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सपा सरकार में हुए घोटाले बढ़ा रहे हैं अखिलेश यादव की मुश्किलें

Mahima Pandey द्वारा Mahima Pandey
8 January 2019
in समीक्षा
अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी घोटाला

(PC: FINANCIAL EXPRESS)

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लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे पास आ रहे हैं वैसे ही अखिलेश यादव की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। एक तरफ वो बसपा के साथ गठबंधन कर अपनी जीत की ताल ठोक रहे हैं वहीं, दूसरी तरफ उनके शासनकाल में हुए घोटाले उनकी मुश्किलों को बढ़ाने का काम शुरू कर चुके हैं। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और सपा अध्यक्ष ने अपने शासनकाल में विकास का खूब राग अलापा लेकिन सपा सरकार वास्तव में क्या विकास करने में व्यस्त थी या प्रदेश में नए घोटालों की सूची बनाने में व्यस्त थी, इसका खुलासा भी धीरे धीरे होने लगा है। जब पहली बार ये यादव वंशज उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे तब उन्होंने  बड़ी योजनाएं की घोषणा थी लेकिन इसकी आड़ में बड़े घोटाले भी किये। फ़िलहाल, ये यादव वंशज उत्तर प्रदेश में हुए करोड़ो के खनन घोटालों को लेकर चर्चा में हैं। दरअसल, अखिलेश यादव के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश में करोड़ो का खनन घोटाला हुआ था और अब धीरे धीरे इन घोटालों की आंच की आंच अखिलेश यादव पर पड़ने लगी है। उन्होंने अपने शासनकाल के दौरान कितने घोटाले किये उसका छोटा सा नमुना यहां है:

गोमती रिवरफ्रंट घोटाला

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यूपी की सत्ता संभालने के कुछ ही महीनों में योगी सरकार ने गोमती रिवर सौंदर्यीकरण परियोजना की जांच शुरू की थी जिसका काम समाजवादी पार्टी सरकार के समय में हुआ था। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 1500 करोड़ गोमती रिवर फ्रंड प्रॉजेक्ट अखिलेश यादव के ड्रीम प्रोजेक्ट में से एक था। इस योजना में बड़ी वित्तीय अनियमितता की आशंका के बाद ही यूपी की योगी सरकार ने जांच के आदेश दिए थे। इसके साथ ही इस मामले में उन्होंने सीबीआई जांच की भी सिफारिश की थी जिसके बाद सीबीआई ने इस मामले की जांच अपने हाथ में ले ली थी।

पिछले साल सितम्बर में गोमती रिवर फ्रंड प्रॉजेक्ट के घोटाले मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने जांच के बाद छह बड़ी कंपनियों को समन भी जारी किया था। प्रवर्तन निदेशालय ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि इस प्रोजेक्ट का ठेका उन कंपनियों को भी दिया गया था जो ब्लेकलिस्टेड थीं। इसके साथ ही इन कंपनियों को ठेके से ज्यादा राशि का भुगतान किया गया था। 

यादवीकरण

समाजवादी पार्टी की पूर्व की सरकार में जो उपेक्षा से भरी राजनीति सामने आई थी वो पहले कभी नहीं देखी गयी थी। यादव जाति के लोगों को सपा से न सिर्फ राजनीतिक संरक्षण मिला था बल्कि उनके लिए नीतियां भी ख़ास थीं जिसने प्रदेश सरकार के शासन के एक बेतुके स्तर को सामने रखा था। साल 2015 में, अखिलेश यादव द्वारा नियुक्त 86 एसडीएम में से 56 यादव समुदाय से थे। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक 2014 में 60 फीसदी से ज्यादा पुलिस स्टेशन में अधिकारी यादव समुदाय से थे। प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 40 में से 32 पुलिस स्टेशन का नेतृत्व यादव अधिकारी द्वारा किया जाता था।

