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कैसे मृत्यु के मुख से निकलकर सैम बने “सैम बहादुर”

योद्धा ऐसे ही नहीं बनते....

Animesh Pandey द्वारा Animesh Pandey
4 April 2023
in इतिहास
कैसे मृत्यु के मुख से निकलकर सैम बने “सैम बहादुर”

Source: Google

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युद्ध अपने चरमोत्कर्ष पर था। एक सैनिक गंभीर रूप से घायल था, और ऐसा प्रतीत होता था कि उसके प्राण कभी भी निकल सकते हैं। सांस लेना भी एक दुष्कर कार्य हो गया था। अचेत अवस्था में जब सैनिक लेकर आए, तो अन्य सैनिकों का हवाला देते हुए उपस्थित सर्जन ने मना कर दिया। आवेश में आकर उसके मातहतों ने उस सर्जन को इस अफसर का उपचार न करने पर मारने की धमकी दी। थोड़ी देर बाद उस सैनिक के उपचार हेतु डॉक्टर तैयार हुआ, और जैसे ही उसे होश आने लगा, डॉक्टर ने पूछा, “तुम्हारा ये हाल कैसे हुआ?” उस सैनिक ने ऐसी अवस्था में भी कहा, “कुछ नहीं जी, बस एक खच्चर ने लतिया दिया”। ये सैनिक सैम मानेकशॉ थे।

इस लेख में जानिये कथा एक विद्रोही युवक की और कैसे वह भारत के सबसे प्रभावशाली योद्धाओं में से एक, फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ बना।

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स्वभाव से मुखर और विद्रोही

3 अप्रैल 1914 को सैम मानेकशॉ एक प्रतिष्ठित पारसी परिवार में जन्मे। उनके पूर्वज वलसाड जिले से नाता रखते थे, परंतु उनके पिता, जो पेशे से चिकित्सक थे, पंजाब के तत्कालीन राजधानी लाहौर में बेहतर व्यवसाय एवं आशाओं सहित स्थानांतरित होना चाहते थे। परंतु भाग्य ने इन्हे कुछ दिन के लिए अमृतसर में ही रोक लिया, जहां सैम का जन्म हुआ।

सैम प्रारंभ से ही मुखर स्वभाव के थे, परंतु उतने ही विद्रोही भी थे। उन्होंने इच्छा प्रकट की कि उन्हे चिकित्सक बनना है, जिसके लिए वह इंग्लैंड में पढ़ाई करना चाहते हैं। परंतु उनकी इस इच्छा को ठुकरा दिया गया, क्योंकि उनके पिता हुर्मुसजी मानेकशॉ पहले ही अपने दो पुत्रों को अभियंता बनाने की दिशा में प्रयासरत थे, और वे सैम पर अतिरिक्त धन नहीं व्यय करना चाहते।

और पढ़ें: बेनेगल नरसिंह राऊ: भारतीय संविधान के वास्तविक रचयिता

इसी बीच सैम को अमृतसर के तत्कालीन हिन्दू सभा कॉलेज [अब हिन्दू कॉलेज, अमृतसर] में प्रवेश लिया, जहां इन्होंने विज्ञान संकाय में तृतीय श्रेणी में अपना स्नातक पूर्ण किया। इसी बीच 1931 के आसपास ब्रिटिश प्रशासन ने एक सैन्य अकादेमी खोलने का प्रस्ताव दिया, जिसे तत्कालीन सैन्य अध्यक्ष, Sir Philip Chetwode का पूर्ण समर्थन प्राप्त था। यही अकादेमी बाद में जाकर इंडियन मिलिट्री अकादेमी के रूप में विश्वप्रसिद्ध हुई। जब इसका आवेदन निकला, तो सैम मानेकशॉ ने अपने पिता की मंशाओं के विपरीत इसके लिए आवेदन किया, और वे उन 15 कैडेट्स का भाग बने, जिन्हे प्रत्यक्ष कॉम्पिटिशन के अंतर्गत चयनित किया गया। सैम केवल इंडियन मिलिट्री अकादेमी की प्रथम बैच का भाग नहीं थे, वे उस बैच का भी भाग थे, जिससे एक साथ तीन सैन्य प्रमुख निकले : स्वयं सैम, स्मिथ डुन [जो बर्मा के सेनाध्यक्ष बने], और मुहम्मद मूसा खान [जो 1965 के युद्ध के समय पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष थे]।

