पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण के बीच एक ऐसी कानूनी और राजनीतिक लड़ाई छिड़ गई है, जिसने चुनाव आयोग की निष्पक्षता और पर्यवेक्षकों (Observers) की भूमिका पर नई बहस छेड़ दी है। उत्तर प्रदेश कैडर के चर्चित IPS अधिकारी अजय पाल शर्मा, जिन्हें ‘यूपी का सिंघम’ कहा जाता है, इस समय विवादों के केंद्र में हैं। उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर कर उन्हें चुनाव पर्यवेक्षक के पद से हटाने की मांग की गई है। समर्थकों का कहना है कि यह याचिका उनकी निष्पक्षता पर सवाल नहीं है, बल्कि उस ‘सख्त चुनावी प्रवर्तन’ (Strict Poll Enforcement) को रोकने की कोशिश है जिसने दशकों से चले आ रहे चुनावी तौर-तरीकों को अस्त-व्यस्त कर दिया है।
पर्यवेक्षक से राजनीतिक निशाना तक: अजय पाल शर्मा और दक्षिण 24 परगना का विवाद
अजय पाल शर्मा 2011 बैच के IPS अधिकारी हैं और वर्तमान में प्रयागराज में तैनात हैं। उन्हें दक्षिण 24 परगना में चुनाव आयोग का पर्यवेक्षक नियुक्त किया गया था। विवाद तब शुरू हुआ जब शर्मा ने फलटा और आसपास के इलाकों में कथित तौर पर उपद्रवियों को चेतावनी दी। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में वे सख्त लहजे में डराने-धमकाने वालों को अंजाम भुगतने की चेतावनी देते नजर आए। समर्थकों का तर्क है कि एक संवेदनशील क्षेत्र में एक गंभीर पर्यवेक्षक को यही करना चाहिए—यह संदेश देना कि मतदाताओं पर दबाव बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। लेकिन इस हस्तक्षेप ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नेताओं को नाराज कर दिया, जिन्होंने इसे ‘अतिरेक’ (Overreach) करार दिया।
सुप्रीम कोर्ट में याचिका: क्या कहता है कानून?
याचिकाकर्ता आदित्य दास ने अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है (Aditya Das v. Election Commission, Diary No. 26135/2026)। याचिका में आरोप लगाया गया है कि शर्मा पक्षपाती हैं और उम्मीदवारों को धमका रहे हैं। याचिका में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 20B का हवाला देते हुए कहा गया है कि पर्यवेक्षकों को तटस्थ रहना चाहिए। हालांकि, शर्मा के बचाव में यह तर्क दिया जा रहा है कि ‘तटस्थता’ का अर्थ ‘मूकदर्शक’ बनना नहीं है। यदि मतदाताओं के पहचान पत्र छीनने या उन पर दबाव डालने की शिकायतें मिल रही हैं, तो एक पर्यवेक्षक का चुप रहना लोकतांत्रिक जनादेश की विफलता होगी।
मैदानी हकीकत: फलटा और डायमंड हार्बर में ‘सिंघम’ का मार्च
फलटा और डायमंड हार्बर, जो अभिषेक बनर्जी का गढ़ माना जाता है, वहां अजय पाल शर्मा का कड़ा रुख चर्चा का विषय रहा। बताया जा रहा है कि TMC उम्मीदवार जहांगीर खान के करीबियों द्वारा मतदाताओं पर दबाव डालने की शिकायतों के बाद शर्मा हरकत में आए। वे केंद्रीय बलों के भारी काफिले और बख्तरबंद वाहनों के साथ सड़कों पर उतरे। उन्होंने कथित उपद्रवियों की सूची के आधार पर तलाशी अभियान चलाया। जहां बीजेपी ने इसे ‘कानून का राज’ बताया, वहीं अखिलेश यादव और महुआ मोइत्रा जैसे नेताओं ने उन्हें “बीजेपी एजेंट” और “उत्तर प्रदेश का एनकाउंटर स्पेशलिस्ट” कहकर हमला बोला।
चुनाव आयोग का कड़ा एक्शन: प्रशासनिक फेरबदल और शर्मा का समर्थन
मतदान के दिन एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम ने इस विवाद को नया मोड़ दे दिया। चुनाव आयोग ने फलटा के संयुक्त खंड विकास अधिकारी (Joint BDO) सौरव हाजरा का तबादला कर दिया और उनकी जगह रम्या भट्टाचार्य को नियुक्त किया। इसके अलावा, दक्षिण 24 परगना के एडीएम भास्कर पाल और बीरभूम के एडीएम सौविक भट्टाचार्य को भी चुनावी ड्यूटी से हटा दिया गया। समर्थकों का दावा है कि ये तबादले इसलिए हुए क्योंकि अधिकारी अजय पाल शर्मा के साथ सहयोग नहीं कर रहे थे। आयोग का यह कदम दर्शाता है कि शर्मा की सख्ती व्यक्तिगत नहीं थी, बल्कि उसे संस्थागत समर्थन प्राप्त था।
आंख और कान या सक्रिय हाथ-पैर? पर्यवेक्षक की भूमिका पर बहस
आलोचकों का तर्क है कि पर्यवेक्षक केवल चुनाव आयोग की “आंख और कान” होते हैं, उन्हें पुलिस की तरह “हाथ-पैर” नहीं चलाना चाहिए। लेकिन शर्मा के समर्थकों का कहना है कि अगर आंखें अपराध देखें और हाथ उसे रोकने के लिए न बढ़ें, तो निगरानी बेमानी है। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने पहले ही चुनाव प्रक्रिया के बीच में शर्मा की नियुक्ति में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट में यह मामला न केवल एक अधिकारी के भविष्य का फैसला करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात 95 अन्य पर्यवेक्षक भविष्य में सख्ती दिखाने की हिम्मत करेंगे या नहीं।































