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दो न्यायाधीशों की पीठ ने वर्ष 2024 में अधिवक्ता सैफुल इस्लाम अलिफ की हत्या से जुड़े मामले की सुनवाई की। बचाव पक्ष के अधिवक्ता अपूर्व कुमार भट्टाचार्य ने बताया कि चट्टोग्राम की निचली अदालत में गवाहों के बयान जारी होने के कारण उच्च न्यायालय ने इस समय हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि जब तक मुकदमे की प्रक्रिया जारी है, तब तक राहत देना उचित नहीं होगा।
पवन कल्याण ने उठाए बांग्लादेश की न्याय व्यवस्था पर प्रश्न
आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण ने न्यायालय के इस निर्णय पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। सोशल मीडिया मंच X पर उन्होंने लिखा कि चिन्मय कृष्ण दास पिछले 500 दिनों से कारावास में हैं, जबकि विश्व समुदाय मौन बना हुआ है।
उन्होंने बांग्लादेश की न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर प्रश्न उठाते हुए आरोप लगाया कि संत के पक्ष में पैरवी करने वाले वकीलों को न्यायालय परिसर में धमकियाँ और भय का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने यह भी पूछा कि क्या बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के अधिकारों की बात करना अब अपराध बन गया है।
पवन कल्याण ने कहा,
“जब उनके अधिवक्ताओं को ही अदालत के गलियारों में धमकाया और चुप कराया जा रहा है, तब हम किस न्याय की बात कर रहे हैं?”
उन्होंने आगे कहा कि यदि कोई भगवाधारी संत अल्पसंख्यकों के अधिकारों की चिंता व्यक्त करता है और उसे अपराधी की तरह व्यवहार सहना पड़ता है, तो विश्व समुदाय को मौन नहीं रहना चाहिए।
उन्होंने बांग्लादेश सरकार से तत्काल चिकित्सीय सहायता उपलब्ध कराने तथा निष्पक्ष कानूनी सहायता सुनिश्चित करने की मांग की। साथ ही, उन्होंने तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और स्वयंभू धर्मनिरपेक्ष समूहों की चुप्पी की भी आलोचना की।
गिरफ्तारी और राजद्रोह के आरोपों पर बढ़ता विवाद
चिन्मय कृष्ण दास बांग्लादेश सम्मिलित सनातनी जागरण जोत के प्रवक्ता हैं। उन्हें 25 नवंबर 2024 को ढाका स्थित हजरत शाहजलाल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा से राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।
प्रशासन का आरोप है कि नवंबर 2024 में आयोजित एक रैली के दौरान उन्होंने बांग्लादेश के राष्ट्रीय ध्वज का अपमान किया। इसके बाद पुलिस ने उन्हें जेल भेज दिया, जहाँ वे अब भी बंद हैं।
मामला तब और अधिक विवादित हो गया जब यह समाचार सामने आया कि उनके बचाव पक्ष से जुड़े अधिवक्ताओं को भी विरोध प्रदर्शनों के दौरान धमकियों और हमलों का सामना करना पड़ा। एक अधिवक्ता पर कथित रूप से हमला भी किया गया। इन घटनाओं ने मुकदमे के वातावरण को लेकर नई चिंताएँ उत्पन्न कर दी हैं।
अब चिन्मय कृष्ण दास का मामला केवल एक सामान्य कानूनी विवाद तक सीमित नहीं रह गया है। यह धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यक अधिकारों तथा बांग्लादेश में हिंदू संगठनों के साथ व्यवहार से जुड़ा व्यापक राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। उच्च न्यायालय के इस नवीन निर्णय के बाद तारिक रहमान सरकार पर आने वाले समय में और अधिक राजनीतिक तथा अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ने की संभावना है।
उच्च न्यायालय संत के विरुद्ध दर्ज चार अन्य मामलों में भी जमानत याचिकाओं पर सुनवाई करेगा। उनकी निरंतर गिरफ्तारी हिंदू संगठनों और अल्पसंख्यक अधिकार समर्थकों के लिए एक प्रमुख आंदोलन का विषय बन गई है। यह मामला अब राजनीतिक और कूटनीतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।































