हाल ही में जगन्नाथ यात्रा के दौरान भी डोनाल्ड ट्रम्प से जुड़ा पुराना किस्सा सामने आया, जिसने हिन्दुओं को लुभाया। असल में सन् 1976 में न्यूयॉर्क के मैनहटन में जब जगन्नाथ यात्रा की तैयारियों में दिक्कतें आ रही थीं तब 30 वर्षीय डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी जमीन इस्तेमाल के लिए दी थी।
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इस्लामी कट्टरपंथ, मार्क्सवाद, Wokeism… डोनाल्ड ट्रम्प को क्यों ‘अपना’ मानते हैं भारत के लोग, यूँ ही नहीं मना रहे जीत का जश्न

ये 3 बिंदु किसी के समर्थन के नहीं हैं, बल्कि विरोध के हैं। पहला, मार्क्सवाद यानी वामपंथ के खिलाफ डोनाल्ड ट्रम्प का विरोध। दूसरा, कट्टर इस्लामी आतंकवाद के खिलाफ डोनाल्ड ट्रम्प का रुख। तीसरा, Wokeism यानी अत्याधुनिक दिखने की होड़ में अपनी संस्कृति के विपरीत कार्य करना।

Anupam K Singh द्वारा Anupam K Singh
6 November 2024
in अमेरिकाज़, भू-राजनीति, विश्व
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प

भारत में रह रहा हिन्दू समाज डोनाल्ड ट्रम्प की जीत पर व्यक्तिगत ख़ुशी क्यों मना रहा है? - समझिए

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डोनाल्ड ट्रम्प की जीत के बाद भारत का शेयर मार्केट भी उछाल भर रहा है। भारतीय समाज कुछ इस तरह से जश्न मना रहा है, जैसे ये उसके लिए व्यक्तिगत जीत हो। इस दौरान कई तत्व सोशल मीडिया पर ये पूछते भी दिख रहे हैं कि डोनाल्ड ट्रम्प जीते तो अमेरिका में हैं, लेकिन भारत में लोग क्यों ख़ुशी मना रहे हैं? असल में इसका कारण है। अब तक ये साफ़ हो चुका है कि प्रेसिडेंसी, सीनेट और हाउस – इन तीनों पर कब्ज़ा होने के बाद डोनाल्ड ट्रम्प मजबूती से सत्ता चलाएँगे और हर फैसले पर उनकी ही छाप होगी।

यूँ तो डोनाल्ड ट्रम्प को ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति के लिए जाना जाता है, यानी USA से जुड़े हर वैश्विक करार में अमेरिका का अधिक से अधिक – डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिकियों को ख़ुश करने के लिए इस नीति पर चलते हुए दिखते हैं। वो अवैध प्रवासियों को देश से निकाल बाहर करने की नीति पर चलते हैं। इसके बावजूद भारत जैसे देश में लोगों का, ख़ासकर हिन्दुओं का उनकी जीत पर ख़ुश होना – इसके क्या कारण हो सकते हैं? एक कारण ये हो सकता है कि आज का भारत स्पष्टवादी नेताओं को पसंद करता है और इसीलिए यहाँ नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री हैं।

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लेकिन, जहाँ तक मेरी समझ है, मुझे 3 मुख्य बिंदु ऐसे लग रहे हैं जो डोनाल्ड ट्रम्प को भारत में रह रहे हिन्दू समाज से जोड़ते हैं। ये 3 बिंदु किसी के समर्थन के नहीं हैं, बल्कि विरोध के हैं। पहला, मार्क्सवाद यानी वामपंथ के खिलाफ डोनाल्ड ट्रम्प का रुख। दूसरा, कट्टर इस्लामी आतंकवाद के खिलाफ डोनाल्ड ट्रम्प का रुख। तीसरा, Wokeism यानी अत्याधुनिक दिखने की होड़ में अपनी संस्कृति के विपरीत कार्य करना। ये तीनों ऐसे बिंदु हैं जो भारतीय हिंदू समाज को डोनाल्ड ट्रम्प से सीधे कनेक्ट करते हैं। आइए, एक-एक कर इनकी तहों को खँगालते हैं।

