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‘लेन-देन बराबर का होना चाहिए’, कल तक एक्सपोर्ट से खूब कमाने वाला चीन अब अपनी नहीं चला सकता

Vikrant Thardak द्वारा Vikrant Thardak
16 June 2020
in विश्व
‘लेन-देन बराबर का होना चाहिए’, कल तक एक्सपोर्ट से खूब कमाने वाला चीन अब अपनी नहीं चला सकता
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पिछले कुछ दशकों में सरकारों ने दुनियाभर में free trade को अपनी आर्थिक समृद्धि के लिए बेहद ज़रूरी माना। फ्री ट्रेड का समर्थन करने वालों की दलील यह थी कि इससे सामान के उत्पादक और उपभोक्ता, दोनों को फायदा होता है, क्योंकि सस्ती लेबर वाले देशों में सामान बनाकर एक्सपोर्ट करने से सामान की कीमत कम पड़ती है। इस प्रकार पिछले कुछ दशकों में left, centre-left, यहाँ तक कि centre right सरकारों ने इस तंत्र को खूब बढ़ावा दिया, और दुनियाभर में कई free trade agreements साइन किए गए।

हालांकि, वर्ष 2016 में जब से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प सत्ता में आए हैं, तब से दुनियाभर में इस तंत्र को बड़ी चुनौती मिली है। दुनियाभर में protectionism को बढ़ावा मिला है, और फ्री ट्रेड को गहरा धक्का पहुंचा है। जो देश globalization और वैश्विक मुक्त व्यापार के तहत पिछले दशकों में पिछड़ गए थे, वो अब खुलकर सामने आ रहे हैं। Free trade system ने लगातार कुछ देशों को ज़रूरत से ज़्यादा फायदा पहुंचाया। चीन, जर्मनी, आयरलैंड, दक्षिण कोरिया, इटली, और ताइवान जैसे देश इतने संधाधन ना होने के बाबजूद आगे निकल गए, जबकि संसाधनों से भरे देश पिछड़ते चले गए।

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CIA World Factbook के वर्ष 2017 के आंकड़ों के मुताबिक चीन का trade surplus दुनिया में सबसे अधिक है। चीन हर साल 426 बिलियन डोलर्स का trade surplus अर्जित करता है। दूसरे नंबर पर 297 बिलियन के साथ जर्मनी है। इसके बाद दक्षिण कोरिया, इटली और ताइवान जैसे देश आते हैं, जिनके पास कुछ खास प्रकृतिक संसाधन भी नहीं हैं।

दूसरी तरफ, कुछ ऐसे देश आते हैं, जो इस एक्सपोर्ट रेस में पिछड़ गए। इन देशों को हर साल अरबों डोलर्स के Trade deficit का बोझ उठाना पड़ता है। अमेरिका 776 बिलियन डोलर्स के साथ सबसे आगे है, जबकि नुकसान उठाने में भारत, फ्रांस, UK, स्पेन और पाकिस्तान जैसे देश भी शामिल हैं।

दुनिया के तीन सबसे ज़्यादा trade deficit का बोझ उठाने वाले देश यानि भारत, UK और अमेरिका का कुल trade deficit ही 1 ट्रिलियन डॉलर से ज़्यादा बनता है, इसके उलट चीन और जर्मनी जैसे देश इसका सबसे ज़्यादा फायदा उठाते हैं। अमेरिका के कुल ट्रेड डेफ़िसिट का लगभग आधा हिस्सा चीन से ही आता है।

जब से ट्रम्प सत्ता में आए हैं, तब से ही उन्होंने चीन के आयात पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं। इसके अलावा चीन और अमेरिका ट्रेड डील के पहले चरण को फ़ाइनल भी कर चुके हैं, जिसके तहत trade gap को कम करने के लिए चीन ने अमेरिका से ज़्यादा सामान खरीदने का वादा किया है।

चीन का भारत के साथ भी करीब 50 बिलियन डॉलर से ज़्यादा का trade surplus है। वर्ष 2018 में तो यह trade surplus 63 बिलियन तक पहुँच गया था और तब भारत के व्यापार मंत्री को यह कहना पड़ा था कि चीन को भी अब भारत से ज़्यादा सामान खरीदना होगा, क्योंकि इतना trade deficit स्वीकार्य नहीं है। उसके बाद भारत सरकार द्वारा किसी कार्रवाई से बचने के लिए चीन ने भारत से इम्पोर्ट को बढ़ाया था।

पिछले दो सालो में भारत का trade deficit 15 बिलियन डॉलर से कम हुआ है। इसी प्रकार चीन के साथ ट्रेड वॉर के बाद अमेरिका का भी trade डेफ़िसिट कम होने की संभावना है। हालांकि, पिछले दो सालों में चीन से आयात पर import duty बढ़ाने के बावजूद अमेरिका का trade deficit बढ़ा ही है।

भारत के सामने समस्या केवल चीन की ही नहीं है। भारत का अभी अमेरिका के साथ trade surplus है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प भारत पर लगातार अमेरिका से इम्पोर्ट बढ़ाने का दबाव बनाते रहते हैं। पिछले कुछ सालों में अमेरिका ने ना सिर्फ भारत पर कई import duties लगाई हैं बल्कि इसे और बढ़ाने की भी धमकी दी है। इसके बाद भारत को अमेरिका से shale oil इम्पोर्ट करना पड़ा था।

Protectionism के बढ़ने के साथ ही कुछ देशों द्वारा trade surplus का फायदा उठाना अब बंद होने जा रहा है। इसका सबसे ज़्यादा नुकसान दुनिया की तथाकथित factory कहे जाने वाले चीन को ही होगा। आने वाले सालों में दुनिया के ये देश अपने एक्स्पोर्ट्स और इम्पोर्ट्स को बराबरी पर रखना चाहेंगे, जिससे उनके देश को बड़ा व्यापार घाटा ना उठाना पड़े। ऐसे में चीन और जर्मनी जैसे देशों की दादागिरी अब खत्म होने वाली है। जिन देशों में ज़्यादा घरेलू लागत है, उन्हीं को अब सबसे बड़ा फायदा मिलेगा।

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