यही नहीं समाजवादी पार्टी की पूर्व सरकार के ‘यादवीकरण’ के प्रक्रिया यूपीपीएससी में भी सामने आई थी जहां भर्ती में एक विशेष जाति को प्राथमिकता देने के आरोप लगे थे। 

समाजवादी पेंशन घोटाला

साल 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को जीत दिलाने में समाजवादी पेंशन योजना की भूमिका काफी अहम थी। सत्ता में आने के बाद अखिलेश सरकार ने उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब परिवार को जीवन-यापन, आर्थिक एवं सामाजिक उन्नयन हेतु आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने हेतु वित्तीय वर्ष 2014-15 में ‘समाजवादी पेंशन योजना शुरू की थी लेकिन यूपी की योगी सरकार ने पिछली अखिलेश सरकार के दौरान ‘समाजवादी पेंशन योजना’ में बड़े घोटाले का खुलासा किया। समाजवादी पेंशन योजना घोटाले की शिकायत के बाद जब प्रमुख सचिव समाज कल्याण ने मई 2017 में जांच शुरू की। ये जांच साल 2018 में पूरी हुई और जब इसकी रिपोर्ट सामने आई तो अरबों रुपये के फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक  करीब 4 लाख लोग ऐसे थे जिन्हें योजना के लागू होने के बाद से ही बगैर नियम पेंशन दी जा रही थी। घोटाले के खुलासे के बाद योगी सरकार ने इस योजना को बंद कर दिया। उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री रमापति शास्त्री ने पिछले साल विधानसभा की कार्यवाही के दौरान बताया था कि कुल 50 लाख लोगों को हर साल समाजवादी सरकार के दौरान पेंशन दी गई जिनमें से 4 लाख लोग ऐसे थे जो पेंशन के लायक नहीं थे। यही नहीं करीब 43000 लोग ऐसे लोगों को पेंशन दी जा रही थी जीवित नहीं थे। ऐसे में सवाल उठने लाजमी है कि जिस पेंशन योजना का अखिलेश दम भरते हैं वास्तव में वो गरीबों के लिए नहीं बल्कि ऐसे लोगों को लाभ पहुंचाया गया जो इसके लायक ही नहीं थे।

लैपटॉप वितरण घोटाला

उत्तर प्रदेश की जनता को याद ही होगा अखिलेश यादव का लैपटॉप बांटने का जुमला और ये जुमला समाजवादी पार्टी की जीत के कारणों में से एक था। जब इस योजना में घोटाले की खबर सामने आई तो सभी हैरान हो गए। ये घोटाला शायद सामने नहीं आता अगर लेखक शांतनु गुप्ता की किताब “उत्तर प्रदेश-विकास की प्रतीक्षा में” को लिखने के लिए 2016 में एक आरटीआई फाइल न की गयी होती।

आरटीआई के जवाब से सामने आया कि साल 2012 से 2014 तक सपा सरकार ने 14 लाख 81 हजार 118 लैपटॉप खरीदकर प्रदेश के जिलों में भेजे थे जिनमें से बच्चों को सिर्फ 6 लाख 11 हजार 794 लैपटॉप ही बांटे गए थे। बाकी बचे 8 लाख 69 हजार 324 लैपटॉप कहां गए इसकी सरकारी रिकॉर्ड में कोई जानकारी नहीं मिली है। वहीं एक समाजवादी लैपटॉप की कीमत 13490 थी जिसका मतलब है कि करीब 1173 करोड़ रुपए के लैपटॉप गायब हैं। मतलब की लैपटॉप के वितरण में हेराफेरी सपा सरकार में हुई थी जो किसी बड़े घोटाले से कम नहीं है। इस योजना में हुए घोटाले की जांच के आदेश यूपी सरकार दे चुकी है। यही नहीं सपा सरकार में जिन अधिकारियों ने घोटाले को अंजाम देने में भूमिका निभाई थी उनपर भी योगी की चाबुक चलेगी। योगी के इस आदेश के बाद से समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव की मुश्किलें जरुर बढ़ गयी हैं। जब इस घोटाले की जांच पूरी होगी तब अखिलेश और उनकी पार्टी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

