भारत के केंद्रीय बैंक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा सोने का भंडार बेचने की खबर आखिरकार गलत साबित हुई। वित्तीय समाचार एजेंसी ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट वापस ले ली है और माना है कि उसकी गणना में गलती हुई थी, जिसके कारण यह गलत निष्कर्ष निकाला गया था कि RBI ने अपने सोने के भंडार का कुछ हिस्सा बेच दिया है।
RBI ने इस दावे को सख्ती से खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि उसने कोई सोना नहीं बेचा है। केंद्रीय बैंक के अनुसार, उसके पास मौजूद भौतिक सोने का भंडार अब भी 880.52 मीट्रिक टन है और इसमें कोई कमी नहीं आई है। RBI ने यह भी कहा कि उसके विदेशी मुद्रा भंडार और सोने से जुड़े आंकड़ों के लिए उसकी मासिक बुलेटिन (Monthly Bulletin) ही आधिकारिक और भरोसेमंद स्रोत है।
रिपोर्ट वापस लिए जाने से पहले ही प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) की फैक्ट-चेक टीम ने इसे गलत बताया था। PIB ने RBI के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा था कि सोने के भंडार में कोई गिरावट नहीं आई है। उल्टा, भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़ी है। यह सितंबर 2025 में 13.92 प्रतिशत थी, जो 22 मई 2026 तक बढ़कर 16.85 प्रतिशत हो गई।
गलती रिपोर्ट की व्याख्या में नहीं, बल्कि गणना के तरीके में थी। ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स ने RBI के सोने के भंडार का मूल्यांकन करने के लिए घरेलू बाजार में उसी दिन के सोने के दाम का इस्तेमाल किया, जबकि इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य लंदन बुलियन मार्केट एसोसिएशन (LBMA) के मानक मूल्य का उपयोग किया जाना चाहिए था।
यही एक गलती पूरे निष्कर्ष को गलत साबित करने के लिए काफी थी। जैसे ही सही मानक के आधार पर दोबारा गणना की गई, RBI द्वारा सोना बेचने का दावा पूरी तरह खत्म हो गया।
इसके बाद ब्लूमबर्ग ने आधिकारिक रूप से अपनी रिपोर्ट वापस लेते हुए माना कि मूल्यांकन पद्धति में हुई गलती के कारण गलत निष्कर्ष निकला था।
हालांकि, तब तक यह खबर सोशल मीडिया और वित्तीय जगत में काफी फैल चुकी थी। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कई लोगों ने ध्यान दिलाया कि गलत खबर बहुत तेजी से वायरल हो गई, जबकि उसका खंडन और सुधार उतनी तेजी से लोगों तक नहीं पहुंच पाया।
यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल बन गया है। समस्या सिर्फ गलत रिपोर्ट नहीं थी, बल्कि यह भी थी कि सुधार आने से पहले वह कितनी दूर तक पहुंच चुकी थी।
इस घटना ने यह भी दिखाया कि वैश्विक वित्तीय संस्थानों की रिपोर्टें कितनी तेजी से राजनीतिक और आर्थिक बहस का हिस्सा बन जाती हैं। एक बार कोई दावा सार्वजनिक चर्चा में जगह बना लेता है, तो बाद में उसके गलत साबित होने के बावजूद उसका प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं होता।
ब्लूमबर्ग ने अब तक अपनी संपादकीय प्रक्रिया या रिपोर्ट प्रकाशित होने के समय को लेकर उठे सवालों पर सार्वजनिक रूप से कोई विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं दी है।
लेकिन एक बात साफ है—RBI ने कोई सोना नहीं बेचा, उसके सोने का भंडार पहले जैसा ही है, और पूरी रिपोर्ट एक गलत मूल्यांकन पद्धति पर आधारित थी।
इस पूरे मामले से यह भी पता चलता है कि आज के दौर में गलत जानकारी बहुत तेजी से फैल जाती है, जबकि सही जानकारी और सुधार लोगों तक पहुंचने में अधिक समय लेते हैं। और यही इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।

































