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“जो पाया उसमें खो न जाएँ, जो खोया उसका ध्यान करें”- स्वाधीनता दिवस और अखंड भारत का लक्ष्य:

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई की स्वतंत्रता दिवस पर एक कविता है- 'आजादी अभी अधूरी है', जिसमें वो अखंड भारत के बिना आजादी को अधूरी मानते हैं, लेकिन विभाजनकारी शक्तियों के रहते ये लक्ष्य कैसे पूर्ण होगा?

Dr Alok Kumar Dwivedi द्वारा Dr Alok Kumar Dwivedi
15 August 2025
in चर्चित, मत, संस्कृति
“जो पाया उसमें खो न जाएँ, जो खोया उसका ध्यान करें”- स्वाधीनता दिवस और अखंड भारत का लक्ष्य:
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एक राष्ट्र के रूप में भारत सदैव से ही जीवंत रहा है। अपनी मूल्य संस्कृति, ज्ञान – विज्ञान और वैचारिक स्पष्टता के कारण प्राचीन काल से भारतीय जनमानस ने विश्व को आलोकित किया। मूल्य शिक्षा के अनेकों लिखित प्रमाण मिलते हैं जिसके आधार पर भारत का राष्ट्रीय चरित्र उजागर हुआ। कालखंड में भौगोलिक भूमि के प्रसार की मानसिकता ने विश्व के अनेकों देशों की जीवंत संस्कृतियों को या तो नष्ट कर दिया या उनपर अधिकार कर अपने आधिपत्य को स्थापित करने का प्रयास किया। इस मानसिकता का के आगोश में भारत भी आया और अनेकों आक्रमणों और आधिपत्यों को झेलते हुये, उनसे संघर्ष करते हुये, सांस्कृतिक और सामाजिक आक्रमणों को सहते हुये स्वयं को संरक्षित रखने का प्रयास करता रहा। परंतु भारत पर जब एक ऐसे आधिपत्य का प्रयास किया गया जिसका एकमात्र उद्देश्य सुदूर स्थित शक्ति के माध्यम से भारत पर शासन कर यहाँ आर्थिक दोहन, सामाजिक ताने – बाने को तोड़कर आपसी संघर्ष को बढ़ाना, सांस्कृतिक वैभव की मानसिकता को गुलामी की मानसिकता में बदलना इत्यादि था तो भारत ने इस प्रकार के शासन तंत्र से स्वयं को मुक्त कर अपने देश को अपने लोगों और व्यवस्थाओं के आधार पर चलाने का संकल्प लिया। भारत के आत्मबल को तोड़ने का हर स्टार पर प्रयास औपनिवेशिक शक्तियों द्वारा किया गया। रेजिनाल्ड डायर (Reginald Dyer), जिन्होंने 1921 में “The Pearl to the Empire” नामक लेख लिखा था। इसमें उन्होंने लिखा, “India will not be desirous or capable of self-government for generations… Self-government for India is a horrible pretense”. फिर भी भारत अपने आत्मबल से डिगा नहीं। अनेकों यतनाओं और बलिदानों के पश्चात एक ऐसा दिन आया जब बाह्य औपनिवेशिक शक्तियों ने भारत भूमि को छोड़ने का फैसला किया। 15 अगस्त 1947 के दिन भारत शासन के स्तर पर पूरी तरह से बाह्य हस्तक्षेप से मुक्त हो गया। इस अवसर पर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी ने अपनी कविता अरुणोदय में लिखा –

नई ज्योति से भीग रहा उदयाचल का आकाश,

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जय हो, आँखों के आगे यह सिमट रहा खग्रास।

है फूट रही लालिमा, तिमिर की टूट रही घन कारा है,

जय हो, कि स्वर्ग से छूट रही आशिष की ज्योतिधारा है।………

भगवान साथ हों, आज हिमालय अपनी ध्वजा उठाता है,

दुनिया की महफ़िल में भारत स्वाधीन बैठने जाता है।

आशिष दो वनदेवियो! बनी गंगा के मुख की लाज रहे,

माता के सिर पर सदा बना आज़ादी का यह ताज रहे।

आज़ादी का यह ताज बड़े तप से भारत ने पाया है,

मत पूछो, इसके लिए देश ने क्या कुछ नहीं गँवाया है।

जब तोप सामने खड़ी हुई, वक्षस्थल हमने खोल दिया,

आई जो नियति तुला लेकर, हमने निज मस्तक तोल दिया।…………

सम्मुख असंख्य बाधाएँ हैं, गरदन मरोड़ते बढ़े चलो,

अरुणोदय है, यह उदय नहीं, चट्टान फोड़ते बढ़े चलो।

सारा देश स्वतन्त्रता के नव अंकुरों को सहेजने को लेकर आशान्वित था, सबके भीतर की उल्लासित भावना उद्गार लेकर अश्रुविंदु के रूप में फूट पड़ें मानो बेमौसम ही सावन ने शिव के अभिषेक की उत्कट उत्कंठा पाल ली हो। भारत अब इस विमर्श में मग्न था कि इसका पुरातन वैभव पाकर भारत के आने वाली पीढ़ियाँ अपने गुजरे समय से सीखते हुये आगे संपोष्य भाव में सजोती जाएंगी। उन्हें आभास होगा कि भारत को भूमि का टुकड़ा मात्र नहीं अपितु जीता जागता प्राण पुरुष है। यह विश्व को वंधुत्व, मित्रा और परिवार कि दृष्टि से देखता है। अटल विहारी वजपायी जी की अमर कविता हिन्दू तन मन हिन्दू जीवन के अंश में भी यह उद्गार दिखते हैं –

मैं तेज पुंज, तमलीन जगत में फैलाया मैंने प्रकाश,
जगती का रच करके विनाश, कब चाहा है निज का विकास?
शरणागत की रक्षा की है, मैंने अपना जीवन दे कर,
विश्वास नहीं यदि आता तो साक्षी है यह इतिहास अमर॥ ……..

