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पीढ़ा और अन्य भारतीय फर्नीचर जो अब ढूंढें से नहीं मिलते!

अब मिलते ही नहीं

Animesh Pandey द्वारा Animesh Pandey
5 September 2023
in इतिहास, ज्ञान
पीढ़ा और अन्य भारतीय फर्नीचर जो अब ढूंढें से नहीं मिलते!
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आज के आकर्षक एवं आधुनिक डिज़ाइन की तेज़-तर्रार दुनिया में, पारंपरिक भारतीय फर्नीचर का आकर्षण काफी हद तक धूमिल हुआ है । कभी ये हमारे गृहस्थी की शोभा बढ़ाते थे. आज ये ढूंढें से भी कम ही मिलते हैं। आइए भारतीय शिल्प कौशल के इन अद्वितीय अंशों के बारे में तनिक और जानें, और क्यों ये  हमारी संस्कृति का एक अनिवार्य हिस्सा हुआ करते थे:

Peedhas [Chowkis]:

अगर बचपन में इन्हे नहीं देखा, तो क्या ही बचपन रहा होगा. पीढ़ियों तक पीढ़ा अथवा चौकियों ने हमारे आंगनों की शोभा बढ़ाई है. लकड़ी के बने ये लो सीटेड स्टूल बहुपयोगी एवं हमारे संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं, जो विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति करते थे। इन्हें आम तौर पर अनौपचारिक समारोहों के दौरान मेहमानों के लिए बैठने की व्यवस्था के रूप में उपयोग किया जाता था, जिससे वातावरण में गर्मजोशी  की भावना आती थी। पीढ़ा का उपयोग रसोई में भी किया जाता था, जहां महिलाएं भोजन तैयार करते समय आराम से बैठती थीं, जो भारतीय खाना पकाने की घरेलू और सामुदायिक प्रकृति को प्रदर्शित करती थी।

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धार्मिक परिप्रेक्ष्य में पीढ़ा का महत्त्व तो और भी अधिक बढ़ जाता है. इन्हे पूजन एवं यज्ञ अनुष्ठानों में विशेष रूप से प्रयोग में लाया जाता। इन्हें अक्सर वेदियों या प्रार्थना मंच के रूप में उपयोग किया जाता था, जो व्यक्ति और परमात्मा के बीच संबंध का प्रतीक था। परिवार अक्सर इन पीढ़ों को चमकीले कपड़ों, धूप और मूर्तियों से सजाते, जिससे दैनिक अनुष्ठानों और त्योहारों के लिए एक पवित्र स्थान बनता।

और पढ़ें: भगवद गीता सभी धार्मिक पुस्तकों का रत्न क्यों है?

Khat/ Charpoy:

किसी के लिए खाट, तो किसी के लिए ये चारपाई के नाम से भी जाना जाता है. परन्तु नाम जो भी हो, आज भी गाँवों में इनका अपना अलग महत्त्व है. इसकी बुनाई अपने आप में भारतीय शिल्पकारी की उत्कृष्टता का परिचायक है.  इसका व्यावहारिक डिज़ाइन उत्कृष्ट वेंटिलेशन की अनुमति देता है, जिससे यह गर्म और आर्द्र भारतीय गर्मियों के लिए आदर्श फर्नीचर बन जाता है। चारपाई अक्सर आंगनों, बरामदों और यहां तक कि पेड़ों के नीचे भी पाई जाती थी, जो चिलचिलाती गर्मी के दौरान ज़बरदस्त ठंडक एवं आराम प्रदान करती थी.

ये चारपाई आतिथ्य का अद्वितीय प्रतीक भी थे। किसी अतिथि को चारपाई देना सम्मान और आराम का प्रतीक था, जो भारतीय संस्कृति की गर्मजोशी को दर्शाता है। चारपाई का उपयोग कहानी सुनाने के लिए भी किया जाता था, जहां परिवार और दोस्त कहानियां साझा करने का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने देते थे.

Manji:

मांजी भी एक समय भारतीय गृहस्थियों का एक अभिन्न अंग हुआ करता था। इसके कॉम्पैक्ट आकार और मजबूत निर्माण ने इसे तंग जगहों में बैठने के लिए एक आदर्श विकल्प बना दिया है। मंजी अक्सर लिविंग रूम, बालकनियों और बरामदों की शोभा बढ़ाते थे, जो विश्राम और सामाजिक मेलजोल के लिए एक आरामदायक स्थान प्रदान करते।

मंजी ग्रामीण परिवेश में विशेष रूप से लोकप्रिय थे। वे दिन की झपकी के लिए अस्थायी खाट के रूप में और यहां तक कि अनौपचारिक बैठकों या सामुदायिक समारोहों के लिए बैठने की जगह के रूप में भी काम करते थे। बुनी हुई सीट ने आराम और वेंटिलेशन प्रदान किया, जिससे यह भारत की विभिन्न जलवायु परिस्थितियों के लिए एक उत्कृष्ट विकल्प बन गया।

Jhoola:

आदिकाल से झूला, या भारतीय झूला, भारतीय घरों का एक अनिवार्य हिस्सा था, जो सभी उम्र के व्यक्तियों के लिए शांतिपूर्ण विश्राम प्रदान करता था।

झूले सिर्फ फर्नीचर नहीं थे; वे फुर्सत और इत्मीनान से बातचीत की अभिव्यक्ति थे। उन्हें अक्सर रंगीन कुशन और पर्दों से सजाया जाता था, जो सजावट में सुंदरता का स्पर्श जोड़ते थे। शाम के समय परिवार झूले पर इकट्ठा होते थे, कहानियाँ साझा करते थे और हँसी-मजाक करते थे। खटिया की भांति ये भी भारतीय किस्सों का एक अभिन्न अंग हुआ करता था.

