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कल्याण सिंह : वह शूरवीर जिनके लिए संस्कृति से बढ़कर कुछ नहीं था

कल्याण सिंह के लिए सत्ता बाद में संस्कृति पहले थी!

Animesh Pandey द्वारा Animesh Pandey
6 December 2021
in ज्ञान
कल्याण सिंह
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“मुझे आज भी ढांचे के गिरने का कोई अफ़सोस नहीं है। वो मेरी इच्छा नहीं थी, परन्तु आज भी मुझे अपने किये पर कोई पश्चात्ताप नहीं। नो रिग्रेट, नो रिपेंटेन्स, नो सॉरी, नो ग्रीफ, और ढाचें का विध्वंस राष्ट्रीय शर्म का नहीं, राष्ट्रीय गर्व का विषय है!”

ये शब्द थे उस व्यक्ति के, जो आयुपर्यन्त अपने वचन से कटिबद्ध रहे। अन्य लोग राजनीति के प्रलोभन में चाहे जो बोलें, परन्तु यह राजनीतिज्ञ अपने बयान से टस से मस नहीं हुआ। शायद उनके पास भी अवसर था, अपने आप को धर्मनिरपेक्ष सिद्ध करने हेतु वह मुलायम सिंह यादव का मार्ग अपना सकते थे लेकिन यहीं पर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने अपना अलग व्यक्तित्व स्थापित किया। उन्होंने न केवल कारसेवा होने दी, अपितु राजनीतिक बलिदान का कड़वा घूंट भी स्वीकार लिया। कल्याण सिंह शायद आधुनिक शब्दावली में पहले भौकाल या Sigma Male थे, जिनका आदर्श स्पष्ट था कि ‘संस्कृति से समझौता नहीं।’

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बचपन से ही राष्ट्रवादी थे कल्याण सिंह

5 जनवरी 1932 को हरिगढ़ [वामपंथियों के लिए अलीगढ़] में जन्मे कल्याण सिंह प्रारंभ से ही राष्ट्रवाद की ओर झुकाव रखते थे। अपने छात्र जीवन से ही वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य भी थे। उन्होंने भारतीय जनसंघ की ओर से राजनीति में अपना प्रथम कदम वर्ष 1967 में रखा, जब उन्होंने अपने गृह नगर अतरौली से ही कांग्रेस के उम्मीदवार को 4,351 वोटों से परास्त किया था।

इसके पश्चात उन्होंने 1969 से लेकर 2002 तक अनेक बार चुनाव लड़े और वर्ष 1980 को छोड़कर वे हर बार विजयी भी रहे। धीरे-धीरे उनका प्रभाव भारतीय जनता पार्टी में भी बढ़ने लगा और 1984 तक आते-आते वे पार्टी के राज्य अध्यक्ष भी बन गए। लेकिन इसे संयोग कहिए, या ईश्वर की लीला, कल्याण सिंह के भाग्योदय में ही भाजपा का भाग्योदय भी निहित था। 1984 में 2 सांसद से अपनी यात्रा प्रारंभ करने वाली पार्टी ने 1989 के चुनाव आते-आते लोकसभा में प्रभाव तो जमा लिया, परंतु किसी राज्य में सत्ता नहीं स्थापित कर पाई। वहीं, 1991 के चुनाव आते-आते कल्याण सिंह के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने न केवल प्रचंड बहुमत प्राप्त किया, बल्कि किसी भी राज्य में पहली बार भाजपा की सरकार बनी।

वर्ष 1992 जब कल्याण सिंह ने….