कमला हैरिस को ‘कॉमरेड’ बोलते रहे हैं डोनाल्ड ट्रम्प

सबसे पहले बात करते हैं मार्क्सवाद पर। ये तो जानी हुई बात है कि भारत में हम सब मार्क्सवाद से पीड़ित रहे हैं, हम वामपंथी विचारधारा से पीड़ित समाज हैं। उन्होंने हमारी कई पीढ़ियों को कुछ इस तरह से इतिहास पढ़ाया कि हम इस्लामी आक्रांताओं का तो गुणगान करते हैं लेकिन अपने ही राजा-महाराजाओं को लेकर हीन भावना से भरे हुए हैं। उन्होंने हमें ये पढ़ाया कि हम एक असभ्य समाज थे जिन्हें कभी मध्य एशिया से, कभी अरब से तो कभी यूरोप से आक्रांताओं ने आकर रहना सिखाया। इसीलिए, भारतीय समाज मार्क्सवाद का विरोध पसंद करता है।

अगर आप डोनाल्ड ट्रम्प की रैलियों को देखेंगे तो पाएँगे कि उन्होंने लगातार कमला हैरिस को ‘कॉमरेड’ कह कर संबोधित किया है। ये एक ऐसा शब्द है जिसका इस्तेमाल बिहार के MCC का वो नक्सली भी करता था जिसने ABCD भी न पढ़ रखी हो। डोनाल्ड ट्रम्प ने तो कमला हैरिस को वामपंथी साबित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। अमेरिका का लिबरल गिरोह इसे Red-Baiting कहता है, यानी किसी को वामपंथ से जोड़ कर उसे बदनाम करना। लाल तो वामपंथियों का पसंदीदा रंग है, भारत में भी वामपंथी दलों के नेता एक-दूसरे को ‘लाल सलाम’ कह कर अभिवादन करते हैं।

भारत की जनता, ख़ासकर हिन्दू समाज इन वामपंथी दलों को भी पसंद नहीं करता। त्रिपुरा का उनका किला ढह चुका है, केरल में भाजपा का प्रभाव बढ़ रहा है। JNU में भी अब ABVP पूरा जोर लगा रही है। वामपंथ के अंतिम किले भी ढहने वाले हैं अगले कुछ वर्षों में। असल में अमेरिका और सोवियत यूनियन के बीच जब शीत युद्ध चलता था, तभी से अमेरिका ‘Red Scare’ के साये में रहा है। वहाँ वामपंथियों को लेकर विरोध का भाव रहा है। हिस्पैनिक और लैटिनो अमेरिकी समाज के कई परिवार वामपंथी देशों से पलायन कर के आए हैं, ऐसे में वामपंथ के विरोध में उनका साथ मिलता है।

इनके अलावा जो अमेरिका के बुजुर्ग लोग हैं, उन्होंने शीत युद्ध के दौर को देखा है। अगर सोवियत यूनियन नहीं टूटता तो आज अमेरिका शायद सबसे बड़ी महाशक्ति नहीं होता। ये बुजुर्ग लोग रूस से अब तक नफरत करते हैं। इनलोगों की नज़र में कम्युनिज्म एक बुरी चीज है (जो है भी)। चूँकि डोनाल्ड ट्रम्प और कमला हैरिस के बीच इस चुनाव में काँटे की टक्कर थी, इसीलिए वोटरों के एक वर्ग को कम्युनिज्म का विरोध कर के अपनी तरफ खींचना डोनाल्ड ट्रम्प को फायदे का सौदा भी लगा। ऊपर से डोनाल्ड ट्रम्प एक उद्योगपति भी हैं और उन्हें दुनिया के सबसे अमीर शख्स एलन मस्क का समर्थन हासिल है। मार्क्सवादी विचारधारा अमीरों से संपत्ति छीन लेने को कहती है, ऐसे में डोनाल्ड ट्रम्प का मार्क्सवाद के विरोध में जाना स्वाभाविक है।

कट्टर इस्लामी आतंकवाद का विरोध भारतीयों को लुभाता है

दूसरा बिंदु को डोनाल्ड ट्रम्प को भारतीय समाज से जोड़ता है वो है – कट्टर इस्लामी आतंकवाद। हम इस्लामी आतंकवाद से पीड़ित रहे हैं। कश्मीर में आज भी जानें जाती हैं और इसके पीछे पाकिस्तान पोषित आतंकी संगठन होते हैं। बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथियों ने ही हिन्दुओं को पलायन के लिए मजबूर किया। इसके अलावा अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता आने के बाद हमने सिखों को अपने माथे पर पवित्र गुरुग्रंथसाहिब लेकर भारत में लौटते हुए देखा। चाहे 26/11 का मुंबई हमला हो या फिर उरी और पठानकोट के हमले, इस्लामी आतंकवाद ने भारतीय समाज को कई घाव दिए हैं। ऐसे में स्वतः ही इस्लामी आतंकवाद का विरोध करने वाले को हम हितैषी मान लेते हैं। इजरायल के साथ भारतीय समाज की सहानुभूति का एक कारण यह भी है।

