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PM मोदी के 7 साल: Covid -19 के कारण भारत क्या बन सकता था और PM मोदी ने भारत को क्या बना दिया

मोदी सरकार ने पिछले 7 सालों में किए कई बदलाव!

Shikhar Srivastava द्वारा Shikhar Srivastava
31 May 2021
in मत
भारत आर्थिक विकास

PatnaDaily

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भारत सरकार ने आर्थिक मोर्चे पर पिछले सात सालों में जो बदलाव किए हैं उसने भारत की अर्थव्यवस्था को कई मायने में क्रांतिकारी रूप से बदल दिया है। इन बदलावों को वर्षों पहले होना चाहिए था, वाजपेयी सरकार में इनमें से कुछ बदलाव करने के प्रयास भी हुए, लेकिन बहुमत न होने के कारण वह प्रयास अधूरे रहे। उसके बाद कांग्रेस नित UPA ने सारे परिवर्तनों को ठंडे बस्ते में डाल दिया।

भारत में बिचौलियों, सरकारी तंत्र और व्यापारियों की मिलीभगत, मजदूर यूनियन की दादागिरी, आर्थिक क्रिया कलाप का सर्वेक्षण न होना, ये ऐसी समस्याएं थी, जिन्हें कांग्रेस हाथ नहीं लगाना चाहती थी, लेकिन मोदी सरकार ने वोटबैंक के नाराज होने की परवाह किए बिना सुधार लागू किए।

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उदाहरण के लिए कृषि सुधार से हरियाणा और पंजाब में बैठे अढ़ैतियों, बिचौलियों की नाराजगी का भय था और हुआ भी वही। नोटबन्दी से भाजपा के कोर वोटर व्यापारियों मुख्यतः बनिया वर्ग, मध्यमवर्ग आदि की नाराजगी का भय था फिर भी फैसला हुआ। Bankruptcy Code लागू करके व्यापारियों और बैंक की मिलीभगत से होने वाले घोटाले पर लगाम लगी, लेबर लॉ में सुधार किया गया, बिना इसकी परवाह किए कि वामपंथी थिंकटैंक कितना आक्रमक होकर हमला करेगा।

GST लागू करके सभी व्यापारिक गतिविधियों को सरकारी निगरानी में लाया गया। GST जैसा बड़ा फैसला, एकीकृत कर प्रणाली लागू करना ही अत्यधिक दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति का काम है, क्योंकि एक ऐसे देश में जहाँ कई प्रकार के अप्रत्यक्ष कर हों, उनका बंटवारा केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर पर तीन भागों में करना हो, ऐसी अर्थव्यवस्था में GST लागू करना हो, जिसमें अधिकांश व्यापार अपंजीकृत क्षेत्र में होता है, यह समुद्र लांघने जैसा ही काम था।

इसके बाद सरकार ने विनिर्माण इकाइयों को बढ़ावा देने के लिए PLI जैसी योजना चलाई, इसके अतिरिक्त स्टार्टअप को प्रोत्साहन देना भी एक अच्छा निर्णय रहा। इसके पहले निजी क्षेत्रों को बस टैक्स वसूलने का केंद्र समझा जाता था, लेकिन सरकार ने निजी क्षेत्र की क्षमता का रोजगार सृजन में प्रयोग शुरू किया, यह एक बड़ा नीतिगत बदलाव है। इसके पहले भारत के आर्थिक चिंतन पर समाजवाद इतना हावी था कि निजी क्षेत्र की क्षमता का कभी प्रयोग नहीं हुआ, जो प्राइवेट सेक्टर का जो भी विकास हुआ वो उनके खुद के सामर्थ्य से अथवा यदा कदा राज्य में बनी किसी सरकार के सहयोग से हुआ। केंद्र की कांग्रेस सरकार ने इस ओर कभी ध्यान नहीं दिया।

