कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार चुनाव आयोग पर चुनाव में गड़बड़ी के आरोप लगा रहे हैं। वह मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी कर चुके हैं। इसी बीच पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में 1988 में हुए एक बड़े चुनावी बदलाव की चर्चा फिर शुरू हो गई है। यह बदलाव मतदान की न्यूनतम उम्र 21 साल से घटाकर 18 साल करने से जुड़ा है।
इस फैसले के तहत संविधान के 61वें संशोधन के जरिए युवाओं को वोट देने का अधिकार दिया गया था। हालांकि, इस संशोधन को संसद में कम समय में पारित किए जाने को लेकर अब राजनीतिक बहस हो रही है।
संसद में तेजी से पारित हुआ था विधेयक
संविधान का 61वां संशोधन विधेयक 13 दिसंबर 1988 को लोकसभा में पेश किया गया था। लोकसभा में इस पर 14 और 15 दिसंबर को चर्चा हुई और इसे पारित कर दिया गया। इसके बाद 20 दिसंबर 1988 को राज्यसभा ने भी इसे मंजूरी दे दी। राष्ट्रपति की स्वीकृति 28 मार्च 1989 को मिली।
इस तरह लोकसभा ने विधेयक पर विचार करने और उसे पारित करने की प्रक्रिया कम समय में पूरी की थी। हालांकि, पूरी संसदीय प्रक्रिया केवल दो दिनों में समाप्त नहीं हुई थी।
3.57 करोड़ युवाओं को मिला वोट देने का अधिकार
मतदान की उम्र 21 साल से घटाकर 18 साल करने का फैसला भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़ा बदलाव था। निर्वाचन आयोग के ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार, नवंबर 1989 के लोकसभा चुनाव से पहले 18 से 21 साल की उम्र के करीब 3.57 करोड़ लोगों को मतदाता सूची में शामिल किया गया था।
इस फैसले से बड़ी संख्या में युवाओं को अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार मिला। इसे देश में मतदान के अधिकार का विस्तार करने वाले महत्वपूर्ण कदमों में गिना जाता है।
फैसले के पीछे राजनीतिक फायदे की चर्चा
कुछ आलोचकों का मानना है कि 1989 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले मतदान की उम्र घटाने के फैसले के पीछे राजनीतिक गणना भी हो सकती थी। उस समय राजीव गांधी की सरकार को कई राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। वी.पी. सिंह जैसे प्रमुख नेताओं के कांग्रेस से अलग होने के बाद राजनीतिक स्थिति भी बदल रही थी।
हालांकि, केवल चुनाव से पहले कानून बनाए जाने के आधार पर यह साबित नहीं होता कि इसका उद्देश्य कांग्रेस को चुनावी फायदा पहुंचाना था।
1984 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 414 सीटें मिली थीं, लेकिन 1989 के चुनाव में उसकी सीटें घटकर 197 रह गईं। इसके बाद वी.पी. सिंह के नेतृत्व में नेशनल फ्रंट की सरकार बनी। इससे यह स्पष्ट है कि मतदान की उम्र घटाने के फैसले से कांग्रेस की चुनावी जीत सुनिश्चित नहीं हुई थी।
राहुल गांधी के आरोपों से कैसे जुड़ा मामला?
राहुल गांधी मौजूदा समय में चुनाव आयोग पर मतदाता सूची में गड़बड़ी के आरोप लगा रहे हैं। उन्होंने विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं। 11 अक्टूबर को उन्होंने 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकालने और मुख्य न्यायाधीश को ज्ञापन सौंपने की बात कही थी।
यहां दोनों मामलों में अंतर समझना जरूरी है। 1988 का संविधान संशोधन मतदान की न्यूनतम उम्र घटाकर अधिक लोगों को वोट देने का अधिकार देने से जुड़ा था। वहीं, एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूचियों की जांच और संशोधन करना है। इसलिए दोनों प्रक्रियाओं को एक जैसा नहीं माना जा सकता। राजीव गांधी के कार्यकाल में विधेयक जल्दी पारित होने का उदाहरण अपने आप में मौजूदा चुनावी गड़बड़ी के आरोपों को सही या गलत साबित नहीं करता।
लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी
इस मुद्दे पर बहस करने वालों का कहना है कि चुनाव से जुड़े फैसलों की जांच एक समान मानकों पर होनी चाहिए। मौजूदा चुनाव आयोग के कामकाज पर सवाल उठाने के साथ-साथ पहले की सरकारों के फैसलों की भी समीक्षा की जा सकती है।
हालांकि, किसी कानून को केवल तेजी से पारित किए जाने के आधार पर लोकतांत्रिक या गैर-लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता। यह देखना जरूरी है कि कानून के प्रावधान क्या हैं, उसे कैसे लागू किया गया और उसका लोगों के अधिकारों पर क्या असर पड़ा।
आखिरकार, लोकतंत्र में मतदाता के अधिकारों की रक्षा, चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और जनता का भरोसा सबसे महत्वपूर्ण हैं। चुनाव से जुड़े किसी भी फैसले को उसकी कानूनी प्रक्रिया, उपलब्ध सबूतों और वास्तविक प्रभाव के आधार पर परखा जाना चाहिए, चाहे उसे किसी भी राजनीतिक दल की सरकार ने लागू किया हो।
