फिर आया वर्ष 1992 जिसे राम जन्मभूमि आन्दोलन का सबसे महत्वपूर्ण वर्ष कहा जाता है। भारत में एकता यात्रा के कारण भारतीय जनता पार्टी ने पहले ही देश भर में एक आक्रामक वातावरण स्थापित कर रखा था। यही वो समय था, जब श्री राम जन्मभूमि आंदोलन अपने चरमोत्कर्ष पर था और लाल कृष्ण आडवाणी को लालू यादव द्वारा हिरासत में लिए जाने एवं अयोध्या में मुलायम सिंह यादव की सरकार द्वारा निहत्थे कारसेवकों के नरसंहार के पश्चात भी सनातनियों का उत्साह तनिक भी कम नहीं हुआ था।

लेकिन 6 दिसंबर 1992 को गजब ही हुआ। कारसेवकों और सनातनियों की विशाल भीड़ ने विवादित क्षेत्र को चारों ओर से घेर लिया था। तत्कालीन भारतीय गृह मंत्री शंकरराव चव्हाण ने कल्याण सिंह को सूचित किया कि कारसेवक गुंबद के पास पहुंच चुके हैं, तो कल्याण सिंह ने कहा, जो बाद में अनेक साक्षात्कारों में उन्होंने दोहराया भी है, “मेरे पास तो एक कदम आगे की सूचना है कि उन्होंने गुंबद तोड़ना शुरू कर दिया है। मैं इस्तीफा देने को तैयार हूं, परंतु उन पर [कारसेवकों] पर गोली नहीं चलाऊंगा।”

कल्याण सिंह के लिए सत्ता बाद में संस्कृति पहले थी

कल्याण सिंह ने अपने शब्दों का मान रखते हुए त्यागपत्र सौंप दिया। उन्हें सत्ता त्यागना स्वीकार था, परंतु अपने धर्म का अपमान बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं था। जब 1997 में भाजपा की सरकार पुनः सत्ता में आई तो इसमें कल्याण सिंह के व्यक्तित्व का भी काफी हद तक योगदान था। लेकिन यही व्यक्तित्व कभी-कभी व्यक्तिगत रूप से उनके राजनीतिक जीवन में आड़े भी आता था। अपने अक्खड़पन के लिए प्रसिद्ध कल्याण सिंह को राजनीतिक मतभेद के कारण 1999 में सीएम पद त्यागने पर विवश होना पड़ा और उन्होंने प्रथमत्या भाजपा छोड़ी। इसके पश्चात वे 2004 में वापिस आए, परंतु स्थिति जस की तस पाते हुए उन्होंने 2009 में पुनः पार्टी त्याग दी। आखिरकार राजनाथ सिंह के प्रयासों से 2013 में कल्याण सिंह के मतभेद सुलझ गए और उन्होंने अपनी जन क्रांति पार्टी का भाजपा में विलय करा दिया।

हिंदूवादी नेता थे कल्याण सिंह 

1993 में राष्ट्रपति शासन हटने के पश्चात जब उत्तर प्रदेश में चुनाव हुए तो तत्कालीन शासन में रही भारतीय जनता पार्टी को पराजय प्राप्त हुई। मुलायम सिंह यादव और कांशीराम के विजयी गठबंधन ने इस बात का न केवल जश्न मनाया, अपितु हिंदुओं को अपमानित करते हुए नारे भी लगवाए, ‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम!’  लेकिन ये कल्याण सिंह के प्रति वामपंथियों और सेक्युलर पार्टियों की कुंठा को प्रदर्शित करता था, जिसने 1992 में कारसेवकों पर कोई कार्रवाई नहीं की।

उन्होंने स्पष्ट किया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, चाहे बाबरी के विवादित ढांचे का विध्वंस ही क्यों न हो जाए, परंतु वह 1990 की भांति उत्तर प्रदेश की पावन भूमि को निर्दोष हिंदुओं के रक्त से पुनः कलंकित नहीं होने देंगे। आज जब देश शौर्य दिवस के अवसर पर उन वीरों को स्मरण करता है, जिन्होंने भारतवर्ष की वास्तविक संस्कृति के लिए अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया, तो कल्याण सिंह जी का नाम उसमें सम्मान सहित लिया जाएगा।

 

Tags: उत्तरप्रदेशकल्याण सिंहभारतीय राजनीति
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