डोनाल्ड ट्रम्प ने राष्ट्रपति रहते टेक्सास के हॉस्टन में ‘हाऊडी मोदी’ नामक कार्यक्रम में भारतीय पीएम के सामने खुल कर कहा था कि कट्टर इस्लामी आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका और भारत मिल कर लड़ते रहेंगे। डोनाल्ड ट्रम्प के कार्यकाल में ही ISIS का मुखिया अबू बकर अल बगदादी मारा गया था। इसके बाद डोनाल्ड ट्रम्प का संबोधन भी वायरल हुआ था, जिसमें वो कहते दिख रहे थे कि बगदादी कुत्ते की मौत मारा गया। भारत के लोग इस्लामी कट्टरपंथ और आतंकवाद के खिलाफ इस तरह की भाषा को पसंद करते हैं। डोनाल्ड ट्रम्प ने चुनाव से पहले जनता से कहा भी था कि क्या आप ऐसा राष्ट्रपति चाहते हैं जो हजारों इस्लामी कट्टरपंथियों को हमारे देश में घुसाए, या फिर ऐसा जो उन्हें निकाल बाहर करे?

उन्होंने पहले ही ऐलान कर दिया था कि उनके शपथग्रहण के बाद अमेरिका अपने इतिहास का सबसे बड़ा प्रत्यर्पण अभियान चलाएगा। यानी, इस्लामी घुसपैठियों को बाहर भेजा जाएगा। आप देखिए, भारत में भी ये माँग होती रही है। बांग्लादेश से आए घुसपैठिए यहाँ के कई इलाक़ों की डेमोग्राफी बदल रहे हैं। हिमाचल प्रदेश में मस्जिद बना कर हुए अतिक्रमण के खिलाफ हिन्दुओं का तगड़ा विरोध प्रदर्शन चला। मुस्लिम बहुल इलाकों को ‘संवेदनशील इलाका’ और ‘मुस्लिम इलाका’ कह कर संबोधित किया जाता है और वहाँ से गुजरने पर हिन्दू शोभायात्राओं पर हमले होते हैं। पश्चिम बंगाल का मालदा-मुर्शिदाबाद हो, हरियाणा का मेवात या फिर बिहार का पश्चिमांचल जिसमें किशनगंज वगैरह आता है – बदलती डेमोग्राफी के बाद हिन्दू समाज घुसपैठियों को देश से निकाल बाहर करना चाहता है। जब डोनाल्ड ट्रम्प ऐसी बातें करते हैं तो ये समाज उनसे कनेक्टेड महसूस करता है।

Wokeism से लड़ाई का ऐलान तो RSS भी कर चुका है

अब आता है Wokeism. भारत में इसके खिलाफ माहौल इसी से समझ लीजिए कि विजयादशमी के वार्षिक उत्सव के दौरान 100 वर्ष पुराने संगठन RSS (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) के मुखिया मोहन भागवत कहते हैं कि भारत को जिन विचारधाराओं से लड़ना है उसमें Wokeism भी है। भारतीय समाज हमेशा से इसके खिलाफ रहा है कि बच्चों को ये पढ़ाया जाए कि वो खुद को स्त्री-पुरुष के अलावा किसी अन्य लिंग से आयडेंटीफाई करें। भारत में इसे मानसिक रोग माना जाता है। किन्नर समाज का यहाँ सम्मान है, शादी-विवाह जैसे शुभ अवसरों पर उन्हें बुला कर सम्मानित किया जाता है और उनका एक अखाड़ा भी है जहाँ सभी साधु-संत किन्नर हैं। लेकिन, आजकल जो LGBTQ वाला चक्कर चल रहा है और इसमें हर साल अंग्रेजी का एक नया अक्षर जुड़ जा रहा है, वो भारतीय समाज को स्वीकार्य नहीं है। डोनाल्ड ट्रम्प इसके खिलाफ बात करते हैं वो इस समाज को अपने लगते हैं।