Divan

पारंपरिक भारतीय फर्नीचर का एक अभिन्न अंग दीवान, देश के सांस्कृतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। दीवान ने कई उद्देश्यों को पूरा किया जिसने इसे भारतीय घरों में अपरिहार्य बना दिया।

सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण, दीवान पलंग ने परिवारों के लिए एक आरामदायक और बहुमुखी सीटिंग अरेंजमेंट की पेशकश की। उन्होंने विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा करते हुए लोगों को बैठने, लेटने या यहाँ तक कि सोने की भी अनुमति दी। यह अनुकूलनशीलता उस संस्कृति में विशेष रूप से महत्वपूर्ण थी जहां सामाजिक समारोहों, कहानी सुनाना और विश्राम दैनिक जीवन के आवश्यक पहलू थे।

इसके अलावा, दीवान ने शिष्टाचार और सामाजिक पदानुक्रम को संरक्षित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। औपचारिक सेटिंग में, यह अक्सर मेहमानों और मेज़बानों के महत्व पर जोर देते हुए सम्मान की सीट होती थी।

Mora [Mudha]:

मोढ़ा सादगी और कार्यक्षमता का प्रतीक हुआ करता था। इनका महत्त्व इसी बात में परिलक्षित होता था कि ये भारतीय गृहस्थी के लिए कितने आरामदायक एवं व्यवहारिक थे। बेंत अथवा बैम्बू से निर्मित मोढ़ा कभी कभी छोटी मेज के रूप में भी काम करता, जो भोजन या पेय की ट्रे रखने के लिए आदर्श होते। इनके कॉम्पैक्ट आकार ने उन्हें आसानी से चलने योग्य बना दिया, जो विभिन्न रहने की जगहों और जरूरतों के अनुकूल हो गए।

मोढ़ा विशेष रूप से ग्रामीण परिवेश में लोकप्रिय थे, जहां उनका मजबूत, हस्तनिर्मित लकड़ी का निर्माण शिल्प कौशल और स्थायित्व का प्रतीक था। उनका सरल डिज़ाइन और न्यूनतम आकर्षण पारंपरिक भारतीय आंतरिक सज्जा के साथ सहजता से मिश्रित हो गया।

और पढ़ें: कैसे भरोसेमंद आयुर्वेद को लुभावने होमियोपैथी ने पछाड़ा

Kursis:

ये आपके पारम्परिक अंग्रेजी चेयर जैसे नहीं थे. भारतीय कुर्सी अपने सुरुचिपूर्ण डिजाइन और बेंत की कारीगरी के लिए जानी जाती थी। ये कुर्सियाँ कभी भारतीय घरों का अनिवार्य हिस्सा थीं और पारंपरिक सजावट में प्रमुख स्थान रखती थीं। इनका महत्त्व ऐसा था कि अंग्रेजों के समय इनपर बैठना ही स्टेटस सिंबल माना जाता था.

भारत की कुर्सी निर्माण में सौंदर्यशास्त्र और कार्यक्षमता के मिश्रण के लिए महत्व दिया गया था। हार्डवुड से निर्मित, इन कुर्सियों में सीट और बैकरेस्ट पर खूबसूरती से बुने गए कैनिंग पैटर्न थे, जो कुशल कारीगरों की कलात्मकता को प्रदर्शित करते थे। Caning ने न केवल विलासिता का स्पर्श जोड़ा, बल्कि भारत की अक्सर गर्म और आर्द्र जलवायु में वेंटिलेशन और आराम भी प्रदान किया।

ये कुर्सियाँ असंख्य उद्देश्यों को पूरा करती थीं। इनका उपयोग न केवल बैठने के लिए बल्कि स्टेटस सिंबल के रूप में भी किया जाता था, खासकर समृद्ध घरों में। सभाओं और समारोहों के दौरान कुरसी एक आम दृश्य था, जो मेहमानों के लिए सम्मानजनक बैठने की व्यवस्था प्रदान करता था।

जहाँ आज की दुनिया में लोकलुभावन, चमकीले डिजाइन की भरमार है, हमें अपने पारम्परिक फर्नीचरों का महत्त्व कदापि नहीं भूलना चाहिए। ये कृति न केवल बहुपयोगी रहे हैं, अपितु उन मूल्यों, परंपराओं और सामाजिक बंधनों को भी प्रतिबिंबित करते हैं जो पीढ़ियों से हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। हाँ, कुछ लोगों के लिए इनका आधुनिक जगत में कोई महत्त्व नही, परन्तु इनकी विरासत भारत की समृद्ध विरासत और शिल्प कौशल के प्रमाण के रूप में जीवित है। जब रंग रूप बदलकर एनफील्ड की मोटरसाइकिल वापसी कर सकती है, तो फिर हमारे पारम्परिक फर्नीचरों की विविधता एवं उपयोगिता का कोई सानी नहीं!

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