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चुनावी विश्लेषण: क्या विधानसभा चुनाव 2023 में भाजपामय होगा तेलंगाना ?

तेलंगाना में भाजपा अपनी पकड़ काफी मजबूत कर चुकी है. ऐसे में केसीआर के लिए अगला विधानसभा चुनाव 'एकतरफा' तो कतई नहीं होगा.

TFI Desk द्वारा TFI Desk
5 January 2023
in समीक्षा
2023 Telangana Assembly election

Source- TFI

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बीजेपी दक्षिण भारत की राजनीति में विस्तार करने की कोशिश में है। कर्नाटक के बाद यदि पार्टी दक्षिण भारत में कहीं सबसे ज्यादा अपना जोर लगाती है तो वह सीधे तौर पर तेलंगाना ही है। अब आप कहेंगे कि तेलंगाना में भी बीजेपी की स्थिति कुछ खास नहीं है तो बता दें कि पार्टी यहां विधानसभा चुनावों के लिहाज से पूरा जोर लगा रही है। यही कारण है कि बीजेपी से राज्य के सीएम और BRS प्रमुख के चंद्रशेखर राव भी डरने लगे हैं। उन्हें पता है कि राज्य में 2023 के विधानसभा चुनाव (2023 Telangana Assembly election) उनके लिए बीजेपी कठिन बना देगी और संभव है कि पार्टी सत्ता से बेदखल भी हो जाए।

ज्ञात हो कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव तेलंगाना के गठन को लेकर काफी आक्रामक रहे थे। नतीजा यह रहा कि जब गठन के बाद पहला चुनाव हुआ तो उनकी धमाकेदार जीत हुई। वहीं, उनकी परेशानी यह थी कि उसी दौरान मोदी युग की शुरुआत भी हुई और बीजेपी ने वहां अपना विस्तार करने का मन बना लिया। 2018 में हुए राज्य के दूसरे विधानसभा चुनाव में भी केसीआर की पार्टी ने आसानी से चुनाव में जीत हासिल कर ली लेकिन उसके बाद के पांच वर्षों में काफी कुछ बदल चुका है‌। स्थिति तो ऐसी बन गई है कि अब विधानसभा चुनाव 2023 में केसीआर को चुनाव (2023 Telangana Assembly election) जीतने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ सकती है। यानी अभी तक जिस तरह से एकतरफा जीत उन्हें मिल रही थी, वह अब संभव नहीं है और यह स्पष्ट है कि वर्ष 2023 से चीजें बदल जाएंगी।

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बीआरएस का बीजेपी से सीधा मुकाबला

दरअसल, 2023 में देश के 10 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और तेलंगाना (2023 Telangana Assembly election) भी उन्हीं राज्यों में से एक है। वैसे तो राज्य में बीआरएस (पहले टीआरएस), कांग्रेस, AIMIM, बीजेपी और अन्य पार्टियां मौजूद हैं लेकिन इस बार का चुनाव बीआरएस बनाम बीजेपी हो सकता है। वहीं, यह संभावनाएं भी जताई जा रही है कि अंतिम क्षणों में जब बीआरएस के पास कोई रास्ता नहीं होगा तो बीआरएस, कांग्रेस से गठबंधन भी कर सकती है और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM का समर्थन पहले से ही उसके पास है, जिसके कारण सीधा मुकाबला बीआरएस गठबंधन बनाम बीजेपी होगा। सबको पता है कि तेलंगाना में AIMIM, बीआरएस की बी टीम बनकर काम करती है। ऐसे में सीधे शब्दों में कहा जा सकता है कि इस बार सभी दल एक साथ मिलकर 2023 Telangana Assembly election में बीजेपी से मुकाबला करेंगे।

बीआरएस को पता है कि बीजेपी उसके लिए तेलंगाना में मुख्य चुनौती बन सकती है और यही कारण है कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव बीजेपी को केंद्रीय स्तर पर घेरने की कोशिश कर रहे हैं। के चंद्रशेखर राव यह दिखा रहे हैं कि वो राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विकल्प बन सकते हैं, जबकि स्थिति यह है कि वो तेलंगाना में ही बीजेपी से मात खा सकते हैं। इस डर को देखते हुए अपनी नीति के तहत केसीआर ने अपनी पार्टी का नाम तेलंगाना राष्ट्रीय समिति से बदलकर भारतीय राष्ट्रीय समिति यानी बीआरएस कर लिया। इससे यह दिखाने की कोशिश की जा रही है कि केसीआर राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी को चुनौती देंगे, जबकि बीजेपी ने असल चुनौती तो उन्हें तेलंगाना में ही दे रखी है।

राज्य में गिरता जा रहा है केसीआर का ग्राफ

वर्ष 2018 के विधानसभा चुनावों की बात करें तो राज्य की 119 विधानसभा सीटों में से बीआरएस को 88 सीटों के साथ 73.95% वोट प्रतिशत हासिल हुआ था। इसके अलावा कांग्रेस को 19 और टीडीपी को 2 सीटें मिली थी। इस गठबंधन को करीब 17 प्रतिशत वोट मिला था। वहीं, 2018 में बीजेपी को 1 सीट के साथ 0.84 प्रतिशत वोट मिला था। खास बात यह है कि उस चुनाव में AIMIM को 7 सीटें मिली थीं। ध्यान देने योग्य है कि अन्य दलों के विधायकों के शामिल होने के बाद मौजूदा समय में बीआरएस के विधायकों की संख्या 102 हो गई है लेकिन BRS की मुसीबतें उपचुनाव में बढ़ी, जब बीजेपी ने उपचुनाव जीतकर दो विधायकों की बढ़त हासिल कर ली।

