सूचना और संवाद मानव सभ्यता के प्राण हैं। भारतीय परंपरा में यदि संवाद–कला का कोई आदिपुरुष है तो वह देवर्षि नारद हैं। उन्हें ब्रह्मा का मानस–पुत्र, त्रिलोक–संचारी, वीणाधारी और ‘सूचना–वाहक’ कहा गया है। आज की पत्रकारिता, जो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानी जाती है, उसके मूल तत्व नारद–चरित्र में स्पष्ट दिखते हैं।
नारद जी केवल भक्त–शिरोमणि नहीं, बल्कि लोक–मंगल के लिए सूचना का आदान–प्रदान करने वाले पहले पत्रकार थे। वे स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल—तीनों लोकों में विचरण करते थे। जहाँ अन्याय देखते, वहाँ संवाद से चेतना जगाते। कंस को आकाशवाणी की सूचना देना, द्रौपदी स्वयंवर का समाचार राजाओं तक पहुँचाना, या इंद्र को असुरों की योजना बताना—ये सब ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ देने जैसा ही था।
आदि पत्रकार नारद जी की पत्रकारिता सज्जन रक्षक और दुष्ट विनाश की थी।निष्पक्षता, लोक कल्याण,संवाद कुशलता देव–दैत्य दोनों को सच बताते, बिना भय–दबाव संवाद, गति, सतत प्रवास, सतत संवाद नारद की विशेषताएं हैँ! सूचना का उद्देश्य ‘लोकानां हितम्’ था, निजी स्वार्थ नहीं।
‘नारद–भक्ति–सूत्र’ और ‘नारद–पुराण’ प्रमाण हैं कि वे तर्क, संगीत और कथा से जटिल बात सरल करते थे! ‘नारायण–नारायण’ कहते त्रिलोक में पलभर में पहुँचना—आज की 24×7 न्यूज़–साइकिल का प्रतीक।
वर्तमान पत्रकारिता –स्वरूप और चुनौतियाँ
आज पत्रकारिता प्रिंट, टीवी, डिजिटल, सोशल मीडिया तक फैल गई है। एक ट्वीट से दुनिया हिल जाती है। लेकिन मूल्यों की कसौटी पर देखें तो अंतर भी दिखता है। कई प्रकार के नकली एवं दुष्प्रचार के समाचार प्रसारित किये जाते हैँ! समाचार की सत्यता, प्रमाणिकता पर प्रश्न चिन्ह लगते हैं।
देवर्षि नारद सूचना देकर घटना को धर्म–स्थापना की ओर मोड़ते थे; आज कई बार खबर को ‘डिबेट’ में बदलकर ध्रुवीकरण किया जाता है। पेड न्यूज़, फेक न्यूज़ का बोल-बाला स्पष्ट नजर आता है। नारद का आधार सत्य था—‘नारं ददाति इति नारद:’- अर्थात जो ज्ञान दे वही नारद। आज ‘व्यूज़’ के लिए सत्य गौण हो जाता है।नारद जी पक्ष–विपक्ष दोनों को जोड़ते थे; आज मीडिया–हाउस की विचारधारा खबर का रंग तय करती है। नारद एक घटना की सूचना देकर उसके धर्म–संगत परिणाम तक पहुँचते थे। आज ब्रेकिंग के दबाव में ‘फॉलो–अप’ छूट जाता है।
देवर्षि नारद से क्या सीखे आधुनिक पत्रकार?
धर्म–केन्द्रित पत्रकारिता खबर का अंतिम लक्ष्य राष्ट्र–हित, समाज–हित हो, न कि केवल सत्ता या पूंजी होनी चाहिए! साहस एवं विवेक से पत्रकारिता करने की आवश्यकता है!नारद ने कंस के दरबार में भी सत्य कहा। आज के पत्रकार को सत्ता, कॉरपोरेट और भीड़—तीनों के दबाव में सच कहने की हिम्मत करनी पड़ेगी!
