अमेरिका के GPS जैसे ग्लोबल नेविगेशन सिस्टम को दुनिया भर में सेवाएं देने के लिए बड़ी संख्या में सैटेलाइट्स की जरूरत होती है। लेकिन भारत ने अपने क्षेत्र और आसपास के इलाकों के लिए एक अलग रास्ता चुना। सिर्फ सात सैटेलाइट्स के नेटवर्क के जरिए सटीक पोजिशन, नेविगेशन और टाइमिंग सेवाएं देने वाले NavIC को अब NVS-03 के सफल लॉन्च से नई ताकत मिलने की उम्मीद है।
ISRO के GSLV-F18 मिशन ने NVS-03 नेविगेशन सैटेलाइट को तय कक्षा में पहुंचाया। यह मिशन सिर्फ एक नए सैटेलाइट का लॉन्च नहीं है, बल्कि भारत के अपने नेविगेशन नेटवर्क को फिर से मजबूत करने की दिशा में अहम कदम है। खासतौर पर ऐसे समय में, जब सैन्य और रणनीतिक जरूरतों के लिए विदेशी नेविगेशन सिस्टम पर निर्भरता एक बड़ी चुनौती मानी जाती है। Pasted text
NavIC क्यों है भारत के लिए इतना महत्वपूर्ण?
आज स्मार्टफोन से लेकर विमान, जहाज, बिजली ग्रिड और संचार नेटवर्क तक—कई आधुनिक सेवाओं को बेहद सटीक समय और लोकेशन की जरूरत होती है। विदेशी नेविगेशन सिस्टम का इस्तेमाल करने में एक चिंता यह रहती है कि संकट या संघर्ष की स्थिति में सिग्नल जाम, स्पूफ या टाइमिंग में गड़बड़ी की आशंका पैदा हो सकती है।
NavIC के साथ भारत के पास अपना सॉवरेन नेविगेशन सिस्टम होगा। इसका मतलब है कि देश के महत्वपूर्ण उपकरण और नेटवर्क अपनी टाइमिंग और नेविगेशन जरूरतों के लिए भारत के नियंत्रण वाले सिस्टम पर निर्भर हो सकेंगे।
URSC के अधिकारियों के अनुसार, बिजली ग्रिड और कम्युनिकेशन नेटवर्क जैसे महत्वपूर्ण ढांचों के लिए अत्यंत सटीक समय जरूरी है। NavIC इसी जरूरत को पूरा करने में अहम भूमिका निभा सकता है। इसे ‘वन नेशन, वन टाइम’ की अवधारणा से भी जोड़ा जा रहा है, जहां देशभर में सटीक समय के समन्वय के लिए स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम का इस्तेमाल किया जा सकता है।
7 सैटेलाइट्स बनाम GPS का बड़ा नेटवर्क
पूर्व ISRO चेयरमैन जी. माधवन नायर के मुताबिक, NavIC की सबसे बड़ी खासियत इसकी क्षेत्रीय जरूरतों के हिसाब से बनाई गई व्यवस्था है। भारत और उसके आसपास के क्षेत्र को कवर करने के लिए सात सैटेलाइट्स का नेटवर्क तैयार किया गया है।
उनका कहना है कि ग्लोबल सिस्टम की तुलना में कम सैटेलाइट्स के साथ क्षेत्रीय सेवाएं देना एक अधिक किफायती मॉडल हो सकता है। नायर ने यह भी कहा कि उन्हें मिली रिपोर्टों के अनुसार NavIC से मिलने वाले सिग्नल बेहद सटीक हैं और सुरक्षा से जुड़ी जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
यही NavIC और GPS के बीच सबसे बड़ा अंतर भी है। GPS का उद्देश्य पूरी दुनिया को कवर करना है, जबकि NavIC को भारत और उसके आसपास के रणनीतिक क्षेत्र की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है। इसलिए दोनों सिस्टम की सैटेलाइट संख्या की सीधी तुलना करने के बजाय उनके अलग-अलग उद्देश्यों को समझना जरूरी है।
परमाणु घड़ी: नेविगेशन सिस्टम का सबसे अहम हिस्सा
किसी भी नेविगेशन सिस्टम की सटीकता में समय की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। NVS-03 के साथ स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक तकनीक को भी अहम उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।
ISRO अधिकारियों के मुताबिक, एटॉमिक क्लॉक नेविगेशन सिस्टम का एक तरह से दिल है और यह नैनोसेकंड स्तर की सटीक टाइमिंग उपलब्ध कराने में मदद करती है। यही सटीक समय किसी रिसीवर को अपनी स्थिति निर्धारित करने में सक्षम बनाता है। Pasted text
आगे की राह: सैटेलाइट से सीधे मोबाइल तक?
NVS-03 के बाद भारत की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षा सिर्फ नेविगेशन तक सीमित नहीं है। पूर्व ISRO चेयरमैन माधवन नायर का मानना है कि अगला बड़ा कदम अंतरिक्ष से सीधे हैंडहेल्ड डिवाइस तक कनेक्टिविटी का हो सकता है।
उन्होंने पुराने GSAT-6 मिशन की तकनीकों का जिक्र करते हुए कहा कि डिप्लॉयबल एंटीना, हाई-पावर एम्प्लीफायर और संवेदनशील रिसीवर जैसी तकनीकों का इस्तेमाल भविष्य में सीधे मोबाइल या हैंडहेल्ड डिवाइस से सैटेलाइट कनेक्टिविटी के लिए किया जा सकता है।
उनके मुताबिक, भारत के ज्यादातर हिस्से स्थलीय 5G नेटवर्क से कवर हैं। ऐसे में दूरदराज के सीमावर्ती, समुद्री और मुश्किल इलाकों में बची हुई कनेक्टिविटी की जरूरत को सैटेलाइट तकनीक से पूरा किया जा सकता है। Pasted text
बड़ी तस्वीर क्या है?
NVS-03 का सफल लॉन्च भारत के लिए सिर्फ एक अंतरिक्ष मिशन की सफलता नहीं है। यह उस कोशिश का हिस्सा है, जिसमें देश अपनी लोकेशन, नेविगेशन और टाइमिंग जरूरतों के लिए आत्मनिर्भर बनना चाहता है।
सात सैटेलाइट्स के जरिए क्षेत्रीय कवरेज, स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक और रणनीतिक उपकरणों के लिए अपने नियंत्रण वाला नेविगेशन नेटवर्क—NavIC भारत की अंतरिक्ष क्षमता को जमीन पर रोजमर्रा और राष्ट्रीय सुरक्षा, दोनों जरूरतों से जोड़ता है।
आने वाले समय में अगर यह नेटवर्क पूरी तरह मजबूत होता है और सैटेलाइट-टू-मोबाइल कनेक्टिविटी जैसी तकनीकें आगे बढ़ती हैं, तो भारत की अंतरिक्ष यात्रा का अगला चरण सिर्फ आसमान में सैटेलाइट पहुंचाने का नहीं, बल्कि देश के सबसे दूरदराज के हिस्सों तक अंतरिक्ष की पहुंच बनाने का हो सकता है।

