बता दें कि नवंबर में हुए उपचुनाव में भी बीआरएस के खिलाफ बीजेपी ने हुजूराबाद सीट पर जीत हासिल की थी। वहीं, अगर हम वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो तेलंगाना राष्ट्रीय समिति ने सबसे ज्यादा 90 सीटें जीती थी। कांग्रेस को 13, एआईएमआईएम को 7, तेलुगु देशम पार्टी को 3 और सीपीआई को 1 सीटें मिली थी। वहीं, बीजेपी ने 5 सीटों पर जीत हासिल की थी।‌ इसके अलावा लोकसभा चुनावों के लिहाज से देखें तो 2019 में बीजेपी का प्रदर्शन काफी अच्छा था।

राज्य की 17 सीटों में बीआरएस ने 9, बीजेपी ने 4, कांग्रेस ने 3 और AIMIM ने एक सीट हासिल की थी। लेकिन उसके बाद बीजेपी राज्य में काफी ज्यादा सक्रिय हो गई। आपने देखा होगा कि राज्य में अन्य विपक्षी पार्टियां केसीआर के खिलाफ एक बयान तक नहीं देती हैं लेकिन वही बीजेपी ने केसीआर के भ्रष्टाचार को लेकर उनका धागा खोलना शुरू कर दिया और उसका नतीजा हमें हैदराबाद नगर निगम चुनाव 2020 में देखने को मिला।

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60 सीटों पर मुस्लिमों का प्रभाव

बीजेपी ने पूरे दम खम के साथ चुनाव लड़ा और पिछले नगर निगम चुनाव में 150 में से 99 सीटें जीतने वाली बीआरएस 2020 में 55 सीटों पर सिमट गई। वहीं, पिछले चुनाव में 4 सीटों पर जीत हासिल करने वाली बीजेपी ने 48 सीटों पर बढ़त बना ली। इसके अलावा एआईएमआईएम ने 44 सीटों पर जीत हासिल की थी।

राज्य के जातिगत समीकरण की बात करें तो तेलंगाना में मुस्लिम वोटर्स 12 फीसदी हैं। हैदराबाद की 10 सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं की आबादी 35 से 60 फीसदी और राज्य की करीब 50 सीटों पर 10 से 40 फीसदी के बीच है। सटीक शब्दों  में कहें तो 119 में से 60 सीटों पर उनका सीधा प्रभाव है। यह बीआरएस और कांग्रेस के मूल वोट बैंक माने जाते रहे हैं लेकिन आपको बता दें कि मुस्लिम समाज का एक वर्ग बीआरएस से नाखुश भी है। उनकी दलील है कि पार्टी ने मुस्लिमों के लिए आरक्षण को चार फीसदी से बढ़ाकर 12 फीसदी करने के अपने वादे को पूरा नहीं किया है, जो कि आगामी चुनाव में केसीआर की लिए मुश्किलें बढ़ा सकते हैं।

बता दें कि राज्य के 33 जिलों में से कम से कम 9 जिलों में अनुसूचित जाति की 20% से अधिक आबादी है। मंचेरियल जिले में सबसे अधिक 25.64% दलित आबादी है, जबकि हैदराबाद में दलित आबादी का सबसे कम प्रतिशत 11.71 है। राज्य में अनुसूचित जाति की औसत आबादी 17.53 फीसदी है। कई सीटों पर अनुसूचित जाति का सीधा प्रभाव है और बीजेपी इन्हें साधने में जुटी हुई है।

केसीआर को नहीं मिलेगी आसान जीत

बीजेपी के लिए खास बात यह है कि केसीआर के नंबर दो माने जाने वाले इटाला राजेंद्र ने बीजेपी का दामन थाम लिया है। वहीं, दूसरी ओर बीआरएस की सबसे बड़ी समस्या यह है कि पार्टी पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोप हैं। राज्य में पार्टी की छवि 10 वर्ष की सत्ता विरोधी लहर के चलते नकारात्मक हो गई है। इसके अलावा वंशवाद और राष्ट्रीय राजनीति के चक्कर में तेलंगाना को दरकिनार करने की मंशा केसीआर के लिए मुसीबत बन‌ सकती है।

यह भी कहा जाता है कि जब भी क्षेत्रीय पार्टी, राष्ट्रीय पार्टी बनने की ओर कदम बढ़ाती है तो लोगों का भरोसा डगमगाने लगता है। ऐसे में केसीआर के लिए थोड़ी परेशानी बढ़ सकती है क्योंकि केसीआर को लेकर तेलंगाना की जनता का मूड अब पहले जैसा तो बिल्कुल भी नहीं है। खास बात यह है कि बीजेपी काफी तेजी से तेलंगाना में विस्तार कर रही है। पिछले चुनाव में बीजेपी का वोट प्रतिशत 1 फीसदी भी नहीं था लेकिन इस बार अनुमान है कि केसीआर की पार्टी का वोट प्रतिशत तो कम होगा ही, साथ ही विपक्ष का जो वोट प्रतिशत है वह भी इस बार बीजेपी की ओर खिसक सकता है।‌

क्योंकि राज्य में कांग्रेस की स्थिति डांवाडोल है, लेफ्ट खात्मे की ओर है। इसके कारण लोग बीजेपी को बीआरएस के विकल्प के रूप में देख भी रहे हैं। ऐसे में इस बात की पूरी संभावना है कि तेलंगाना में केसीआर की जीत आसान नहीं होगी। यह टक्कर भले ही बीजेपी को सत्ता तक न पहुंचा पाए लेकिन केसीआर के विजय रथ को धीमा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

और पढ़ें: चुनावी विश्लेषण: कांग्रेस का ‘राजस्थान गढ़’ भी जाने वाला है

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