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रमिंदर और देविंदर से लेकर अर्शजोत और गुरनूर तक: सिख नामों का बदल रहा है ट्रेंड

क्या सिखों के नामों का उर्दूकरण होता जा रहा है?

Ruchi Mehra द्वारा Ruchi Mehra
7 September 2022
in प्रीमियम
Sikhs

Source- TFIPOST

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दुनियाभर में अलग अलग धर्मों को मानने वाले लोग हैं। विश्व के सबसे प्रमुख धर्मों की बात करें तो ईसाई, बौद्ध, हिंदू, मुस्लिम के बाद सिख धर्म का नाम आता है। दुनिया के सबसे बड़े धर्मों में से एक है सिख धर्म। आप दुनिया के किसी भी कोने में चले जाए, आपको सिख धर्म से जुड़े लोग मिल ही जाएंगे। सिख वास्तव में हिंदू धर्म के ही एक अंग हैं। अकसर यह देखने को मिलता है कि सिख धर्म और हिंदू धर्म की परपंराएं भी लगभग-लगभग एक समान ही होती हैं और इनमें कुछ ज्यादा अंतर देखने को नहीं मिलता। यहां तक कि पहले अगर आपने सिख धर्म के लोगों के नामों पर गौर किया होगा तो यह नाम सनातन संस्कृति से कहीं न कहीं से जुड़े होते थे। इनके नाम कुछ ऐसे होते थे कि उसका संस्कृत अर्थ देखने को मिलता था। परंतु बदलते समय के साथ अब यह प्रवृत्ति भी बदलती हुई दिखाई दे रही है। पहले की तुलना में देखा जाए तो अब सिखों के नाम काफी भिन्न होते जा रहे हैं। टीएफआई प्रीमियम में आपका स्वागत है। यहां हम विस्तार से समझेंगे कि कैसे अब सिख नामों का अब ट्रेंड बदलते जा रहा है और कैसे सिखों के नामों का उर्दूकरण होता जा रहा है।

और पढ़ें: खुशहाली, विवाद, राज हत्या और प्रेत आत्माएं: ‘शनिवार वाड़ा’ का इतिहास

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आप उदाहरण के लिए सिख शब्द को ही ले सकते हैं। सिख शब्द संस्कृत शब्द ‘शिष्य’ से निकला है, जिसका अर्थ होता है शिष्य या अनुयायी। इसके अतिरिक्त आप सिख धर्म के गुरुओं के नाम पर ही गौर कीजिए। सिखों के दूसरे गुरु का नाम था गुरु अंगद देव जी। ध्यान देने वाली बात है कि बालि के पुत्र ‘अंगद’ रावण की लंका को ध्वस्त करने वाले राम सेना के प्रमुख योद्धाओं में से एक थे। इसी तरह सिखों के चौथे गुरु गुरु रामदास जी थे। ‘रामदास’ नाम का मतलब भगवान राम का दास या भक्त होता है। ऐसे ही सिखों के अन्य गुरुओं के नाम भी कुछ इसी प्रकार रहे कि उनका सनातन धर्म से जुड़ाव रहा है।

हिंदू और सिख धर्म दोनों मूल रूप से भारत की धरती से ही निकले धर्म हैं। सिख धर्म की स्थापना गुरु नानक देव जी के द्वारा 15वीं शताब्दी में उस दौरान की गई थी, जब भारत पर मुगलों का शासन था। देखा जाए तो हिंदू और सिख धर्म में कई तरह की समानता हमेशा से ही रही हैं। वो सिख धर्म ही था, जो मुगल शासकों द्वारा हिंदुओं के जबरन धर्म परिवर्तन के विरोध में खड़ा हुआ था। गुरु नानक देव जी बाबर के विरुद्ध आवाज उठाने वाले पहले व्यक्ति थे। भारत में अंग्रेजों का शासन कायम होने से पहले तक सिख धर्म को हिंदू धर्म का ही अभिन्न अंग माना जाता रहा है। सिखों के दसवें एवं अंतिम गुरु गुरु गोविंद सिंह ने कहा था कि “सकल जगत में खालसा पंथ गाजे, जगे धर्म हिंदू सकल भंड भाजे।“

श्री गुरु ग्रंथ साहिब, जिसे सिखों का सबसे पवित्र ग्रंथ माना जाता हैं, उसमें सबसे अधिक दोहराया जाने वाला शब्द हरि है। इसके अलावा राम, प्रभु, गोपाल, गोविंद, परमात्मा, परमेश्वर जैसे कई शब्दों का उल्लेख भी श्री गुरु ग्रंथ साहिब में मिलता है। एक समय पर तो बहुत सारे सिख स्वयं को सनातन सिख मानते थे। पहले के समय में सिख धर्म से जुड़े लोग भी अपने नाम इसी तरह रखते थे कि जिसमें सनातन धर्म से उनका जुड़ाव दिखता था। यहां तक कि सिख स्वतंत्रता सेनानियों के नाम भी कुछ इसी प्रकार के होते थे कि उनका सनातम धर्म से जुड़ाव देखने को मिल ही जाता है। जैसे कि भगत सिंह, उधम सिंह, सोहन सिंह भकना यह ऐसे कुछ प्रसिद्ध सिख रहे हैं, जिन्होंने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। भगत का अर्थ भक्त या शिष्य होता है। इसी तरह उधम भी एक संस्कृत शब्द ही है। यहां तक कि तब राम, किशन, गोपाल, अर्जुन (अर्जन), धर्मेंद्र, जैसे नाम सिखों में आम हुआ करते थे।

