जम्मू-कश्मीर के पहले अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल के उद्घाटन समारोह से सामने आई एक तस्वीर ने वंदे मातरम को लेकर देश में चल रही राजनीतिक बहस को एक नया संदर्भ दे दिया है। श्रीनगर में आयोजित इस कार्यक्रम में जब तीन मिनट से अधिक समय तक वंदे मातरम का पूरा छह-छंद वाला संस्करण बजाया गया, तो जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पूरी सभा के साथ अंत तक खड़े रहे। उनके पिता और नेशनल कॉन्फ्रेंस के संरक्षक फारूक अब्दुल्ला भी पूरे समय सम्मान में खड़े दिखाई दिए।
सामान्य परिस्थितियों में यह सिर्फ किसी राष्ट्रीय गीत के प्रति सम्मान का एक दृश्य हो सकता था। लेकिन पिछले कुछ हफ्तों से वंदे मातरम के पूरे छह छंदों को लेकर जिस तरह की राजनीतिक बहस चल रही है, उसमें श्रीनगर का यह दृश्य एक बड़े सवाल के रूप में सामने आया है।
कश्मीर से आया यह संदेश इसलिए भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि वंदे मातरम के पूरे संस्करण को लेकर लंबे समय से धार्मिक और वैचारिक असहजता की बहस होती रही है। गीत के शुरुआती दो छंदों और उसके बाद के चार छंदों के बीच अंतर को लेकर ऐतिहासिक विवाद रहा है। यही कारण है कि कांग्रेस ने हाल ही में अपने कार्यक्रमों में केवल पहले दो छंद गाने के रुख का बचाव करते हुए 1937 के कांग्रेस कार्यसमिति के फैसले का हवाला दिया। लेकिन श्रीनगर में उमर और फारूक अब्दुल्ला का पूरा छह-छंद वाला संस्करण बजने के दौरान खड़ा रहना अब उस बहस को एक नई दिशा दे रहा है।
कश्मीर से आया संदेश और राष्ट्रीय राजनीति
जम्मू-कश्मीर की राजनीति लंबे समय तक राष्ट्रीय पहचान, स्वायत्तता और मुख्यधारा से जुड़ाव के सवालों के केंद्र में रही है। अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद भी यह राजनीतिक बहस लगातार अलग-अलग रूपों में मौजूद रही है। ऐसे में कश्मीर के दो प्रमुख नेताओं का वंदे मातरम के विस्तृत संस्करण के दौरान बिना किसी सार्वजनिक असहजता के पूरी गरिमा के साथ खड़ा रहना राजनीतिक रूप से स्वाभाविक तौर पर चर्चा का विषय बन गया है।
इसका अर्थ यह नहीं कि उमर या फारूक अब्दुल्ला ने वंदे मातरम के सभी छंदों को अनिवार्य रूप से गाने की वकालत की है। लेकिन समारोह में उनके आचरण ने यह जरूर दिखाया कि किसी राष्ट्रीय प्रतीक के प्रति सम्मान और उसके गायन को लेकर राजनीतिक या धार्मिक बहस दो अलग-अलग मुद्दे हो सकते हैं। यहीं से कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन के भीतर मौजूद अलग-अलग रुख की चर्चा शुरू होती है।
नेशनल कॉन्फ्रेंस विपक्षी गठबंधन INDIA का हिस्सा है। उसी व्यापक विपक्षी राजनीतिक खेमे में कांग्रेस भी है। लेकिन वंदे मातरम के पूरे संस्करण पर कांग्रेस का रुख हाल के दिनों में बिल्कुल स्पष्ट और अलग रहा है।
15 अगस्त से शुरू हुई कांग्रेस की मुश्किल
स्वतंत्रता दिवस पर दिल्ली स्थित AICC मुख्यालय में वंदे मातरम के गायन को लेकर जो दृश्य सामने आया, उसने कांग्रेस को रक्षात्मक स्थिति में ला दिया। 15 अगस्त के कार्यक्रम से जुड़े वीडियो और उसके बाद उठे राजनीतिक विवाद में कांग्रेस नेतृत्व के रुख को लेकर सवाल उठे और बीजेपी ने इसे राष्ट्रीय गीत के प्रति अनादर का मामला बताते हुए पार्टी पर हमला बोला।
बाद में कांग्रेस की ओर से यह तर्क दिया गया कि कार्यक्रम में समन्वय और संचार की कमी के कारण यह स्थिति पैदा हुई। पार्टी की ओर से कहा गया कि वरिष्ठ नेताओं को कार्यक्रम में वंदे मातरम के पूरे संस्करण के गायन की जानकारी स्पष्ट रूप से नहीं दी गई थी।
लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। इसके बाद कांग्रेस के भीतर भी इस मुद्दे को लेकर बहस और असहजता सामने आई। पार्टी के रुख और इसके राजनीतिक असर पर कांग्रेस के भीतर उठे सवालों ने इस विवाद को और बड़ा बना दिया।
आखिर पहले दो छंद और बाकी चार में विवाद क्या है?
