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फ़िल्मों में ‘भारतीयता’ साधने का लक्ष्य यानि ‘भारतीय चित्र साधना’

Abhishek Singh Rao द्वारा Abhishek Singh Rao
2 March 2020
in चलचित्र
‘भारतीय चित्र साधना’
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भारतीय चित्र साधना

भारतीय सिनेमा को लेकर वर्तमान में एक व्यापक सोच बनी है कि इस इंडस्ट्री ने अपनी जड़ों से जुड़ाव खो दिया है। अधिकतर फ़िल्मो में बेईमानी है, झूठ है, प्रोपेगेंडा है, एक खास तरह का नैरेटिव गढ़ने की कोशिश है, फिर भी इसपर कोई कुछ बोल नहीं रहा और बोलता भी है तो उसे अलग-थलग कर दिया जाता है। भारतीय फ़िल्मों में मौजूदा दृश्य को देखकर एक बैचीनी होती है जिसके समाधान के रूप में एक नए नाम ने दस्तक दी है भारतीय चित्र साधना , वैसे यह नाम उतना नया भी नही है लेकिन अहमदाबाद में हुए तीन दिवसीय भव्य ‘शॉर्ट फ़िल्म फ़ेस्टिवल’ के बाद इस नाम ने विशेष ध्यान खींचा है।

प्रसून जोशी, सुभाष घई, मनोज जोशी, अब्बास-मस्तान, सीमा बिस्वास, दिलीप शुक्ला, मिहिर भुता, अभिषेक जैन, पारुल बोस, मेहुल मेहुल सुर्ती, मिखिल मुसाले, जैसे  फ़िल्म जगत से जुड़े बड़े नामों को अहमदाबाद के प्रांगण तक खींच लाना इस नाम के विराट-स्वरुप का अहसास दिलाता है।

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इसके अलावा प्रत्येक स्क्रीनिंग एवं मास्टर क्लासेज में भारत के कोने-कोने से जनता का जो हाउस-फुल रिस्पांस मिला है इससे फ़िलहाल तो अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है कि आने वाले समय में इस मंच की लोकप्रियता पर इसका प्रभाव क्या रहेगा!

इसी दौरान गुजरात के मुख्यमंत्री श्री विजय रुपाणी, शिक्षा मंत्री श्री भूपेंद्र सिंह चुडासमा, मनसुख मंडाविया, जैसे राजनैतिक महानुभावों ने भी ‘भारतीय चित्र साधना’ के  मंच पर दस्तक दी। इसी मंच से ही विजय रुपाणी ने गुजरात में फ़िल्म इंस्टिट्यूट की नींव रखने हेतु सरकार की इच्छा को जनता के समक्ष रखा।

‘भारतीय चित्र साधना’ का परिचय

 

‘भारतीय चित्र साधना’ यह नाम 6 वर्ष पहले अस्तित्व में आया और इसके बैनर तले हर दो वर्षों में ‘चित्रभारती नेशनल शॉर्ट फ़िल्म फ़ेस्टिवल’ का आयोजन होता है। पहला फ़िल्म फ़ेस्टिवल 2016 में इंदौर में हुआ था, दूसरा 2018 में दिल्ली में हुआ और इस बार हाल ही में अहमदाबाद में इसका समापन हुआ।

‘भारतीय चित्र साधना’ की रिसेप्शन कमिटी में अब तक सुभाष घई, मधुर भंडारकर, प्रियदर्शन, हेमा मालिनी, विवेक अग्निहोत्री, अन्नू कपूर, हंस राज हंस, विक्टर बनर्जी, रवि किशन, अभिषेक शाह, पल्लवी जोशी, मालिनी अवस्थी, जैसे दिग्गज जुड़ चुके हैं।

साल दर साल, जिस क़दर फ़िल्मी जगत के बड़े नाम  एवं फ़िल्मो में रूचि रखने वाले युवा ‘भारतीय चित्र साधना’ के साथ जुड़ रहे हैं, यह उन लोगों के लिए चिंता का विषय हो सकता है जो मन में यह ठान कर बैठे थे कि वो जो दिखाना चाहते हैं, जनता भी वही पसंद करती है और भारत का दर्शन भी वही है जो उनकी फ़िल्मों के जरिए लोगों तक पहुँच रहा है!