वह किस्सा जिसने जीवन बदल दिया

लेकिन वो क्या घटना थी, जिसने सैम को एक विद्रोही युवक से एक कुशल सैन्य प्रशासक में परिवर्तित किया? कहने को ऐसे बहुत केस थे, परंतु सबसे प्रथम अनुभव इसका सैम को द्वितीय विश्व युद्ध में हुआ। उस समय ब्रिटिश इंडियन आर्मी अनेकों मोर्चों पर तैनात थी, और इन्ही में से एक था बर्मा फ्रंट।

और पढ़ें: गांधी इरविन समझौता: जब महात्मा गांधी के एक निर्णय के विरुद्ध पूरा देश हो गया

तब सैम 1942 में 12वीं फ़्रंटियर फोर्स रेजिमेंट का भाग थे, जो पगोड़ा हिल नामक क्षेत्र पर नियंत्रण प्राप्त करना चाहती थी। परंतु उस समय की जापानी सेना ने नाक में दम करके रखा था, और इसी बीच लाइट मशीन गन की एक घातक बौछार सैम मानेकशॉ के पेट पर पड़ी। कैप्टन मानेकशॉ ने ऐसी विकट स्थिति में भी ऐसा मोर्चा संभाला कि सेना ने वो पोजीशन भी संभाल ली, और 30 प्रतिशत हताहतों के बाद भी वो मिशन सफल रहा।

इस मिशन को तत्कालीन आर्मी उच्चाधिकारी, मेजर जनरल डेविड कोवन दूर से देख रहे थे। जब उन्हे सैम छटपटाते हुए मिले, तो उनसे रहा नहीं गया और उन्होंने अपना मिलिट्री क्रॉस सैम को पहना दिया, क्योंकि उनके अनुसार एक “मृत योद्धा” ऐसे सम्मान का अधिकारी नहीं। परंतु उनके मातहत उनकी बहादुरी से इतने अभिभूत हो गए थे कि उन्होंने प्रण लिया कि कुछ भी हो जाए, पर कैप्टन सैम को कुछ नहीं होगा। हुआ भी वही, जैसा कि पूर्व में बताया, काफी विवाद के बाद जब सर्जन ऑपरेशन को तैयार हुआ, तो उसने सैम से उसका हाल पूछा, और उन्होंने बताया कि उन्हे खच्चर से लात पड़ी थी। इस सेंस ऑफ ह्यूमर पर वह ऑस्ट्रेलियाई डॉक्टर भी मुस्काए बिना नहीं रह सके, और उन्होंने ऑपरेशन के लिए स्वीकृति दी।

सैम से सैम बहादुर….

सैम की आँतें, उनका लीवर और फेफड़े काफी बुरी तरह डैमेज हो चुका था।  परंतु मृत्यु के द्वार पर यह व्यक्ति बस खटखटाकर वापस लौट आए। शीघ्र ही इन्हें स्वतंत्र भारत में डायरेक्टरेट जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशन्स में कार्य करने का अवसर मिला, जहां इन्होंने जयंतो नाथ चौधुरी के नेतृत्व में इंटेलिजेंस विभाग भी संभाला और हैदराबाद एवं जूनागढ़ जैसे सैन्य ऑपरेशन्स में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

और पढ़ें: हिंदुस्तान रिपब्लिकन असोसिएशन के 100 वर्ष : अदम्य साहस एवं जीवटता का अद्भुत संगम

कई वर्ष बाद जब वे एक उच्चाधिकारी के रूप में वापस आए, तो उन्होंने अपनी पलटन का मुआयना किया। एक नायक से उन्होंने पूछा कि क्या वे अपने सैन्य कमांडर को जानते हैं, तो उसने उत्सुकता से बोला, “जी हाँ”। उन्होंने पूछा, “क्या नाम है उनका?”, जिसपे वह सैनिक उतने ही भोलेपन से बोला, “साब, उनका नाम सैम बहादुर हैं”। स्वयं सैम भी मुस्काए बिना नहीं रह पाए, और यह नाम उनके साथ सदैव के लिए जुड़ गया, जिसकी नींव वर्षों पूर्व पड़ चुकी थी।

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