इजरायल के आम चुनाव के बाद अब सियासी लड़ाई सिर्फ सरकार बनाने तक सीमित नहीं रह गई है। चुनाव में विदेशी दखल, कथित तौर पर पैसे देकर वोटरों को प्रभावित करने और अरब समुदाय में मतदान बढ़ाने के लिए विदेशी फंडिंग के आरोपों ने विवाद खड़ा कर दिया है। इजरायल की आंतरिक सुरक्षा एजेंसी शिन बेट को इन आरोपों की जांच करने का निर्देश दिया गया है। हालांकि, अभी तक सार्वजनिक रूप से ऐसा कोई निर्णायक सबूत सामने नहीं आया है, जिससे यह साबित हो कि किसी विदेशी देश ने चुनाव को प्रभावित किया या अरब पार्टियों ने विदेशी मदद से वोट खरीदे।
विवाद ऐसे समय में बढ़ा है, जब प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाला गठबंधन और विपक्ष—दोनों ही सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत से पीछे दिखाई दे रहे हैं। आंशिक चुनावी नतीजों में अरब पार्टियों की बढ़ी ताकत उन्हें सरकार गठन की राजनीति में अहम बना रही है। इसी बीच विदेशी हस्तक्षेप के आरोपों ने चुनावी नतीजों और अरब पार्टियों के साथ संभावित गठबंधन को लेकर बहस तेज कर दी है।
शिन बेट को जांच का आदेश क्यों दिया गया?
इजरायल की सेंट्रल इलेक्शन कमेटी के अध्यक्ष और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश नोआम सोलबर्ग ने शिन बेट प्रमुख डेविड जिनी से मुलाकात के बाद चुनाव में विदेशी हस्तक्षेप के संदेह की जांच का निर्देश दिया। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, जिनी ने उन्हें ऐसी खुफिया जानकारी दी थी, जिसके आधार पर विदेशी संस्थाओं की संभावित भूमिका की जांच जरूरी मानी गई।
सोलबर्ग ने अपने पत्र में कहा कि उनके संज्ञान में विदेशी संस्थाओं की फंडिंग के जरिए चुनाव को अनुचित तरीके से प्रभावित करने के गंभीर संदेह आए हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह इन संदेहों की सत्यता की पुष्टि नहीं कर सकते, लेकिन विदेशी तत्वों से जुड़े होने के कारण उनकी गहन जांच जरूरी है। उन्होंने शिन बेट से एक सप्ताह के भीतर निष्कर्ष प्रस्तुत करने को कहा।
रिपोर्टों के अनुसार, जांच से जुड़ी जानकारी मतदान से पहले भी सुरक्षा एजेंसियों के पास थी। एक सुरक्षा सूत्र ने बताया कि पिछले दो सप्ताह के दौरान ठोस खुफिया सूचनाओं के आधार पर जांच शुरू की गई थी। हालांकि, जांच शुरू होना अपने आप में किसी अपराध के साबित होने का प्रमाण नहीं है।
2. कतर और तुर्किये का नाम क्यों आ रहा है?
इजरायली मीडिया की रिपोर्टों में आरोप लगाया गया है कि कतर और तुर्किये से जुड़ी संस्थाएं अरब समुदाय में मतदान बढ़ाने के लिए काम करने वाले समूहों को फंडिंग दे सकती थीं। इन समूहों के जरिए मतदाताओं को मतदान केंद्रों तक पहुंचाने के प्रयासों को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
3. क्या चुनाव में वोट खरीदने के आरोप भी लगे हैं?
विदेशी हस्तक्षेप की जांच से अलग, चुनाव के दिन अरब पार्टी रा’म (Ra’am) के कथित समर्थकों के खिलाफ वोट खरीदने के आरोपों की जांच भी शुरू हुई। पुलिस ने 27 अक्टूबर को दक्षिणी इजरायल के बेदुइन समुदाय के तीन लोगों को गिरफ्तार किया था। पुलिस के अनुसार, उनके पास से हजारों शेकेल की नकदी वाले लिफाफे और चुनाव से जुड़ी सामग्री मिली थी। संदेह था कि मतदाताओं को रा’म के पक्ष में वोट देने के लिए पैसे दिए जाने थे।
29 अक्टूबर को पुलिस ने इस कथित योजना के संबंध में चार और लोगों की गिरफ्तारी की जानकारी दी। रा’म ने आरोपों से इनकार किया और कहा कि उसके कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जा रहा है। गिरफ्तार लोगों की गिरफ्तारी या हिरासत जांच का हिस्सा है; इससे आरोप अपने आप साबित नहीं हो जाते।
इजरायल पुलिस ने कहा है कि चुनाव की निष्पक्षता से जुड़े हर आरोप की जांच की जाएगी। इससे पहले पुलिस ने व्यापक चुनावी धांधली के दावों के समर्थन में पर्याप्त सबूत न होने की बात भी कही थी।
यहां दो अलग-अलग जांचों को मिलाकर नहीं देखना चाहिए। एक मामला कथित वोट खरीदने का है, जबकि दूसरा विदेशी संस्थाओं के जरिए चुनाव को प्रभावित करने के संदेह से जुड़ा है। पुलिस के एक अधिकारी के हवाले से आई रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों जांचों के बीच कोई स्थापित संबंध नहीं है।
4. नेतन्याहू की पार्टी इस विवाद को राजनीतिक मुद्दा क्यों बना रही है?
