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सुनिए शरद पवार! बॉलीवुड में हिंदुओं का भी योगदान रहा है, यह लीजिए हम सूची दे रहे हैं

'बॉलीवुड को मुस्लिमों ने ही बनाया', इस पर हम चुप कैसे रह जाएं!

Animesh Pandey द्वारा Animesh Pandey
20 October 2022
in प्रीमियम
बॉलीवुड शरद पवार
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इतिहास भी विचित्र है, जिसके हाथ में कलम है वही उसे रच पाता है। हमारे देश के वामपंथियों ने बड़े चाव से बताया है कि कैसे अरबी आक्रांता मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर आक्रमण किया था और कैसे 1025 में गजनवी के सुल्तान महमूद ने पहले जयपाल और आनंदपाल को पराजित किया, तत्पश्चात सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण कर उसे ध्वस्त कर दिया और भारतीयों के अभिमान को सदैव के लिए ध्वस्त कर दिया।

कुछ ऐसे ही भ्रम में जीते हैं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के अध्यक्ष शरद पवार, जिनके अनुसार यदि अल्पसंख्यक न होते तो कला, संगीत एवं चलचित्र का बंटाधार हो जाता। एक व्याख्यान में महोदय बोलते हैं, “आज के दौर में अल्पसंख्यक समुदाय के पास कला, काव्य और लेखन यानी सभी क्षेत्रों में योगदान देने की क्षमता है। बॉलीवुड में अब तक सबसे ज्यादा किन लोगों ने योगदान दिया है? मुस्लिम समुदाय ने बॉलीवुड की तरक्की के लिए सबसे ज्यादा योगदान दिया है. इसलिए हम उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते।”

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मतलब शरद पवार के अनुसार यदि बॉलीवुड आज कुछ है तो केवल मुसलमानों के कारण अन्यथा कुछ नहीं। परंतु उस व्यक्ति से और क्या आशा करें, जिसने 1993 के ब्लैक फ्राइडे ब्लास्टस में सेक्युलरिज्म के लिए एक अतिरिक्त ब्लास्ट ‘खोज निकाला’, ताकि अल्पसंख्यक समुदाय पर आंच न आए। ऐसे में तनिक बॉलीवुड के इतिहास पर भी प्रकाश डालते हैं, यदि भारतीय फिल्म उद्योग की नींव किसी ने रखी थी तो उनका नाम क्या था? स्मरण है किसी को – ढुंडीराज गोविंदराव फाल्के, जिन्हे हम सब आज दादासाहेब फाल्के के नाम से बेहतर जानते हैं। अब ये नाम किस एंगल से मुसलमान लगता है, थोडं सांगायला त्रास देईन शरद काका?

अब बात भारतीय फिल्म उद्योग के फिल्म इतिहास पर प्रारंभ की है, तो जिस बॉलीवुड में मुसलमानों के कथित योगदान पर शरद पवार इतना इतराते हैं, उसकी नींव रखने वालों में से एक थे वनकुदरे राजाराम शांताराम, अथवा वी शांताराम, जिनके प्रभात फिल्म कंपनी के फिल्म स्टूडियो के मूल भवन पर आज FTII का कैंपस विद्यमान है।

और पढ़ें- पहले द कश्मीर फाइल्स, फिर RRR और अब RSS पर फिल्म, बदल रही है भारतीय सिनेमा की स्थिति!

सूची लंबी है

ये तो मात्र प्रारंभ है, अगर निर्देशकों में ही गिना जाए तो हमें अनंत नाम ऐसे मिलेंगे, जिन्होंने देश को भव्य फिल्में दी हैं, सौभाग्यवश कोई भी मुस्लिम नहीं है। जब तक रामायण से इतिहास नहीं रचा था तो रामानंद सागर के टक्कर का फिल्ममेकर मिलना मुश्किल था। हृषिकेश मुखर्जी के साफ सुथरे पारिवारिक फिल्म हो, राज खोसला के अनोखे रोमांचकारी थ्रीलर हों, गुरु दत्त की ओजस्वी और अनोखी फिल्मांकन कला हो जो समय से कहीं आगे थी, बासु चैटर्जी की अनोखी शैली से परिपूर्ण फिल्में हो, श्रीराम राघवन की दमदार कथा हों, बिमल रॉय हो, या फिर अनिल शर्मा एवं राजकुमार संतोषी का दमदार मसाला कॉन्टेन्ट हो, आप गिनते जाइए और सूची अनंत बढ़ती जाएगी।