 

दिल्ली में हुए ‘चित्र भारती फिल्म फेस्टिवल’ के दौरान हिंदी सिनेमा के मशहूर व्यक्तित्व अर्जुन रामपाल ने कहा था कि “भारत एक ऐसा देश है जो दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्में बनाता है लेकिन फिर भी ऑस्कर की दौड़ में हम पिछड़ जाते हैं, क्यों? क्योंकि हम अपनी समस्याओं या अपनी संस्कृति पर फोकस करने की बजाय विदेशी फिल्मों के वातावरण की नक़ल करते हैं और आप सब जानते हैं नक़ल को पुरस्कार नहीं मिलता!”

भारतीय फ़िल्मो ने ‘भारतीयता’ का  नाश हो रहा है!

एक कलाकार होने के साथ-साथ विश्व पटल पर भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली पद्म श्री प्रियंका चोपड़ा बड़ी आसानी से ‘क्वांटिको’ के उस किरदार को स्वीकार कर लेती हैं जहाँ ‘भारतीय राष्ट्रवाद’ को आतंकी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ जैसी फिल्मों में  भारत को केवल एक ग़रीब मुल्क के तौर पर प्रोजेक्ट किया जाता है।

हॉलीवुड तो ठीक है लेकिन हमारे ही देश में हर दूसरी-तीसरी फ़िल्म में उन चीज़ों को दिखाया जा रहा है जो या तो विदेशी संस्कृति से प्रभावित हैं  या हमारी संस्कृति के ख़िलाफ़ हैं। महिलाओं को मात्र सेक्स ऑब्जेक्ट की तरह प्रस्तुत किया जाना, हिंसा, गाली-गलौच, यह सब आज आम बातें हो चुकी है। नेटफ्लिक्स और अमेज़न प्राइम के दौर में ये काम और सहूलियत से हो रहा है।

इन चीज़ों को देख कर कहीं ना कहीं आपको भी लगता होगा कि भारतीय सिनेमा में ‘भारतीयता’ अथवा भारतीय संस्कृति का प्रमाण धीरे-धीरे ख़त्म होने के कगार पर है या ख़त्म हो चुका है!

जनता की पसंद तय करने का ठेका किसने दिया?

कुछ समय पहले एक फिल्म आई थी, नाम था ‘मोहल्ला अस्सी’। जब पहली बार इसका ट्रेलर आया तो इसमें शिवजी के किरदार को गाली देते हुए दिखाया गया था। इस पर लोगों ने खूब आक्रोश व्यक्त किया, फिल्म के करता-धरताओं को कटघरे में खड़ा किया, बवाल हुए और आख़िर दिल्ली हाईकोर्ट ने फ़िल्म के रिलीज़ पर रोक लगा दी। कुछ समय बाद फ़िल्म में विवादित दृश्यों को हटाकर पुनः रिलीज़ किया गया लेकिन तब तक इंटरनेट पर यह फ़िल्म लीक हो चुकी थी, जिसको जो देखना-सुनना था सबने देख लिया था!

‘मोहल्ला अस्सी’ के विवाद के दौरान मैं एक टीवी डिबेट देख रहा था, जिसमें कुछ धर्म गुरु थे जो शिवजी के किरदार को गाली वाले दृश्य पर सवाल उठा रहे थे वहीं फिल्म के करता-धरता कह रहे थे “हम क्या करें यदि लोगों को यही देखना पसंद है तो! हम तो वैसा ही दिखाएँगे जैसा वे चाहते हैं!”

भारत की जनता को मनोरंजन के नाम पर इस तरह का कंटेंट परोसना और साथ में सीना ठोककर यह कहना कि “हम तो वैसा ही दिखाएँगे जैसा लोग चाहते हैं!” यह सोचने पर विवश करता है कि जनता की पसंद तय करने का ठेका इन लोगों को किसने दिया?

वह व्यक्ति जिस अतिवाद से जनता की पसंद का दावा कर रहा था शायद उसी का सबूत है कि आज भारतीय फ़िल्मों ने भारतीयता से अपना जुड़ाव खो दिया है।

असल संस्कृति बनाम फ़िल्मों में दिखाई जाने वाली संस्कृति और उसका प्रभाव

यूँ लगता है मानो असल भारतीय संस्कृति के समानांतर वातानुकूलित कमरों में  बैठकर मुठ्ठीभर लोग एक काल्पनिक भारतीय दर्शन करवा रहे हैं जिसका वास्तविकता से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं!

