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भारत की विदेश नीति में अपनी अमिट छाप कैसे छोड़ रहे हैं डॉ. एस. जयशंकर ?

डॉ. जयशंकर के 'डॉ. जयशंकर' बनने की कहानी

Deeksha Sharma द्वारा Deeksha Sharma
17 July 2022
in समीक्षा
S Jaishankar

Source- TFIPOST HINDI

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जब भी बात भारत के विदेश मंत्रियों की आती है तो दिमाग में सबसे पहला नाम डॉ एस जयशंकर का आता है. उनसे पहले देश के जो भी विदेश मंत्री रहे वे शायद ही किसी को याद हों लेकिन जयशंकर ने अपने छोटे से कार्यकाल में जो उपलब्धियां हासिल कर ली है वो अविस्मरणीय है. और इसका मुख्य कारण उनके सोचने का तरीका और चीजों को कूटनीतिक रूप से हल करने की उनकी क्षमता है. इसके अलावा जयशंकर उन चुनिंदा लोगों में से एक हैं जो गलत को ‘गलत’ कहने से नहीं डरते और यही बात उन्हें और भी खास बनाती है.

भारत ने स्वतंत्रता के बाद की विदेश नीति में रक्षात्मकता के साथ चुटकी- भर नमक के बराबर आक्रामकता का रुख अपनाया. भारत के बोलने पर किसी को कोई आपत्ति न हो इसके लिए शांतचित्त दृष्टिकोण पर अधिक जोर दिया गया लेकिन फिर एक व्यक्ति आया जिसे कूटनीति का दशकों का अनुभव था और उसने भारत की विदेश निति की जो कायापलट की वह बहुत सराहनीय है. लेकिन इसकी शुरुआत कहा से हुई और जयशंकर कैसे इस मुकाम तक पहुंचे? चलिए जानते हैं!

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डॉ सुब्रमण्यम जयशंकर का जन्म नई दिल्ली में एक तमिल परिवार में हुआ. उनके पिता के. सुब्रह्मण्यम स्वयं एक रणनीतिक मामलों के विश्लेषक, टिप्पणीकार और सिविल सेवक थे। जयशंकर दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफंस कॉलेज से स्नातक हैं। उन्होंने राजनीति विज्ञान में एमए, एम. फिल. और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से अंतरराष्ट्रीय संबंधों में PHD (परमाणु कूटनीति में विशेषज्ञता) हासिल की। इसलिए उन्हें विदेशी रणनीतियों में एक योग्य व्यक्ति के रूप में माना जा सकता है।

और पढ़ें: जयशंकर ने एक साथ राहुल गांधी, चीन और पिनराई विजयन तीनों को पटक-पटक कर धोया

डॉ जयशंकर का करियर

जयशंकर 1977 में भारतीय विदेश सेवा में उस समय शामिल हुए जब इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के कारण भारत वैश्विक मंच पर अपनी बात कहने में संघर्ष कर रहा था. उन्होंने 1978 में मॉस्को में भारत के मिशन के तीसरे और दूसरे सचिव के रूप में कार्य किया था. 1985-1988 में वह वाशिंगटन डी॰सी॰ स्थित भारतीय दूतावास में प्रथम सचिव थे. 1988 में वो भारतीय शांति सेना (IPKF) के पहले सचिव और राजनीतिक सलाहकार बने. 1990 से 1995 तक भारत में जो राजनितिक उथल-पुथल मची वो उसके साक्षी बनें. न केवल काम से बल्कि सरकारों में नेताओं के बर्ताव और सोच से भी उन्होंने काफी कुछ सीखा. 1991 के आर्थिक संकट के दौरान वह बुडापेस्ट में भारतीय मिशन में काउंसलर (वाणिज्यिक) बनें.

