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EU में फूट के आसार, फ्रांस और जर्मनी ने पकड़ी अपनी-अपनी राह

जानिए, आखिर किन मुद्दों पर है दोनों के बीच भारी मतभेद, जो बदल सकते हैं वैश्विक राजनीति!

Vikrant Thardak द्वारा Vikrant Thardak
1 December 2020
in यूरोप
EU
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मौजूदा वैश्विक, राजनीतिक और भू-राजनीतिक चुनौतियों के बीच क्या यूरोपियन यूनियन बिखर सकता है? Brexit के बाद दुनिया ने यह भली-भांति देखा है कि यूरोपियन यूनियन के “यूनियन” में कई गंभीर समस्याएँ हैं। हालांकि, स्थिति पर गौर किया जाये तो EU के सामने अभी और ज़्यादा बड़ी दिक्कतें पेश आ सकती हैं, और इसका कारण होगा फ्रांस और जर्मनी जैसे दो महत्वपूर्ण देशों की वैश्विक मुद्दों पर अलग-अलग राय!

फ्रांस और जर्मनी EU के सिर्फ दो सदस्य देश ही नहीं हैं, बल्कि इन्हें संगठन की “जान” या “इंजिन” कहा जाता है। EU की स्थापना में भी इन दो देशों की ही सबसे बड़ी भूमिका रही थी। विश्व युद्ध के दौर के बाद और शीत युद्ध के दौरान जर्मनी और फ्रांस ने आपसी दुश्मनी भुलाकर एक दूसरे के साथ मिलकर आगे बढ़ने का ही फैसला लिया था। हालांकि, अब जब US और USSR के बीच शीत युद्ध समाप्त हो चुका है और अब जब US और चीन के बीच एक नया शीत युद्ध जन्म लेता दिखाई दे रहा है, ऐसे में फ्रांस और जर्मनी वैश्विक मुद्दों पर अलग-अलग रास्ते अपनाते दिखाई दे रहे हैं। यही एक बड़ा कारण है कि आने वाले दिनों में EU और बड़ी समस्याओं का सामना कर सकता है।

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उदाहरण के लिए “चीन के खतरे” से ही शुरुआत करते हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति Macron खुलकर चीन विरोधी रुख अपना चुके हैं। यहाँ तक कि वे Indo-Pacific रणनीति के तहत भारत और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर एक नए गठबंधन बनाने की बात भी कर चुके हैं। ज़ाहिर है कि फ्रांस आज चीन को सबसे बड़े खतरे के रूप में देखता है और इसीलिए उसका ध्यान Indo-Pacific पर केन्द्रित है। दूसरी ओर चांसलर एंजेला मर्कल आज भी रूस के साथ अपने “लगाव” को खत्म नहीं कर पाई हैं। आज भी वे रूस पर ही प्रतिबंध लगाना चाहती हैं और चीन के साथ अपने आर्थिक सम्बन्धों को मजबूत करना चाहती हैं। हालिया समय में उनके रुख में थोड़ा बदलाव ज़रूर देखने को मिला है, लेकिन यह बात किसी से छुपी नहीं है कि जर्मनी और चीन आर्थिक तौर पर एक दूसरे के बेहद करीब रह चुके हैं।

इसी प्रकार अमेरिका-EU के बीच सम्बन्धों के मुद्दे पर भी दोनों देशों एक दूसरे के उलट राय रखते हैं। फ्रांस का मानना है कि यूरोप के देशों को पहले खुद सुरक्षा और आर्थिक तौर पर मजबूत और आत्म-निर्भर होना होगा और फिर अमेरिका के साथ अपने सम्बन्धों के समीकरणों को तय करना होगा, वहीं बाइडन के आने के बाद मर्कल दोबारा इस बात की आस लगाए बैठीं हैं कि अमेरिका का सारा ध्यान दोबारा EU और NATO को सशक्त करने पर केन्द्रित होगा! इस मुद्दे पर Macron एक बयान देकर कह चुके हैं “अमेरिका अपने साथियों का सम्मान तभी करेगा, अगर हम अपनी सुरक्षा के प्रति सजग और आत्म-निर्भर होंगे।”

ठीक इसी प्रकार आतंकवाद और इस्लामिक कट्टरपंथ के मुद्दे पर दोनों देश अलग-अलग राय रखते दिखाई देते हैं। उदाहरण के लिए दोनों देशों की तुर्की को लेकर नीति को ही देख लीजिये! Macron जहां एक तरफ पूर्वी भूमध्य सागर, Nagorno-Karabakh और लीबिया में तुर्की के प्रभाव को कम से कम करना चाहते हैं और तुर्की को कट्टरपंथ फैलाने के लिए उत्तरदायी ठहराना चाहते हैं, तो वहीं बर्लिन सिर्फ बयानबाज़ी करने तक ही सीमित रहा है। साइप्रस, ग्रीस और इटली जैसे EU के सदस्य देशों को तुर्की की ओर से सीधी धमकी मिलने के बाद भी जर्मनी तुर्की के खिलाफ कोई बड़ा कदम उठाने में असमर्थ सिद्ध हुआ है।

जर्मनी और फ्रांस एक सफल साझेदारी निभा चुके हैं, और पूर्व में दोनों देशों की सरकारों के पास ऐसा करने के लिए मौके उपलब्ध भी थे। हालांकि, आज दोनों देशों की विदेश नीति ठीक उल्टी दिशाओं में जाती दिखाई दे रही है। Macron और मर्कल ने अब तक इस बात को सुनिश्चित किया है कि दोनों देशों के मतभेद खुले में ना आयें, लेकिन यह कभी भी बदल सकता है। फ्रांस और जर्मनी के बीच रिश्तों में अगर कोई भी टकराव पैदा होता है, तो उसका असर पूरे यूरोप पर पड़ना तय है।

Tags: EUजर्मनीफ्रांस
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