ये तो हुई फ़िल्मकारों की बात, अब तनिक गीतकारों की बात कर लेते हैं। अब शरद पवार क्या, कुछ नमूने शकील बदायूनी, साहिर लुधियानवी, जावेद अख्तर जैसों के गुणगान करने लगेंगे। परंतु बंधुवर, इनसे आगे भी एक संसार था। राजेन्द्र कृशन, पंडित नरेंद्र शर्मा जैसे गीतकार भी थे, जिनके गीतों से मानो अमृत धारा बहती थी। नरेंद्र शर्मा की अंतिम कृतियों में से एक तो अति चर्चित टीवी सीरीज महाभारत था, जिसके पार्श्व गीत आज भी लोकप्रिय हैं।

इसके अतिरिक्त लालजी पाण्डेय, जिन्हें अनजान के नाम से बेहतर जाना था, एवं उनके पुत्र समीर, अपने गीतों से धूम मचा देते थे। श्यामलाल बाबू राय, जिन्हें हम इंदीवर के नाम से बेहतर जानते हैं, आज भी कई गीत ऐसे छोड़ गए जिनके लिए जितना बोला जाए कम है। प्रेम धवन जैसे गीतकार भी हुए हैं, जिन्होंने एक फिल्म ‘शहीद’ से सरदार भगत सिंह को अद्वितीय श्रद्धांजलि भी दी और हरीकृष्ण गिरी गोस्वामी जिन्हें हम मनोज कुमार के नाम से बेहतर जानते हैं, इन्हें एक अद्वितीय सुपरस्टार बनाया, जो देशभक्ति से संबंधित फिल्मों के लिए चर्चित रहे हैं।

सनातनियों के योगदान

इनके अतिरिक्त आनंद बक्शी के अद्वितीय रचनाएं तो कोई भूल ही नहीं सकता है।  गोपालदास नीरज के मधुर बोल हों या फिर प्रसून जोशी का ओजस्वी वक्तव्य हो या फिर स्वानन्द किरकिरे एवं पीयूष मिश्रा के अतरंगी विचार, सनातनियों के अनंत योगदान से बॉलीवुड भरा पड़ा है। ये शरद पवार कौन होता है एक समुदाय को बॉलीवुड की सफलता का ठेका देने वाला?

अब बात संगीत की हो रही है तो ध्यान देना होगा कि यहां भी सबसे सुरीले धुन सनातनियों के उंगलियों से ही निकले हैं। ए आर रहमान तो बालक हैं, भारत में ऐसे अनेक संगीतज्ञ हैं जिन्होंने दमदार और कर्णप्रिय संगीत दिए हैं। अगर लूडो के ‘ओ बेटा जी’ को गुनगुनाए हैं तो वो सी रामचन्द्र जैसे तेजस्वी संगीतकारों की देन है। इसके अतिरिक्त सचिन देव बर्मन, सलिल चौधुरी और ओ पी नय्यर के धुन अगर नहीं गुनगुनाए, तो क्या खाक आपने पुराने समय के गीत गुनगुनाए। इनके गीत तो आपके कलेक्शन में होना मस्ट है बंधु। मदन मोहन कोहली के रचित कई गीत आज भी ऐसे हैं जो कानों में मिश्री की भांति सुनाई पड़ते हैं और फिर हम बप्पी लाहिड़ी एवं रवींद्र जैन को कैसे भूल सकते हैं भला?

अब वर्तमान संगीतकारों की बात करें तो मिठू शर्मा जैसे संगीत बहुत कम लोग दे पाते हैं,  परंतु उनके भी टक्कर के संगीतज्ञ हैं इस क्षेत्र में। अमित त्रिवेदी के संगीत की तो बात ही निराली है, तो वहीं शाश्वत सचदेव इसी श्रेणी में एक नई आशा की किरण प्रतीत होते हैं। प्रीतम यूं तो कॉपी किए गए धुनों के लिए विवादों में रहते हैं, परंतु वह भी अच्छा संगीत बना ही लेता है, और यदि बॉलीवुड के कुछ ठेकेदारों की हेकड़ी न होती, तो टॉलीवुड से अधिक सफलता एम एम कीरवाणी को बॉलीवुड में मिली होती, उनका संगीत था ही इतना सुरीला।

और पढ़ें- बॉलीवुड को बहुभाषीय सिनेमा से डर लग रहा है? ये डर अच्छा है!