डोनाल्ड ट्रम्प कह चुके हैं कि अगर कमला हैरिस राष्ट्रपति बनती हैं तो महिलाओं के लॉकर रूम में पुरुष दिखेंगे और महिलाओं के खेल में पुरुष हिस्सा लेते हुए दिखेंगे। हाल ही में इस बहस ने तब और जोर पकड़ा जब Wokeism से सने ओलंपिक ने अल्जीरिया के इमाने ख़लीफ़ को स्त्रियों के मुक्केबाजी टूर्नामेंट में हिस्सा लेने दिया और वो स्वर्ण पदक भी जीत गया। भारत में भी इसका विरोध हुआ, मजाक बना। अब मेडिकल टेस्ट में पुष्टि हुई है कि वो पुरुष है। इसके खिलाफ लड़ाई भारतीय संस्कृति में भी है, डोनाल्ड ट्रम्प भी ये बातें करते हैं। ऐसे में ये चीजें उन्हें भारतीय समाज से जोड़ती हैं।

भारत में डोनाल्ड ट्रम्प की जीत का जश्न क्यों?

और सबसे बड़ी बात, चुनाव से ठीक पहले डोनाल्ड ट्रम्प ने जिस तरह से बांग्लादेश और दुनिया भर में हिन्दुओं के खिलाफ हो रहे अत्याचार का विरोध किया – उसने भारत में उनके लिए समर्थन की लहर पैदा की। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वो वामपंथी और इस्लामी कट्टरता से हिन्दू समाज को बचाएँगे। जब भारतीय समाज देखता है कि यहाँ राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी जैसे बड़े-बड़े नेता हिन्दुओं के लिए आवाज़ नहीं उठाते और विदेश में डोनाल्ड ट्रम्प इसके लिए आवाज़ उठा रहे हैं तो वो उनसे जुड़ाव महसूस करता है। डोनाल्ड ट्रम्प ने जो ट्वीट किया, वैसा ट्वीट करने की हिम्मत भारतीय सत्ताधीशों में भी पूर्व में नहीं रही है।

इसी तरह, डोनाल्ड ट्रम्प इजरायल का खुल कर समर्थन करते हैं। भारत के लोग इजरायल की जिजीविषा से ख़ासे प्रेरित हैं। वो इसकी प्रशंसा करते हैं कि किस तरह छोटे से देश इजरायल में मुट्ठी भर यहूदियों ने स्वयं का अस्तित्व बचाए रखने के लिए बड़े-बड़े इस्लामी मुल्कों से पंगा लिया और खुद को तकनीकी रूप से इतना मजबूत किया कि ईरान-फिलिस्तीन-लेबनान तक उससे काँपते हैं। डोनाल्ड ट्रम्प इजरायल को बिना शर्त समर्थन की बातें करते हैं, ऐसे में हमें ये भी पसंद आता है। इसीलिए, ये मत पूछिए कि भारत में डोनाल्ड ट्रम्प की जीत का जश्न क्यों मन रहा है।

हाल ही में जगन्नाथ यात्रा के दौरान भी डोनाल्ड ट्रम्प से जुड़ा पुराना किस्सा सामने आया, जिसने हिन्दुओं को लुभाया। असल में सन् 1976 में न्यूयॉर्क के मैनहटन में जब जगन्नाथ यात्रा की तैयारियों में दिक्कतें आ रही थीं तब 30 वर्षीय डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी जमीन इस्तेमाल के लिए दी थी। ‘पेंसिलवानिया रेलरोड यार्ड्स’ का स्वामित्व उन्हीं के पास था और जब कृष्णभक्त उनके पास प्रस्ताव लेकर गए और उन्हें प्रसाद दिया, तब उन्होंने बिना सोचे हाँ कर दिया। पेंसिलवानिया में ही जुलाई 2024 में डोनाल्ड ट्रम्प की हत्या की कोशिश हुई और गोली उनके कान को छूकर निकल गई। हिन्दुओं ने इसे भगवान जगन्नाथ की कृपा बताया। इस नैरेटिव ने भी डोनाल्ड ट्रम्प को भारत व हिन्दू समाज के साथ जोड़ा।

स्रोत: Donald Trump, डोनाल्ड ट्रम्प, हिन्दू, Hindu, US Elections, अमेरिका चुनाव, राष्ट्रपति, President, India, भारत
Tags: AmericaDonald TrumpElection ResultsHinduIndiaUS Presidentअमेरिकी राष्ट्रपतिचुनाव परिणामडोनाल्ड ट्रम्पभारतहिन्दू
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