वंदे मातरम की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी और यह स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रवादी चेतना का एक बड़ा प्रतीक बना। लेकिन गीत के बाद के छंदों में भारत माता को दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे देवी स्वरूपों से जोड़ने वाली अभिव्यक्तियां हैं।
कुछ मुस्लिम विद्वानों और संगठनों ने ऐतिहासिक रूप से इन छंदों पर धार्मिक आपत्ति जताई है। उनका तर्क रहा है कि एकेश्वरवाद में किसी देवी-देवता के रूप में राष्ट्र की स्तुति या आराधना स्वीकार्य नहीं हो सकती। यही वह ऐतिहासिक संदर्भ है जिसके आधार पर 1937 में कांग्रेस ने सार्वजनिक आयोजनों में वंदे मातरम के गायन को शुरुआती दो छंदों तक सीमित करने का फैसला किया था।
कांग्रेस आज भी उसी ऐतिहासिक फैसले को अपने वर्तमान रुख का आधार बता रही है। पार्टी का कहना है कि केवल दो छंद गाने का निर्णय नया नहीं है और इसे उस दौर की राजनीतिक और धार्मिक परिस्थितियों से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
लेकिन बीजेपी इस फैसले को अलग नजरिए से देखती है। उसके नेताओं ने कांग्रेस पर तुष्टीकरण की राजनीति करने और राष्ट्रीय गीत के साथ समझौता करने का आरोप लगाया है।
केरल ने बहस को और पेचीदा क्यों बनाया?
वंदे मातरम विवाद में केरल का राजनीतिक संदर्भ भी अहम हो गया। केरल में स्वतंत्रता दिवस समारोहों और वंदे मातरम के गायन को लेकर पैदा हुआ विवाद राष्ट्रीय राजनीति में भी चर्चा का विषय बना। कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF के भीतर इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग यानी IUML एक प्रमुख सहयोगी है। बीजेपी और कांग्रेस के विरोधियों ने आरोप लगाया कि पूरे वंदे मातरम को लेकर कांग्रेस का रुख उसके गठबंधन और वोट बैंक की राजनीति से प्रभावित है।
हालांकि कांग्रेस और उसके नेता इसे स्वीकार नहीं करते। उनका तर्क है कि यह फैसला तुष्टीकरण नहीं बल्कि ऐतिहासिक परंपरा और धार्मिक संवेदनशीलता से जुड़ा है। उनके अनुसार, किसी व्यक्ति को देशभक्त साबित करने के लिए यह तय करना कि वह वंदे मातरम के कितने छंद गाता है, अपने आप में गलत राजनीतिक कसौटी है।
श्रीनगर की तस्वीर के बाद सवाल और बड़ा क्यों हो गया?
यहीं उमर और फारूक अब्दुल्ला की वह तस्वीर पूरी बहस में एक नया राजनीतिक कोण जोड़ती है। अगर मुस्लिम बहुल जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री और वहां की राजनीति के सबसे बड़े चेहरों में शामिल फारूक अब्दुल्ला पूरे छह-छंद वाले वंदे मातरम के दौरान सम्मान में खड़े रह सकते हैं, तो फिर दूसरे राज्यों में इस मुद्दे को लेकर इतनी राजनीतिक असहजता क्यों है?
यह सवाल अब सीधे कांग्रेस की ओर बढ़ाया जा रहा है। खासकर इसलिए क्योंकि कांग्रेस एक तरफ अपने पार्टी कार्यक्रमों में केवल दो छंद गाने के ऐतिहासिक रुख पर कायम है, जबकि उसके नेतृत्व वाले या सहयोगी राजनीतिक ढांचे के अलग-अलग हिस्सों में इस मुद्दे पर अलग तस्वीर दिखाई देती रही है।