उदाहरण के लिए, भारतीय संस्कृति में नारीवाद का एक महत्वपूर्ण स्थान है जहाँ इस बात पर ज़ोर दिया जाता रहा है कि एक स्त्री का स्त्रीत्व बना रहे और उसे  हर वह अवसर मिले जिसकी उसे जरुरत है ,लेकिन जब हम बड़े परदे पर नारीवाद को देखते हैं तब मुख्यतः ‘भारतीय संस्कृति’ को नारीवाद के ख़िलाफ़ प्रोजेक्ट किया जाता है। साथ ही फ़िल्मी नारीवाद को पुरुषों की तरह दिखने, मनचाहे व्यक्ति के साथ सो जाने, शराब पीने एवं गाली-गलौच करने से जोड़ कर सिमित कर दिया जाता है!

दरअसल, यह एक गंभीर समस्या है क्योंकि चाहे-अनचाहे फ़िल्मो का प्रभाव भारतीय जनता पर सबसे अधिक है। सुबह उठने से लेकर रात को सोने के बीच हमारे बोलने, हमारे भोजन, पहनावे, मनोरंजन सभी पर फ़िल्मो का प्रभाव साफ देखा जा सकता है। और जिस प्रकार से इस प्रभाव ने नकारात्मकता का दामन पकड़ा है, आज के समय में  यह चिंता का विषय है जिसकी तुलना किसी अप्रत्यक्ष-आतंकवाद से करना भी गलत नहीं लगता!

भारतीय सिनेमा-जगत से जुड़े वायरस की दवा है ‘भारतीय चित्र साधना’

भारतीय चित्र साधना Festival

मुझे लगता है कि अधिकतर भारतीय फ़िल्मों में जिस भारतीयता को दिखाया जा रहा है वह एक वैचारिक-वासना है जिसे जल्दबाज़ी है पश्चिमी संस्कृति के समक्ष खड़े रहने की, उनके जैसे दिखने की, उनके जैसे बोलने की।

इस वासना का दबाव समझें या इसके लालन-पालन का प्रभाव कि ‘तलवारों पे सर वार दिए, अंगारों में जिस्म जलाया है…!’ जैसे शब्दों के सामने ‘तू नंगा ही तो आया है, क्या घंटा लेकर जाएगा…’ को 2019 के सबसे अच्छे बोल के रूप में मान्यता मिलती है!

खैर, तमाम समस्याएं हैं लेकिन ख़ुशी है कि अब इससे निपटने हेतु सीना तान के खड़ा है ‘भारतीय चित्र साधना’ का मंच।

भारतीय चित्र साधना एक पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट है जिसके ट्रस्टीज का मानना है कि ‘इस देश में सिनेमा यह विचारों को व्यक्त करने का बहुत बड़ा माध्यम है इसलिए इस देश को जो-कुछ चाहिए, इस देश की संस्कृति से जो-कुछ पैदा होता है, इस देश का जो मूल विचार है, इस देश की सांस्कृतिक एवं भाषाई बहुलता, इत्यादि को इस माध्यम में एक बड़ा स्थान मिलें। साथ ही इस क्षेत्र से जुड़े देशभर में जो सुस्थित एवं नए लोग हैं, दोनों को प्रोत्साहन मिलें।’

भारतीय चित्र साधना के फाउंडर प्रेसिडेंट अलोक कुमार जी का कहना है “भारतीय चित्र साधना, भारतीय फ़िल्मो में भारतीयता को लेकर काम कर रहा है। यह  पूरे देश की तमाम संस्कृतिओं, तमाम भाषा-बोलियों को जोड़ने वाला मंच है। अपनी फ़िल्मो में अपनी संस्कृति और स्वभाव, अपनी समस्याएं और चुनौतियाँ, साथ में उनका अपना हल हो, ऐसी इच्छा फ़िल्म बनाने वाले बहुत लोगो में थी और जब हमने इस विषय पर पुकार लगाई तो वे सभी लोग सक्रीय होकर हमारे साथ आ गए।”

दिल्ली में हुए फ़िल्म फेस्टिवल के दौरान भारतीय चित्र साधना के भविष्य के प्रयोजन पर बात करते हुए अलोक कुमार जी ने कहा था कि “‘भारतीय चित्र साधना’ भारत के प्रत्येक राज्यों में एक फिल्म सोसाइटी खड़ी करेगी। भारतीय चित्र साधना से हम कोशिश करेंगे कि प्रथम चरण में हम बड़े जिलों तक जाएँ जहाँ हर हफ्ते एक बार इकट्ठा होकर उनकी अपनी भाषा की फ़िल्म, एक दूसरी भाषा की फ़िल्म, एक विदेशी भाषा की फ़िल्म दिखाई जाये और उस पर चर्चा भी हो!”

 

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