कांग्रेस का आर्थिक मॉडल ऐसा था कि जो जैसे चल रहा है चलने दो। उदाहरण के लिए कृषि क्षेत्र में कांग्रेस ने इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के बजाए सब्सिडी देने की योजना बनाई। कुछ चुनिंदा फसलों को सरकार खरीद लेती थी, जिससे किसानों का घर चलता रहे। सरकार ने गेंहू और धान की खरीद पर इतना जोर दिया कि देशभर में गेहूं और धान उगने लगी। उन क्षेत्रों में जहाँ जलस्तर कम है, इन फसलों की खेती ने पानी की समस्या पैदा कर दी है। पंजाब और हरियाणा में बढ़ता मरुस्थलीकरण इसी वजह से हुआ है।

लेकिन मोदी सरकार ने इस परंपरा को बदला और किसानों की आय बढ़ाने के लिए निजी निवेश आमंत्रित किए। सरकार ने कोल्ड स्टोरेज, सड़कों को खेतों से जोड़ने जैसी योजनाओं पर खर्च करना शुरू किया जिससे इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़े और कृषि का स्वतः विकास हो सके।

इन बदलावों के साथ ही भारत की राजनीतिक स्थिरता ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। अधिकांश राज्यों में भाजपा या NDA की सरकार है, जो केंद्र की लाइन पर ही अपनी आर्थिक नीति तैयार कर रही हैं। उत्तर प्रदेश एक आदर्श मॉडल की तरह उभरा है। केंद्र द्वारा दृढ़ता से ये बदलाव लागू किए जा रहे हैं। वामपंथी-समाजवादी अर्थशास्त्रीयों द्वारा बार-बार हल्ला मचाने और भारत की आर्थिक नीतियों की आलोचना के बाद भी देश में निवेश बढ़ रहा है। कोरोना के बावजूद, स्टॉक मार्केट में उछाल इसका प्रमाण है।

कोरोना के बाद भी आर्थिक गतिविधियों का चलते रहना एक उपलब्धि है। भारत में पिछले सात सालों में जिस तेजी से डिजिटलीकरण हुआ है, लोगों को बैंकिंग सेक्टर से जोड़ा गया है, उसका लाभ आज देखने को मिल रहा है। गरीबों को जनधन खाता योजना के तहत बैंकिंग से जोड़ना एक मास्टरस्ट्रोक था, इसी का नतीजा है कि आज कोरोनाकाल में इतने बड़े पैमाने पर आर्थिक मदद लोगों तक पहुंच सकी, वो भी बिना किसी घोटाले के। आज से सात वर्ष पूर्व कोई भारतीय इसकी कल्पना भी नहीं कर सकता था।

इनमें से बहुत से सुधार वाजपेयी सरकार में लागू होना शुरू हुए, लेकिन कांग्रेस ने इसे रोक दिया। उदाहरण के लिए कृषि सुधार की पहली संस्तुति वाजपेयी सरकार में हुए, किंतु कांग्रेस ने इसे रोक दिया। हाइवे को विश्वस्तरीय बनाने की योजना, सरकारी कंपनियों का विनिवेशीकरण करना ये ऐसे आर्थिक सुधार थे जो 2004 में लागू हुए होते तो आज देश का आर्थिक कायाकल्प हो गया होता। स्वयं GST ही लम्बे समय तक सरकारी फ़ाइल में अटका रह गया। आज इसी GST के कारण भारत की GDP में 1 से 2 प्रतिशत की सालाना वृद्धि देखी जा रही है।

वैक्सीनेशन के बाद जब आर्थिक गतिविधियां पुनः अपनी पूरी गति से चलेंगी तो भारत आर्थिक विकास के नए कीर्तिमान स्थापित करेगा।भारतीय और विदेशी निवेशकों को इसपर पूरा भरोसा है, इसी कारण भारत में निवेश लगातार बढ़ रहा है। प्राइवेट इन्वेस्टमेंट द्वारा बंदरगाहों का विकास, एक्सप्रेस वे का तेजी से निर्माण, हाईस्पीड मालगाड़ी का विकास, कृषि सुधार, फूड प्रोसेसिंग से लेकर मोबाइल निर्माण तक कई क्षेत्रों में लागू PLI योजना, कॉरपोरेट टैक्स में कमी, आप गिनते रहेंगे, लेकिन आर्थिक मोर्चे पर सरकार की उपलब्धि खत्म नहीं होगी। इन सब को देखकर आशा की जा सकती है कि यह दशक भारत का स्वर्णिम काल बनेगा।

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