कलाकार भी एक से एक हैं

अब बॉलीवुड का उल्लेख करें और इसके कलाकारों की बात न करें तो ये तो अन्याय होगा। आज भी बॉलीवुड के सबसे प्रभावशाली परिवारों की बात करें, तो वे खान और अख्तर परिवार नहीं, चोपड़ा और कपूर परिवार होंगे, जिनकी नींव बलदेव राज चोपड़ा और पृथ्वीराज कपूर जैसे लोगों ने रखी थी। पृथ्वीराज कपूर ने ही कपूर परिवार की नींव भी स्थापित की, जिनके पश्चात राज कपूर, शम्मी कपूर, शशि कपूर जैसे सितारों ने अपनी अद्भुत प्रतिभा से अपनी अलग छाप छोड़ दी।

अब बात प्रतिभा की छिड़ी ही है तो देव आनंद की भी चर्चा करनी चाहिए। इस व्यक्ति ने जो प्रभाव भारतीय सिनेमा पर छोड़ा है, उसका तोड़ न यूसुफ खान उर्फ दिलीप कुमार निकाल पाए हैं, न कोई अन्य। उनके अतिरिक्त हरीकृष्ण गिरी गोस्वामी ने भारतीय सिनेमा में तो तहलका मचा दिया था, जिन्हें आज हम मनोज कुमार के नाम से बेहतर जानते हैं। इतना ही नहीं, अमिताभ बच्चन के विचार जैसे भी हों, परंतु इस बात में कोई संदेह नहीं कि उनके जैसे अभिनेता मिलना काफी कठिन है और फिर अपने सबसे बड़े सुपरस्टार राजेश खन्ना को कैसे भूल सकते हैं? फिर शत्रुघ्न सिन्हा हों या अजय देवगन, अक्षय कुमार, कार्तिक आर्यन, विक्की कौशल जैसे एक्टर चर्चा प्रारंभ तो होगी पर समाप्त नहीं।

अभिनेत्रियों पर भी चर्चा होनी चाहिए

अब बात अभिनय की है तो अभिनेत्रियों पर भी चर्चा होनी चाहिए। जो रीति नूतन समर्थ से प्रारंभ हुई, उसे वैजयंतीमाला ने ‘झनक झनक पायल बाजे’ और ‘गंगा जमुना’ जैसी फिल्मों से आगे बढ़ाया और फिर लीला नायडू, माला सिन्हा, साधना शिवदसानी ने अपने अभिनय से एक अलग छाप छोड़ी। इन सब में एक बात समान थी। इन सबको अपने प्रतिभा के लिए धर्म का सहारा नहीं लेना पड़ा और विद्या सिन्हा हो, स्मिता पाटिल हो या फिर रति अग्निहोत्री, अभिनय का भी एक अलग पैमाना हुआ करता था। श्रीदेवी के पश्चात अभिनय के लोकप्रियता की कोई सीमा नहीं रही क्योंकि श्रीदेवी हिन्दी उद्योग में भी उतनी लोकप्रिय थी, जितनी तेलुगु, तमिल या फिर मलयालम उद्योग में।

ऐसे में शरद पवार का यह कहना की मुस्लिमों के बिना बॉलीवुड का अस्तित्व असंभव है, न केवल हास्यास्पद है अपितु खोखला और निकृष्ट है। अभी तो हमने सिखों, ईसाइयों और पारसियों के अद्वितीय योगदानों पर प्रकाश भी नहीं डाला है, अन्यथा उपन्यास लिखना पड़ता। वैसे योगदान से याद आया, किसके “हैंडपंप उखाड़ने” से आमिर खान को बॉक्स ऑफिस पर अपने “लगान” को बचाने के लाले पड़े थे?

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Tags: बॉलीवुडबॉलीवुड में हिंदूशरद पवार
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