खनन घोटाला

अखिलेश यादव के शासनकाल में उत्तर प्रदेश में करोड़ो का खनन घोटाला हुआ था जिसकी जांच सीबीआई ने शुरू भी कर दी अहि और जल्द ही इस मामले में समाजवादी पार्टी अध्यक्ष से पूछताछ भी की जा सकती है

अखिलेश यादव के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश में करोड़ो का खनन घोटाला हुआ था और अब धीरे धीरे इस घोटाले की जांच की आंच अखिलेश यादव पर पड़ने लगी है। जल्द ही उन्हें प्रदेश में अवैध रेत खनन के एक मामले में सीबीआई जांच का सामना करना पड़ सकता है। हाल ही में उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा के बीच सीटों को लेकर सहमती बनी थी लेकिन चुनाव से पहले ही अखिलेश यादव पर सीबीआई की तलवार लटक रही है। हो सकता है इसका असर आगामी लोकसभा चुनावों पर भी पड़े।

सीबीआई हमीरपुर जिले में 2012-16 के दौरान अवैध रेत खनन मामले की जांच कर रही है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की ओर से इस मामले की जांच के आदेश के करीब ढाई साल बाद सीबीआई ये कार्रवाई कर रही है। इसी संबंध में शनिवार को सीबीआई ने उत्तर प्रदेश के जालौन, हमीरपुर, लखनऊ और दिल्ली समेत करीब 14 स्थानों पर तलाशी भी ली। इस मामले में 11 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज है। ये प्राथमिकी 2 जनवरी 2019 को दर्ज की गयी थी।

बता दें कि साल 2012 से 2017 के बीच मुख्यमंत्री रहे अखिलेश यादव के पास 2012-2013 के बीच खनन विभाग का अतिरिक्त प्रभार था। अखिलेश के बाद साल 2013 में गायत्री प्रजापति खनन मंत्री बने थे और चित्रकूट में एक महिला द्वारा बलात्कार की शिकायत के बाद 2017 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। तत्कालीन अखिलेश सरकार ने ही आईएएस अधिकारी बी। चंद्रकला की पोस्टिंग पहली बार हमीरपुर जिले में जिलाधिकारी के पद पर की थी। आईएएस अधिकारी बी। चंद्रकला पर आरोप है कि उन्होंने लाई 2012 के बाद हमीरपुर जिले में 50 मौरंग के खनन के पट्टे किए थे, जबकि ई-टेंडर के जरिये मौरंग के पट्टों पर स्वीकृति देने का प्रावधान था, लेकिन उन्होंने सभी प्रावधानों की अनदेखी की थी। अवैध रेत खनन मामले में अखिलेश यादव की भूमिका भी घेरे में है।

इसके अलावा लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस वे में करोड़ों का मुआवजा घोटाला, नोएडा में 2500 एकड़ में बनने वाली समाजवादी पार्क में भी घोटाला सामने आ चुका है। ये सभी घोटाले बतातें है कि अखिलेश ने किस तरह से प्रदेश के हर विकास कार्य में घोटालों को अंजाम दिया और जनता के पैसों को खूब उड़ाया। अब यूपी की योगी सरकार इन सभी घोटालों की जांच करवा रही है। जैसे- जैसे जांच पूरी होगी अखिलेश सरकार के काले कारनामे सामने आयेंगे और सपा अध्यक्ष की मुश्किलें बढती जाएगी। इसके साथ ही सपा अध्यक्ष को अपने कारनाम का खामियाजा आगामी लोकसभा चुनाव में भुगतने पड़ सकते हैं।

Tags: अखिलेश यादवसपासमाजवादी पार्टी
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