डॉ जयशंकर ने अब तक विदेश नीति के क्षेत्र में 2 दशक का वक्त गुजार लिया था। उन्होंने 21वीं सदी के भारत के लिए उपयुक्त विदेश नीति के निर्माण की दिशा में काम करना प्रारंभ कर दिया। भारत आर्थिक रूप से मजबूत होने लगा और ऐसे में अमेरिका जानता था कि भारत जिस प्रकार से बढ़ रहा है यदि ऐसे में उसे अपने नियंत्रण में कर लिया जाये तो अमेरिका के लिए भविष्य में यह किसी ‘हुकुम के इक्के’ से कम नहीं होगा. लेकिन  जयशंकर ने भी इससे निपटने के लिए समान विचारधारा वाले उन सहयोगियों के साथ संबंधों को मजबूत किया जो भारत की सहायता कर सकते थे.

डॉ जयशंकर ने 2004-2007 तक विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव (अमेरिका) के रूप में काम किया और महत्वाकांक्षी भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौता भी इन्हीं की देन है. इसके लिए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आज भी उनकी सराहना करते हैं. चीन का सामना करने हेतु चीन के दुश्मन जापान के शिंज़ो आबे के साथ मनमोहन सिंह को मिलवाने वाले भी जयशंकर ही थे. यही कारण है कि आज जापान हमारा क्वाड पार्टनर और एक अविभाज्य आर्थिक सहयोगी है। 1977 बैच के भारतीय विदेश सेवा अधिकारी जयशंकर ने अन्य यूरोपीय देशों में भारत का प्रतिनिधित्व करने के बीच अमेरिका में (2014-15) और चीन में 2009-13 तक अपनी सेवा दी. वो चीन में लगभग साढ़े चार साल के कार्यकाल के साथ ही सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले भारतीय राजदूत बनें.

भारत और चीन के बीच डोकलाम संकट को समाप्त करने में भी जयशंकर की महत्वपूर्ण भूमिका थी, जिसने दोनों देशों को अरुणाचल प्रदेश में युद्ध के कगार पर पहुंचा दिया था. बीजिंग में अपने कार्यकाल के दौरान जयशंकर ने भारत के व्यापार, सीमा और सांस्कृतिक संबंधों में चीन के साथ संबंध सुधारने में मदद की. रूसी, अंग्रेजी, तमिल, हिंदी, जापानी, चीनी और हंगेरियन भाषाओं के ज्ञाता डॉ जयशंकर ने भारत के पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा के लिए प्रेस सचिव और भाषण लेखक के रूप में भी काम किया है.

जयशंकर और मोदी

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में सुषमा स्वराज विदेश मंत्री थी जबकि जयशंकर विदेश सचिव के रूप में काम कर रहे थे. पद पर रहने के दौरान ही सुषमा स्वराज की असामयिक मृत्यु हो गई. जयशंकर की सूझबूझ और विदेशी राजनीति में उनके कौशल को देख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनसे बहुत प्रभावित हुए और डॉ जयशंकर, जो रिटायरमेंट लेने वाले थे उन्हें अपने दूसरे कार्यकाल में विदेश मंत्री का पद थमा दिया. पीएम मोदी के विदेशी दौरे जिनके कारण आज भारत के हर देश के साथ अच्छे सम्बन्ध हैं, वह भी डॉ जयशंकर के ही दिमाग की उपज है. उनकी इसी निति की कारण आज चीन और पाकिस्तान को छोड़ दें तो विश्व का हर देश भारत का मित्र है. अमेरिका के बाइडन हों या यूरोपीय यूनियन हो या अन्य, आज हर कोई भारत से मैत्री के लिए आगे बढ़ रहा है.

भारतीय विदेश नीति का नायक

आज डॉ जयशंकर जितना संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन और यूके जैसे देशों के भारत विरोधी मिथों और प्रश्नों का अपने सत्य और तथ्य के साथ मुकाबला करते हैं. आज तक भारत के विदेश मंत्री जिन्हें शायद ही स्वयं के देश की आबादी अच्छे से जानती हो आज उसी विदेश मंत्री की कुर्सी पर बैठने वाले डॉ जयशंकर के चर्चे देश विदेश हर जगह है. कोई भी उन्हें सुनकर उनके  ज्ञान और बुद्धि से प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता. यही कारण है कि आज डॉ जयशंकर को भारतीय विदेश नीति का नायक कहा जाता है.

और पढ़ें: यूरोप वैश्विक समाज का ठेकेदार न बने– जयशंकर ने यूरोप को छठी का दूध याद दिलाया

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