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लोकतंत्र बनाम ‘तुगलकी फरमान’: कलकत्ता हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग की लगाई क्लास ; मोटरबाइक बैन पर तीखी प्रतिक्रिया

पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान मोटरबाइकों पर लगाए गए प्रतिबंध को हाईकोर्ट ने न केवल 'तुगलकी फरमान' करार दिया, बल्कि आयोग से यहाँ तक कह दिया कि अगर आप सब कुछ बंद करना चाहते हैं, तो बेहतर होगा कि 'आपातकाल' घोषित कर दें

TFI Desk द्वारा TFI Desk
24 April 2026
in चर्चित
लोकतंत्र बनाम ‘तुगलकी फरमान’: कलकत्ता हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग की लगाई क्लास ; मोटरबाइक बैन पर तीखी प्रतिक्रिया

कलकत्ता हाईकोर्ट vs चुनाव आयोग

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लोकतंत्र का महापर्व चुनाव होता है, लेकिन क्या चुनाव के नाम पर नागरिकों की आवाजाही और उनके मौलिक अधिकारों को कैद किया जा सकता है? यह सवाल गुरुवार को कलकत्ता हाईकोर्ट के गलियारों में गूँजा, जब जस्टिस कृष्णा राव की अदालत ने चुनाव आयोग के एक हालिया आदेश की धज्जियाँ उड़ा दीं। पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान मोटरबाइकों पर लगाए गए प्रतिबंध को हाईकोर्ट ने न केवल ‘तुगलकी फरमान’ करार दिया, बल्कि आयोग से यहाँ तक कह दिया कि अगर आप सब कुछ बंद करना चाहते हैं, तो बेहतर होगा कि ‘आपातकाल’ घोषित कर दें। यह कानूनी भिड़ंत केवल एक अधिसूचना पर नहीं थी, बल्कि यह नागरिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक शक्ति के बीच की एक बड़ी वैचारिक लड़ाई बनकर उभरी है।

विवाद की जड़: चुनाव आयोग की वो अधिसूचना जिसने कोलकाता को ठप कर दिया

पूरा मामला 21 अप्रैल को शुरू हुआ, जब चुनाव आयोग ने एक चौंकाने वाली अधिसूचना जारी की। इस आदेश के अनुसार, कोलकाता और दक्षिण 24 परगना के इलाकों में 27 अप्रैल की शाम 6 बजे से 29 अप्रैल तक मोटरसाइकिलों के उपयोग पर सख्त पाबंदी लगा दी गई थी। आदेश की शर्त यह थी कि बाइक केवल सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक ही चलाई जा सकती थी। इसके अलावा, पिलियन राइडिंग (पीछे बैठकर सफर करना) और बाइक रैलियों पर पूरी तरह रोक थी। हालांकि मेडिकल इमरजेंसी और आवश्यक सेवाओं को छूट दी गई थी, लेकिन शहर की एक बड़ी आबादी, जो डिलीवरी और आवाजाही के लिए बाइक पर निर्भर है, के लिए यह आदेश किसी दुस्वप्न से कम नहीं था।

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हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी: ‘सब कुछ बंद करना है तो आपातकाल घोषित कर दें’

गुरुवार को जब इस मामले की सुनवाई जस्टिस कृष्णा राव की बेंच में हुई, तो अदालत का रुख बेहद कड़ा था। जस्टिस राव ने चुनाव आयोग के वकील को फटकार लगाते हुए कहा कि सिर्फ ‘अधिकार’ होना किसी भी तरह के आदेश को थोपने का आधार नहीं हो सकता। उन्होंने तीखा सवाल किया, “क्या नागरिकों के अधिकारों पर इस तरह अंकुश लगाया जा सकता है? अगर आपको लगता है कि सुरक्षा के लिए सब कुछ ठप करना जरूरी है, तो आपातकाल घोषित कर दीजिए।” अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रशासन को कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी दी गई है, न कि आम जनता की जिंदगी में अनावश्यक हस्तक्षेप करने की।