सत्तारूढ़ लिकुड पार्टी ने विदेशी हस्तक्षेप की जांच को अरब पार्टियों के साथ गठबंधन की संभावना पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल किया है। पार्टी का आरोप है कि विदेशी तत्वों ने इजरायल की संसद को प्रभावित करने की कोशिश की और अरब पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाने का प्रयास खतरनाक होगा।
लिकुड ने इस विवाद को ‘Ra’amgate’ नाम देते हुए चुनाव में अरब पार्टियों की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-ग्विर ने भी कथित कतर फंडिंग से जुड़े नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है, बशर्ते गिरफ्तारी के लिए कानूनी आधार मौजूद हों।
दूसरी ओर, विपक्षी नेता गादी आइजेनकोट ने कहा है कि चुनाव में विदेशी दखल के आरोपों की पूरी जांच होनी चाहिए, लेकिन राजनीतिक दलों को इस जांच का इस्तेमाल संसद के नए सदस्यों के शपथ ग्रहण में देरी कराने के लिए नहीं करना चाहिए। इस तरह विवाद अब केवल सुरक्षा एजेंसियों की जांच नहीं, बल्कि सरकार गठन और राजनीतिक वैधता की लड़ाई का हिस्सा भी बन गया है।
5. अरब पार्टियों की बढ़ी ताकत से क्यों बढ़ी राजनीतिक चिंता?
इस विवाद की पृष्ठभूमि समझने के लिए चुनावी गणित देखना जरूरी है। इजरायल की संसद को नेसेट कहा जाता है और इसमें कुल 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन चाहिए।
29 अक्टूबर को उपलब्ध आंशिक नतीजों के अनुसार:
नेतन्याहू के दक्षिणपंथी और धार्मिक दलों के गठबंधन को करीब 53 सीटें मिलने का अनुमान था।
गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी खेमे को करीब 48 सीटें मिलती दिखाई दे रही थीं।
अरब नेतृत्व वाली दो पार्टियों—जॉइंट लिस्ट और रा’म—को मिलाकर करीब 19 सीटें मिलने का अनुमान था।
ये आंकड़े अंतिम नतीजे नहीं, बल्कि मतगणना के दौरान सामने आए अनुमान हैं। फिर भी, इनसे स्पष्ट है कि दोनों प्रमुख खेमे अपने दम पर बहुमत से दूर थे। अरब पार्टियों का संयुक्त समर्थन विपक्ष के लिए सरकार बनाने का रास्ता खोल सकता है, लेकिन कई विपक्षी दलों ने उनके साथ सरकार बनाने या उनका समर्थन लेने पर आपत्ति जताई है।
6. आगे क्या होगा?
अब जांच एजेंसी को यह पता लगाना है कि विदेशी फंडिंग से जुड़े संदेहों के पीछे ठोस सबूत हैं या नहीं। साथ ही, कथित वोट खरीदने के मामलों में पुलिस को यह साबित करना होगा कि क्या वास्तव में मतदाताओं को पैसे देने की कोशिश की गई थी और इसके पीछे कौन लोग थे।
राजनीतिक मोर्चे पर राष्ट्रपति इसाक हर्जोग को दलों से विचार-विमर्श के बाद सरकार बनाने के लिए किसी नेता को आमंत्रित करना होगा। यदि कोई गठबंधन 61 सांसदों का समर्थन जुटाने में सफल नहीं होता, तो देश में लंबे राजनीतिक गतिरोध या नए चुनाव की स्थिति बन सकती है।


































