 10 दिन के भीतर स्वेच्छा से दूसरी जगह जाने का नोटिस दिया गया। आलोचकों ने इसे अचानक की गई बेदखली बताया।
हालांकि, फाउंडेशन का कहना है कि यह प्रक्रिया काफी लंबे समय से चल रही थी। रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 और 2026 के दौरान कई बैठकों और बातचीत के दौर हुए। इस दौरान निवासियों को रहने और खेती के लिए दूसरी जगह देने की कोशिश भी की गई।
अन्नपूर्णा ने पांच वैकल्पिक जगहों को बताया अनुपयुक्त
अन्नपूर्णा फार्म के प्रबंधन ने ग्रीन बेल्ट में पांच वैकल्पिक जगहों को देखा। इन जगहों का क्षेत्रफल करीब 3.5 से 11 एकड़ तक था। फार्म प्रबंधन का कहना है कि इनमें से कोई भी जगह खेती और मौजूदा काम को जारी रखने के लिए पर्याप्त नहीं है।
फार्म के मुताबिक, उसकी गतिविधियों को आर्थिक और कृषि रूप से जारी रखने के लिए कम से कम 50 एकड़ की एक साथ जुड़ी हुई जमीन जरूरी है। वहीं, फाउंडेशन का कहना है कि ऑरोविले की मौजूदा जमीन में इतनी बड़ी लगातार जुड़ी जमीन उपलब्ध होना मुश्किल है।
मद्रास हाई कोर्ट के पुराने फैसले का भी जिक्र
इस मामले में कानूनी इतिहास भी महत्वपूर्ण है। अप्रैल 2026 में मद्रास हाई कोर्ट ने अन्नपूर्णा फार्म से जुड़ी निवासी माधुरी तीर्थराम कदम की याचिका खारिज कर दी थी।
कोर्ट ने कहा था कि जमीन ऑरोविले फाउंडेशन की है और फार्म का वहां रहना अनुमति के आधार पर था। यानी केवल लंबे समय तक जमीन पर रहने से उस जमीन पर मालिकाना हक या अलग कानूनी अधिकार हासिल नहीं होता।
कोर्ट ने फाउंडेशन के गवर्निंग बोर्ड को उसकी संपत्ति के प्रशासन और इस्तेमाल का अधिकार भी माना था।
अब फिर कोर्ट पहुंचा मामला
हालांकि, इस फैसले के बाद भी विवाद खत्म नहीं हुआ। 15 सितंबर को अन्नपूर्णा फार्म ने वानूर जिला मुंसिफ कोर्ट में सिविल केस दायर किया। इसमें फार्म ने उसे जमीन से हटाने के खिलाफ स्थायी रोक लगाने की मांग की है।
इससे अब विवाद का मुख्य सवाल यह बन गया है कि फाउंडेशन को जमीन के इस्तेमाल का अधिकार है या नहीं, इसके साथ-साथ यह भी देखा जाएगा कि निवासियों को दूसरी जगह भेजने की प्रक्रिया किस तरह अपनाई जा रही है।
IIT मद्रास का प्रोजेक्ट भी विवाद के केंद्र में
IIT मद्रास के प्रस्तावित कैंपस को लेकर भी अलग-अलग राय सामने आ रही है। प्रोजेक्ट के समर्थकों का कहना है कि इसका फोकस सस्टेनेबिलिटी और पर्यावरण से जुड़ी रिसर्च पर है, जो ऑरोविले की मूल सोच से मेल खाता है।
प्रस्तावित परियोजना में रिसर्च गतिविधियों के साथ जीरो-एमिशन इलेक्ट्रिक ट्रक के टेस्ट ट्रैक जैसी सुविधाएं भी शामिल बताई जा रही हैं। इसलिए इसे सामान्य व्यावसायिक निर्माण से अलग परियोजना के रूप में देखा जा रहा है।
संसदीय समिति ने भी अन्नपूर्णा को लेकर चिंता जताई थी
इस मामले में संसद की शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल मामलों की विभाग-संबंधी स्थायी समिति की रिपोर्ट का भी जिक्र किया गया है। दिसंबर 2025 की रिपोर्ट में समिति ने IIT मद्रास के साथ हुए समझौते का स्वागत किया था।
साथ ही, समिति ने माना था कि इस परियोजना का असर अन्नपूर्णा फार्म पर पड़ेगा। समिति ने पास में वैकल्पिक जमीन तलाशने और फार्म को परेशान नहीं करने की सिफारिश की थी। यानी रिपोर्ट में सस्टेनेबिलिटी प्रोजेक्ट के साथ ऑरोविले की खाद्य सुरक्षा और खेती के महत्व को भी रेखांकित किया गया था।
जमीन के इस्तेमाल को लेकर दो अलग-अलग पक्ष
पूरे विवाद का केंद्र जमीन के इस्तेमाल का सवाल है। अन्नपूर्णा के समर्थकों का कहना है कि यह फार्म कई दशकों से खेती कर रहा है और ऑरोविले की खाद्य आत्मनिर्भरता में इसकी भूमिका रही है।
दूसरी ओर, फाउंडेशन का कहना है कि जमीन उसकी संस्थागत संपत्ति है और किसी कानूनी रूप से मंजूर परियोजना के लिए इसका इस्तेमाल बदला जा सकता है। फाउंडेशन अपने पक्ष में पहले आए कोर्ट के फैसले का भी हवाला दे रहा है।
फिलहाल यह विवाद केवल 10 दिन के नोटिस तक सीमित नहीं रह गया है। इसमें जमीन पर अधिकार, पर्यावरण, खेती, संस्थागत फैसले और ऑरोविले के भविष्य के विकास जैसे कई मुद्दे जुड़े हैं। आगे की कानूनी सुनवाई से यह स्पष्ट हो सकता है कि अन्नपूर्णा फार्म का भविष्य क्या होगा और ऑरोविले में लंबे समय से चल रही कृषि गतिविधियों और नई शिक्षा-रिसर्च परियोजनाओं के बीच किस तरह संतुलन बनाया जाएगा।






