होकर स्वतंत्र मैंने कब चाहा है कर लूं जग को गुलाम?
मैंने तो सदा सिखाया करना अपने मन को गुलाम,
गोपाल–राम के नामों पर कब मैंने अत्याचार किए?
कब दुनिया को हिन्दू करने घर–घर में नरसंहार किए?
कब बतलाए काबुल में जा कर कितनी मस्जिद तोड़ीं?
भूभाग नहीं, शत–शत मानव के हृदय जीतने का निश्चय,
हिन्दू तन–मन, हिन्दू जीवन, रग–रग हिन्दू मेरा परिचय।।………

इन सबके बावजूद भारत ने जिस सुनहरे स्वप्न को 15 अगस्त 1947 को देखा था, जिस स्वतन्त्रता की कली को सुवासित पुष्प बनना था, वह अभी तक पूर्णरूपेण खिल नहीं सकी। जिस स्व तंत्र को स्थापित करने का स्वप्न हमारे स्वतन्त्रता सेनानियों ने अपने प्राणों को न्योछावर कर सोच था वह पूर्णरूपेण फलीभूत नहीं हो सका। भारत अभी भी अपने स्व और तंत्र को स्थापित करने को लेकर संघर्षरत है और बाधाओं के पाश से खुद को उन्मुक्त करने का प्रयास कर रहा है। हमने राजनीतिक स्वतन्त्रता तो पा ली पर अभी भी सामाजिक और मानसिक स्तर पर अपने तंत्र को विकसित करने और उसके आधार पर आगे बढ्ने की आवश्यकता है, बिना इसके स्वतन्त्रता अधूरी है। हमने स्वराज पाया है, पर सुराज (अच्छा शासन) और पूर्ण आत्मनिर्भरता की यात्रा अभी जारी है। वास्तविक स्वतंत्रता तब होगी जब हर नागरिक राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और मानसिक रूप से मुक्त हो—और राष्ट्र अपनी पहचान और मूल्य प्रणाली पर गर्व कर सके। स्वतन्त्रता दिवस के दिन देशभक्ति के माहौल में इस विमर्श को प्रकाश में लाने की आवश्यकता है जो हमारे अमर बलिदानियों को सच्ची श्रद्धांजलि भी होगी। अब जब भारत अपने स्वतन्त्रता के 100 वर्ष पूर्ण करने पर विकसित भारत के लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ रहा है तो हर नागरिक का दायित्व है की वह अपने नागरिक कर्तव्यों को अपने अधिकारों पर वरीयता देते हुये राष्ट्र निर्माण में अपनी आहुति भी देता जाए। 15 अगस्त का दिन आत्ममंथन का भी दिन है कि हर्ष और उल्लास में व्यक्ति अपने अधूरे स्वप्नों को साकार करने की दिशा में आगे बढ़े जिसासे वास्तविक स्वतन्त्रता प्राप्त हो सके । अंत में अटल जी की यह कविता “आजादी अभी अधूरी है” इसी तरफ हमारा ध्यान इंगित करती है –

पन्द्रह अगस्त का दिन कहता– आज़ादी अभी अधूरी है,
सपने सच होने बाक़ी हैं, राखी की शपथ न पूरी है।
जिनकी लाशों पर पग धर कर आजादी भारत में आई,
वे अब तक हैं खानाबदोश ग़म की काली बदली छाई॥
कलकत्ते के फुटपाथों पर जो आंधी–पानी सहते हैं,
उनसे पूछो, पन्द्रह अगस्त के बारे में क्या कहते हैं।  

हिन्दू के नाते उनका दुख सुनते यदि तुम्हें लाज आती,
तो सीमा के उस पार चलो सभ्यता जहाँ कुचली जाती॥
इंसान जहाँ बेचा जाता, ईमान ख़रीदा जाता है,
इस्लाम सिसकियाँ भरता है,डालर मन में मुस्काता है॥
भूखों को गोली नंगों को हथियार पिन्हाए जाते हैं,
सूखे कण्ठों से जेहादी नारे लगवाए जाते हैं॥ 

लाहौर, कराची, ढाका पर मातम की है काली छाया,
पख़्तूनों पर, गिलगित पर है ग़मगीन ग़ुलामी का साया॥
बस इसीलिए तो कहता हूँ आज़ादी अभी अधूरी है,
कैसे उल्लास मनाऊँ मैं? थोड़े दिन की मजबूरी है॥ 

दिन दूर नहीं खंडित भारत को पुनः अखंड बनाएँगे,
गिलगित से गारो पर्वत तक आजादी पर्व मनाएँगे॥
उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से कमर कसें बलिदान करें,
जो पाया उसमें खो न जाएँ, जो खोया उसका ध्यान करें॥

Tags: 79th Independence DayAtal Bihari VajpayeePartitionअखंड भारतअटल बिहारी वाजपेयीभारत की आज़ादीस्वतंत्रता दिवस
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