पत्रकार की समाधानपरक दृष्टि रहनी चाहिए!नारद समस्या बता कर ‘भक्ति’ या ‘धर्म’ का मार्ग सुझाते थे। पत्रकारिता भी ‘समस्या बताने’ से आगे बढ़कर ‘संवाद–सेतु’ बने।तकनीक का सदुपयोग नारद की वीणा संवाद का माध्यम थी! आज डिजिटल प्लेटफॉर्म वीणा हैं। उनका उपयोग ‘नारायण’ यानी जन–जन तक सत्य पहुँचाने में हो।
नारद जयंती को लेकर पूर्वाग्रह
‘आद्य पत्रकार देवर्षि नारद’ – यह शीर्षक देखकर कई प्रगतिशील तथा उदार कहलाने वाले पत्रकारों की भौंहें चढ़ सकती हैं। वे कह सकते हैं कि कुछ संगठन हर चीज के लिए कोई न कोई पौराणिक संदर्भ ढूंढकर समाज पर थोपना चाहते हैं। उन्हें यह जानकार और भी आश्चर्य होगा कि ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया को देश के अनेक राज्यों में नारद जयंती के कार्यक्रम उत्साहपूर्वक सम्पन्न हो रहे हैं। ऐसे कार्यक्रमों में जहाँ पत्रकारों को सम्मानित किया जा रहा है तथा किसी वरिष्ठ पत्रकार द्वारा राष्ट्रीय दृष्टिकोण से मीडिया का प्रबोधन भी हो रहा है।
नारद जयन्ती के कार्यक्रमों में धीरे–धीरे बड़ी संख्या में पत्रकार सहभागी हो रहे हैं। जिस किसी राज्य में पहली बार यह कार्यक्रम होता है तब एक उपहास की प्रतिक्रिया कुछ लोगों द्वारा उठाई जाती है, किंतु अब अनेक राज्यों में यह एक प्रतिष्ठित कार्यक्रम बन गया है। देवर्षि नारद आद्य पत्रकार थे, यह किसी संगठन या संस्था की खोज है, ऐसा मिथ्यारोप कुछ लोग कर सकते हैं, परंतु यह जानकार उन्हें शायद हैरानी होगी कि भारत का प्रथम हिंदी साप्ताहिक ‘उदन्त मार्तंड’ 30 मई, 1826 को कोलकाता से प्रारम्भ हुआ था। 30 मई 1826 को ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया, नारद जयंती थी उसके प्रथम अंक के प्रथम पृष्ठ पर सम्पादक ने आनंद व्यक्त किया था कि आद्य पत्रकार देवर्षि नारद की जयंती के शुभ अवसर पर यह पत्रिका प्रकाशित होने जा रही है।
देवर्षि नारद जी पहले ‘ग्लोबल कम्युनिकेटर’ थे—निष्पक्ष, निर्भीक, लोक–मंगलकारी। आदि पत्रकार नारदजी ने वर्तमान के पत्रकारों के लिए जो मानक रखे हैं, उनका भी विश्लेषण आवश्यक है। उन्होंने माया के ज्ञान के लिए एक बार स्त्री का रूप धारण किया। यह उनकी अनुभवात्मक पत्रकारिता व्यवहार का श्रेष्ठ उदाहरण है। उन्होंने मृत्यु का भी जीवनवृत्त लिखा है, जो दुनिया में अन्यत्र नहीं है। कलियुग में भक्ति को दिए वरदान के परिणामस्वरूप भक्ति के प्रचार के लिए भक्तिसूत्र भी लिखा।
वर्तमान पत्रकारिता के पास नारद–जैसी गति और पहुँच है, पर नारद–जैसी नीयत और दृष्टि की ज़रूरत है। यदि पत्रकार ‘नारद–भाव’ से—सत्य, साहस, संवेदना और समाधान—को अपनाए, तो वह सूचना देने वाला ही नहीं, राष्ट्र–निर्माण करने वाला ‘आधुनिक नारद’ बन जाएगा। लोकतंत्र को तभी असली चौथा स्तंभ मिलेगा।
ये लेख tfipost.in के लिए प्रताप समयाल जी ने लिखा है। प्रताप समयाल RSS के वरिष्ठ स्वयंसेवक व हिमाचल प्रांत के प्रांत प्रचार प्रमुख हैं। उनसे pssamyal1989@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।





























