भारतीय चुनाव प्रणाली दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। इस विशाल मशीनरी को सुचारू रूप से चलाने के लिए चुनाव आयोग (ECI) ने कई सख्त नियम और प्रपत्र (फॉर्म) बनाए हैं। इन्हीं में से एक है ‘फॉर्म 17C’। हाल के वर्षों में, विशेष रूप से 2024 के लोकसभा चुनावों और उसके बाद, यह फॉर्म महज़ एक दस्तावेज़ न रहकर राजनीतिक और कानूनी विवाद का केंद्र बन गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सांसद महुआ मोइत्रा और ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (ADR) जैसी संस्थाओं ने इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचाया, जिसने चुनावी पारदर्शिता की एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
आखिर क्या है फॉर्म 17C? एक साधारण समझ
किसी भी चुनाव में पारदर्शिता का सबसे बड़ा आधार यह होता है कि कितने वोट पड़े और कितने गिने गए। फॉर्म 17C इसी का आधिकारिक रिकॉर्ड है। इसे चुनाव आयोग की ‘अकाउंट बुक’ कहना गलत नहीं होगा। यह फॉर्म हर मतदान केंद्र (पोलिंग बूथ) पर पीठासीन अधिकारी (Presiding Officer) द्वारा भरा जाता है। इसमें उस विशिष्ट बूथ की पूरी कुंडली होती है।
इसे दो मुख्य भागों में विभाजित किया गया है:
भाग I: यह मतदान वाले दिन भरा जाता है। इसमें दर्ज होता है कि उस बूथ पर कुल कितने मतदाता पंजीकृत हैं, कितने लोगों ने वास्तव में वोट डाला, कितने लोगों ने पहचान होने के बाद भी वोट देने से मना कर दिया और सबसे महत्वपूर्ण—ईवीएम (EVM) में कितने वोट दर्ज हुए।
भाग II: यह हिस्सा मतगणना (Counting) के दिन भरा जाता है। इसमें उम्मीदवार वार मिले वोटों का विवरण होता है और यह मिलान किया जाता है कि क्या ईवीएम के वोटिंग वाले दिन के आंकड़े मतगणना वाले दिन से मेल खा रहे हैं या नहीं।
महुआ मोइत्रा और विपक्ष की आपत्ति का मुख्य कारण
विपक्ष, विशेषकर तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा का तर्क है कि लोकतंत्र में ‘डेटा’ ही सबसे बड़ी शक्ति है। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान यह देखा गया कि मतदान के तुरंत बाद जारी किए गए ‘अस्थायी आंकड़ों’ और कुछ दिनों बाद जारी ‘अंतिम आंकड़ों’ में 5-6 प्रतिशत तक का बड़ा अंतर दिखाई दिया। इसी विसंगति ने शंकाओं को जन्म दिया।
महुआ मोइत्रा और ADR ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मांग की थी कि चुनाव आयोग को मतदान खत्म होने के 48 घंटे के भीतर सभी मतदान केंद्रों के फॉर्म 17C (भाग-I) की स्कैन कॉपी अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड कर देनी चाहिए। उनका तर्क है कि भारत जैसे विशाल देश में हर छोटी पार्टी हर बूथ पर अपना एजेंट तैनात नहीं कर पाती। यदि यह डेटा सार्वजनिक होगा, तो कोई भी नागरिक यह जाँच सकेगा कि उसके बूथ पर पड़े वोटों की संख्या में बाद में कोई हेरफेर तो नहीं हुई।
चुनाव आयोग की दलीलें और सुरक्षा की चिंता
विपक्ष की इन मांगों के विपरीत, चुनाव आयोग ने फॉर्म 17C को ऑनलाइन सार्वजनिक करने का कड़ा विरोध किया। आयोग का कहना है कि वर्तमान ‘कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल्स, 1961’ के तहत यह फॉर्म केवल उम्मीदवारों के अधिकृत एजेंटों को ही दिया जा सकता है।
आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यदि ये फॉर्म इंटरनेट पर डाल दिए गए, तो इनके साथ डिजिटल छेड़छाड़ (Tampering) की जा सकती है। इससे भ्रामक सूचनाएं फैल सकती हैं और मतदाताओं का पूरी चुनावी प्रक्रिया से भरोसा उठ सकता है। आयोग ने यह भी तर्क दिया कि फॉर्म 17C में केवल ईवीएम का डेटा होता है, जबकि अंतिम परिणामों में पोस्टल बैलेट (Postal Ballots) भी शामिल होते हैं। आधा-अधूरा डेटा सार्वजनिक होने से अनावश्यक विवाद और भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट का ‘हैंड्स-ऑफ’ दृष्टिकोण और फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील मामले की सुनवाई करते हुए एक संतुलित रास्ता अपनाने की कोशिश की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह चल रही चुनावी प्रक्रिया के बीच में हस्तक्षेप नहीं करेगा, क्योंकि इससे पूरी प्रक्रिया बाधित हो सकती है। इसे कोर्ट का ‘हैंड्स-ऑफ अप्रोच’ कहा गया।
हालांकि, कोर्ट ने उम्मीदवारों और उनके एजेंटों के हक में एक बड़ा फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि मतदान केंद्रों पर चुनाव अधिकारियों के लिए एजेंटों को फॉर्म 17C की कॉपी देना अनिवार्य है। यदि कोई अधिकारी ऐसा करने से मना करता है, तो यह कानून का उल्लंघन माना जाएगा। साथ ही, कोर्ट ने यह भी सुगम कर दिया कि एजेंट को यह फॉर्म प्राप्त करने के लिए किसी भी प्रकार की जटिल रसीद या लिखित प्रमाण देने की बाध्यता नहीं होगी।
नियमों में अचानक बदलाव और 2024 का नया मोड़
विवाद तब और गहरा गया जब दिसंबर 2024 में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा विधानसभा चुनाव से संबंधित फॉर्म 17C और सीसीटीवी फुटेज एक याचिकाकर्ता को उपलब्ध कराने का आदेश दिया। इस आदेश के बाद चुनाव आयोग की सक्रियता ने सबको चौंका दिया।
हाई कोर्ट के आदेश के मात्र 11 दिन के भीतर, चुनाव आयोग ने केंद्रीय कानून मंत्रालय को नियम 93 में संशोधन का प्रस्ताव भेजा। यह प्रक्रिया इतनी तेज थी कि 19 दिसंबर को प्रस्ताव भेजा गया और 20 दिसंबर की रात तक अधिसूचना भी जारी कर दी गई। इस त्वरित संशोधन के बाद भी, आम नागरिकों के लिए सीसीटीवी फुटेज और फॉर्म 17C की उपलब्धता पर स्पष्टता नहीं बन सकी, जिससे पारदर्शिता की मांग कर रहे कार्यकर्ताओं में निराशा देखी गई।
आगे की राह
नए मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यभार संभालने के बाद आयोग के रुख में थोड़ी नरमी जरूर आई है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर अब याचिकाकर्ताओं और आयोग के बीच बातचीत के द्वार खुले हैं। हालांकि, तकनीक और पारदर्शिता के इस युग में फॉर्म 17C जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज को ऑनलाइन करने का मुद्दा अभी भी एक कानूनी और नैतिक चुनौती बना हुआ है। क्या डेटा की सुरक्षा पारदर्शिता से ज्यादा महत्वपूर्ण है? या फिर जनता का विश्वास हासिल करने के लिए हर आंकड़े का डिजिटल होना अनिवार्य है? ये ऐसे सवाल हैं जिनका समाधान भविष्य के चुनावी सुधारों में ही छिपा है।





