स्वतंत्र चुनाव बनाम नागरिक अधिकार: आयोग का तर्क और अदालत की असहमति

चुनाव आयोग ने अपने बचाव में दलील दी कि यह कदम स्वतंत्र, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया था। आयोग का तर्क था कि बाइक रैलियों और असामाजिक तत्वों की आवाजाही से हिंसा और डराने-धमकाने की घटनाएं हो सकती हैं, जिसे रोकने के लिए यह प्रतिबंध जरूरी है। लेकिन, जस्टिस राव इस तर्क से कतई संतुष्ट नहीं दिखे। उन्होंने पूछा, “आपके पास भारी पुलिस बल है, सीसीटीवी कैमरे हैं और पूरी प्रशासनिक मशीनरी है, फिर भी आपको इतनी कड़ी पाबंदी की जरूरत क्यों पड़ रही है?” अदालत ने इसे एक ‘असंगत प्रयास’ बताया जिससे जनजीवन ठप हो रहा था।

डाटा और दलील: पिछले 5 साल का हिसाब मांग लिया हाईकोर्ट ने

अदालत ने केवल मौखिक फटकार नहीं लगाई, बल्कि आयोग को तथ्यों के कठघरे में खड़ा कर दिया। जस्टिस राव ने आयोग के वकील से सवाल किया कि क्या भारत के अन्य राज्यों में भी चुनाव के दौरान इस तरह के आदेश जारी किए जाते हैं? अदालत ने आयोग से यह भी पूछा कि पिछले पांच वर्षों में मोटरसाइकिल चालकों के खिलाफ ऐसे कितने मामले दर्ज हुए हैं, जिनसे यह साबित हो सके कि स्वतंत्र चुनाव के लिए बाइक पर प्रतिबंध लगाना अनिवार्य था। हाईकोर्ट ने आयोग को शुक्रवार तक शपथपत्र (Affidavit) दाखिल कर इस फैसले के पीछे की ठोस और तर्कसंगत वजह बताने का निर्देश दिया है।

आम जनता और गिग इकॉनमी को राहत: शहर के चौराहों पर खुशी का माहौल

हाईकोर्ट की इस सख्ती के बाद कोलकाता के मध्यवर्गीय परिवारों और खासकर ‘गिग इकॉनमी’ (डिलीवरी पार्टनर्स, कूरियर बॉयज) से जुड़े लोगों ने राहत की सांस ली है। कोलकाता की सड़कों पर बाइक चलाने वालों का कहना है कि चुनाव आयोग के इस आदेश ने उनकी रोजी-रोटी पर संकट खड़ा कर दिया था। शहर के कई चौराहों पर बाइक सवारों ने अदालत के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि सुरक्षा के नाम पर आम आदमी को परेशान करना गलत है। विशेषज्ञों का भी मानना है कि सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है, और प्रशासन को तकनीक तथा पुलिसिंग पर भरोसा करना चाहिए न कि प्रतिबंधों पर।

एक हफ्ते में आयोग को दूसरा झटका: उपद्रवी घोषित करने का फैसला भी पलटा

दिलचस्प बात यह है कि इसी हफ्ते कलकत्ता हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को यह दूसरा बड़ा झटका दिया है। इससे पहले बुधवार को हाईकोर्ट ने आयोग के उस फैसले को भी पलट दिया था जिसमें राज्य के करीब 800 लोगों को ‘उपद्रवी’ (Troublemakers) करार दिया गया था। अदालत के इन लगातार दो फैसलों ने यह संदेश दिया है कि चुनाव के दौरान भी संवैधानिक मर्यादाएं और नागरिक अधिकार सर्वोच्च हैं। अब सबकी नजरें शुक्रवार को दाखिल होने वाले चुनाव आयोग के हलफनामे पर टिकी हैं, जहाँ उसे अपने ‘तुगलकी फरमान’ की वैधानिकता साबित करनी होगी।

Tags: Bike Riding Restriction Bengal PollsCalcutta High Court Election CommissionGig Economy Kolkata ReliefJustice Krishna Rao vs ECMotorbike Ban Kolkata ElectionTughlaqi Farman Election
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