परंतु वर्तमान समय में देखेंगे तो सिखों के नाम में ट्रेंड बदल रहा है। इस तरह के नाम पुराने होते गए और युवा मॉर्डन बनने या किसी अन्य कारणों से इन नामों को पसंद नहीं करते। अब बहुत कम ही सिखों के नाम आपको ऐसे देखने या सुनने को मिलेंगे, जिनकी जड़ें सनातन संस्कृति से जुड़ी मिले। हालांकि, इसके पीछे भी एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन रहा है, जिसने सिख धर्म पर से हिंदू धर्म के प्रभाव को समाप्त करने का काम किया था। सिखों के नामों की बदलती प्रवृत्तियों की उत्पत्ति 1870 के सिंह सभा आंदोलन में हुई थी। तब तक धर्मांतरण का खेल पूरे भारत में फैल चुका था। हिंदू धर्म में काफी हद तक सामान्य होने के कारण सिख भी इसका शिकार होने लगे।

यह आंदोलन तब हुआ था जब सिख साम्राज्य को औपनिवेशिक अंग्रेजों द्वारा भंग कर दिया गया था और खालसा ने अपनी प्रतिष्ठा खो दी थी। मुख्यधारा के सिख तेजी से अन्य धर्मों में परिवर्तित हो रहे थे। सिंह सभा आंदोलन के पीछे का उद्देश्य सच्चे सिख धर्म का प्रचार करना और सिख धर्म में उसकी प्राचीनता को बहाल करना था। इस आंदोलन के जरिए सिखों को हिंदू धर्म से अलग पहचान दिलाना भी था। सिखों को हिंदुओं से कोई समस्या नहीं थी, वे उन्हें दुश्मन की तरह नहीं देखते थे परंतु वे चाहते थे कि उनकी एक अलग पहचान बने, जिसके लिए ही यह आंदोलन शुरू किया गया।

और पढ़ें: Astraverse – Brahmastra का आधार ही बकवास और अपमानजनक है

जल्द ही अधिक से अधिक लोग आंदोलन से जुड़ने लग गए थे। अधिकांश लोग एक स्वयंसेवक के तौर पर इस आंदोलन में शामिल हो रहे थे, जो सिख धर्म के ऐतिहासिक और धार्मिक ग्रंथों का वितरण करते थे। आंदोलन को अधिक स्थानों में फैलने में ज्यादा समय नहीं लगा। फिर वर्ष 1902 में चीफ खालसा दीवान नामक संगठन भी अस्तित्व में आ गया। कुछ इस तरह सिख गुरुओं की शिक्षाओं का प्रचार प्रसार किया गया था।

सिखों का सनातन धर्म से स्वयं को अलग और दोनों के बीच अंतर करने का आंदोलन सफल हो रहा था। वर्ष 1909 के आनंद विवाह अधिनियम से सिखों के विवाह संस्कार को वैधानिक मान्यता मिल गई। इसके बाद वर्ष 1925 में प्रमुख ऐतिहासिक गुरुद्वारों पर प्रत्यक्ष खालसा नियंत्रण स्थापित किया गया, जो पहले ब्रिटिश समर्थित महंतों और पुजारियों द्वारा चलाए जाते थे। सिख गुरुद्वारा अधिनियम 1925 के साथ सिखों के जीवन से सनातन प्रभाव को खत्म करने का काम किया गया।

इस दौरान अधिकांश सिख अपने बच्चों के नामकरण के लिए अपने पवित्र ग्रंथ श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का पालन करने लगे थे। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) अमृतसर द्वारा प्रकाशित ‘सिख रहेत मर्यादा’ दस्तावेज में बच्चों के नामकरण के दिशा-निर्देश प्रकाशित किए गए। दस्तावेज के अनुसार सिखों में बच्चे के नामकरण की प्रक्रिया काफी भिन्न होती है। नए बच्चे का नाम रखने से पहले सिखों को श्री गुरु ग्रंथ साहिब का आर्शीवाद लेना होता है। इसके लिए हर बच्चे के नाम का पहला अक्षर गुरु ग्रंथ साहिब जी की बाणी के पहले अक्षर से लिया जाता है। उदाहरण के लिए अगर ‘ग’ अक्षर चुना जाता है तो इससे ही बच्चे का नाम रखा जाता है। वहीं, यदि वो पूरा शब्द चुनते हैं तो उसका प्रयोग उपसर्ग के रूप में किया जाता है। इसके बाद से ही मीत, प्रीत, जीत, लीन, वीर, दीप, जैसे शब्दों के उपयोग करने का चलन बढ़ने लगा।

कुछ इस तरह एक बड़े आंदोलन के जरिए सिख धर्म से सनातन धर्म का प्रभाव कम होता चला गया और वे अपनी अलग पहचान बनाने लगे। इसके साथ ही सिखों के नाम की प्रवृत्ति भी बदलती चली गई। जहां पहले सिखों के नाम रमिंदर, देविंदर जैसे हुआ करते थे, जिनका सनातन धर्म से कुछ न कुछ जुड़ाव होता था। परंतु वही आज के समय में अर्शजोत, गुरनूर जैसे नाम प्रचलित होते जा रहे हैं, जिसमें उर्दू का प्रभाव देखने को मिलता है। अब आपको बिशन सिंह, किशन सिंह या फिर गोपाल सिंह जैसे सिखों के नाम देखने को नहीं मिलते होंगे।

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